कोरोना वायरस संक्रमण: क्या मांसाहार भोजन लोगों को छोड़ना होगा

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    • Author, एलेजांड्रा मार्टिंस
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़ वर्ल्ड

साल 2002 की सार्स बीमारी और 2013 में पश्चिमी अफ्ऱीका में फैले इबोला के वक़्त भी ऐसा ही हुआ जो मौजूदा कोविड-19 की महामारी में हो रहा है.

ये किसी भी दूसरी महामारी में हो सकता है. ये सभी जानवरों से इंसानों में फैली वायरस वाली महामारी के उदाहरण हैं.

एक नई स्टडी के अनुसार केवल इंसान ही इन महामारियों के शिकार नहीं हैं. प्रकृति के साथ जिस तरह से छेड़छाड़ की जा रही है, उससे इन महामारियों को बढ़ावा मिलता है.

यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफ़ोर्निया के वेटनरी स्कूल में रिसर्चर क्रिस्टीन जॉनसन कहती हैं, "इंसान ही विषाणुओं को जानवरों से इंसान तक का रास्ता दिखा रहे हैं. अगली महामारी का चुपचाप इंतज़ार करने से पहले हमें ज़रूरी क़दम उठाने होंगे."

साइंस जर्नल 'प्रोसीडिंग्स ऑफ़ दी रॉयल सोसायटी बीः बॉयोलॉजिकल साइंसेज' में हाल ही में इस सिलसिले में एक रिसर्च पेपर पब्लिश हुआ है.

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लुप्तप्राय प्रजाति

इस रिसर्च पेपर की लीड राइटर क्रिस्टीन जॉनसन कहती हैं, "वन्य जीवों और उनके आवास के साथ हम जिस तरह की छेड़खानी कर रहे हैं, उसका सीधा नतीजा है कि ये वायरस जानवरों से निकलकर हमारी दुनिया में आ गया. प्रकृति के साथ छेड़छाड़ का ये नतीजा है कि अब ये जानवर अपने विषाणु हमारे साथ शेयर कर रहे हैं."

"इंसान की गतिविधियों ने कई प्रजातियों को विलुप्त होने के कगार पर पहुंचा दिया है. इतना ही नहीं जानवरों की दुनिया की चीज़ें हमारी दुनिया में दाखिल हो रही हैं. ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारी बेज़ा दखलंदाज़ी ने संकट की परिस्थिति खड़ी कर दी है जैसे कि हम अभी कोविड-19 की महामारी से गुज़र रहे हैं."

क्रिस्टीन जॉनसन और उनके सहयोगियों ने ऐसे 142 ज्ञात मामलों का अध्ययन किया है जहां कोई बीमारी जानवरों से होते हुए इंसानों तक पहुंच गई.

क्रिस्टीन की टीम ने इस जानकारी को विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गए जानवरों की रेड लिस्ट से मिलान करके देखा. ये रेड लिस्ट इंटरनेशनल यूनियन ऑफ़ कंजर्वेशन फ़ोर नेचर (आईयूसीएन) ने तैयार की है.

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इंसानों तक वायरस पहुंचाने का प्रमुख स्रोत

हालांकि ये स्टडी स्तनपायी जीवों और विषाणुओं पर फोकस थी लेकिन इसकी बानगी साफ़ तौर पर दिखाई देती है.

जैसा कि उम्मीद थी कि सदियों से हम जिन जानवरों को पालतू बनाकर अपने साथ रखते आए हैं, वही जानवर इंसानों तक वायरस पहुंचाने का प्रमुख स्रोत रहे हैं.

बीमारियों का दूसरा प्रमुख स्रोत वे जीव हैं जो प्रकृति में इंसानी आबादी के क़रीब रहते हैं, जैसे चूहे, बंदर और चमगादड़.

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लेकिन इस रिसर्च का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गए जानवरों से जुड़ा हुआ है.

किसी बीमारी या ग़ैर-इंसानी गतिविधि की वजह से लुप्त होने की कगार पर पहुंच गए जीवों की तुलना में शिकार, तस्करी और प्राकृतिक आवास के ख़त्म होने के कारण अस्तित्व के संकट का सामना कर रहे जीवों ने इंसानों को बीमारी वाले विषाणुओं से दोगुना नुक़सान पहुंचाया है.

क्रिस्टीन के मुताबिक़ इससे संकेत मिलते हैं कि इंसानों की दखलंदाज़ी से वन्य जीवों के प्राकृतिक आवास का स्वरूप बदल रहा है.

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इंसान की दखलंदाज़ी का असर

क्रिस्टीन कहती हैं, "हमारे पास जो डेटा है, वो ये बताता है कि लुप्तप्राय प्रजातियों से वायरस के संक्रमण की दो प्रक्रियाएं हैं. एक तरफ़ तो शिकार और तस्करी के ज़रिए वन्य जीवों का दोहन किया जा रहा है. इससे इंसान जानवरों के संपर्क में आ रहा है."

"जानवरों के रक्त, मल-मूत्र, या उनसे निकलने वाले अन्य चीज़ों के संपर्क में मनुष्य आ रहा है और इससे इंसानों में संक्रमण का जोखिम बढ़ गया है. ये जानवर बाज़ार में बेचे जा रहे हैं. लोग इन जानवरों को दूसरे जानवरों के साथ पकड़कर रख रहे हैं. इस माहौल में विषाणुओं का एक जानवर से दूसरे जानवर तक पहुंचना आसान हो गया है."

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"अगर ये वन्य जीव अपने प्राकृतिक आवास में रहते तो ऐसा कभी नहीं होता. दूसरी प्रक्रिया में पारिस्थितिकी तंत्र के साथ इंसानों की छेड़छाड़ है. वन्य जीव दूसरी प्रजातियों के साथ दुर्लभ संसाधनों के लिए होड़ कर रहे हैं. अस्तित्व बचाने के लिए इंसानी आबादी की तरफ़ बढ़ रहे हैं."

"प्राकृतिक आवास के नुक़सान और जैव विविधता पर ख़तरे ने वन्य जीवों में बीमारियों का स्वरूप बदल दिया है. जिस तरह से इंसानों की आबादी बढ़ रही है और बढ़ती ज़रूरतों के लिए वो ज़मीन का इस्तेमाल कर रहा है, उससे आने वाले समय में नए विषाणुओं के बार-बार उभरने की आशंका बढ़ जाती है."

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वायरस से होने वाली महामारियां

साल 2012 में प्रतिष्ठित अमरीकी विज्ञान पत्रकार डेविड क्वाम्मेन ने अपनी किताब 'स्पिलोवरः एनिमल इंफेक्शन एंड द नेक्स्ट ह्यूमन पैंडेमिक' ने इस बारे में चेतावनी दे दी थी. डेविड क्वाम्मेन ने अपनी किताब में जानवरों से इंसानों तक पहुंचने वाली वायरस जनित महामारियों की लंबी लिस्ट बताई है.

भारत में कोरोनावायरस के मामले

यह जानकारी नियमित रूप से अपडेट की जाती है, हालांकि मुमकिन है इनमें किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के नवीनतम आंकड़े तुरंत न दिखें.

राज्य या केंद्र शासित प्रदेश कुल मामले जो स्वस्थ हुए मौतें
महाराष्ट्र 1351153 1049947 35751
आंध्र प्रदेश 681161 612300 5745
तमिलनाडु 586397 530708 9383
कर्नाटक 582458 469750 8641
उत्तराखंड 390875 331270 5652
गोवा 273098 240703 5272
पश्चिम बंगाल 250580 219844 4837
ओडिशा 212609 177585 866
तेलंगाना 189283 158690 1116
बिहार 180032 166188 892
केरल 179923 121264 698
असम 173629 142297 667
हरियाणा 134623 114576 3431
राजस्थान 130971 109472 1456
हिमाचल प्रदेश 125412 108411 1331
मध्य प्रदेश 124166 100012 2242
पंजाब 111375 90345 3284
छत्तीसगढ़ 108458 74537 877
झारखंड 81417 68603 688
उत्तर प्रदेश 47502 36646 580
गुजरात 32396 27072 407
पुडुचेरी 26685 21156 515
जम्मू और कश्मीर 14457 10607 175
चंडीगढ़ 11678 9325 153
मणिपुर 10477 7982 64
लद्दाख 4152 3064 58
अंडमान निकोबार द्वीप समूह 3803 3582 53
दिल्ली 3015 2836 2
मिज़ोरम 1958 1459 0

स्रोतः स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय

11: 30 IST को अपडेट किया गया

ये महामारियां हैं, मारबर्ग (1967), लास्सा (1969), निपाह (1998), एचआईवी (1981), हेंड्रा (1994), एवियन इंफ्लुएंज़ा वायरस(1997) और स्वाइन फ़्लू वायरस (2009). साल 2002 में फैली सार्स महामारी की शुरुआत चमगादड़ से हुई थी. चीन के रेस्तराओं में परोसे जाने वाले पॉम किवेट (एक तरह का कस्तूरी बिलाव) के गोश्त में चमगादड़ों से वायरस पहुंचा था.

कोरोना वायरस के बारे में भी ऐसा अंदेशा है कि ये चमगादड़ों से शुरू हुआ लेकिन इंसानों और चमगादड़ों के बीच कौन सा जानवर बिचौलिया बना, इस पर तस्वीर साफ़ नहीं है.

अमरीका के मोंटाना से डेविड क्वाम्मेन ने बीबीसी मुंडो को बताया, "इंसान हमेशा से जंगली जानवरों के संपर्क में रहता आया है. इसलिए विषाणुओं का जानवरों से इंसानों तक पहुंचना कोई नई बात नहीं है. 14वीं सदी में फैला बुबोनिक प्लेग जिसे ब्लैक डेथ भी कहते हैं, इसका एक और उदाहरण है कि इंसानों को कितना नुक़सान उठाना पड़ा था."

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महामारियों से सबक

लेकिन डेविड क्वाम्मेन ध्यान दिलाते हैं कि जानवरों से इंसानों को होने वाले संक्रमण के मामले लगातार बढ़ रहे हैं और इसकी वजह भी है. वे कहते हैं, "इंसानों की आबादी इतनी ज़्यादा पहले कभी नहीं रही. इसलिए हम प्रकृति के साथ लगातार छेड़छाड़ कर रहे हैं. ज्यादा लोग जंगली जानवरों के संपर्क में आ रहे हैं क्योंकि वे शिकार करते हैं, उन्हें खाते हैं."

"वायरस के जानवरों से इंसानों तक पहुंचने के लिए ये बेहद अनुकूल परिस्थिति है. इसके साथ ही हमारे पास यातायात के बहुत तेज़ साधन है. मान लीजिए कि एक वायरस किसी इंसान को संक्रमित कर लेता है तो महज 20 घंटे के अंदर वो आधी दुनिया का सफर तय कर सकता है. हम कांगो, बोर्नियों और अमेज़न जैसी जगहों पर पहुंच गए हैं. हमने वहां उद्योग लगाए हैं. उनकी ज़िंदगी में दखल दिया है. हम अपने पालतू जानवरों के साथ उनके बीच रह रहे हैं."

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कोरोना वायरस से फैली महामारी से क्या सबक मिलते हैं, इस पर डेविड क्वाम्मेन कहते हैं, "मेरी नज़र में इस महामारी के दो सबक हैं. अगर हम भविष्य में ऐसी स्थिति से बचना चाहते हैं तो हमें अपने खान-पान में क्रांतिकारी बदलाव लाने होंगे ताकि जंगली जानवरों के प्राकृतिक आवास का विध्वंस रोका और कम किया जा सके."

"और दूसरा ये कि अगर हम भविष्य में आने वाली महामारियों से बचना चाहते हैं तो हमें अपने सार्वजनिक स्वास्थ्य की व्यवस्था को दुरुस्त करना होगा. हमें प्रशिक्षित लोगों की ज़रूरत होगी. पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट किट्स, जांच की व्यवस्था और वैक्सीन के इंतज़ाम में हम देरी नहीं कर सकते. राजनेताओं को समझना होगा कि महामारियां एक वास्तविक ख़तरा है."

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