कोरोना वायरस: चेन्नई से नैरोबी तक, बिन पानी हाथ कैसे धोएं?

कोरोना वायरस

इमेज स्रोत, Avijit Ghosh/SOPA Images/LightRocket/Getty Images

    • Author, स्वामीनाथन नटराजन
    • पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस

अब जबकि कोरोना वायरस के बढ़ते प्रकोप के चलते यूरोप और अन्य विकसित देश अपनी अपनी सीमाएं बंद कर रहे हैं.

ऐसे में दुनिया के करोड़ों अन्य लोगों को इस बात की बहुत कम उम्मीद है कि वो विश्व स्वास्थ्य संगठन की हाथ धोने और उचित दूरी बनाए रखने की सलाह पर अमल कर सकते हैं.

दुनिया में क़रीब एक अरब लोग स्लम जैसे हालात में रहते हैं. ये दुनिया की क़रीब 30 प्रतिशत शहरी आबादी है.

ये रिहाइशी बस्तियां तमाम बुनियादी सुविधाओं से महरूम रहती हैं. रोशनी और हवा का इंतज़ाम नहीं होता. गंदा पानी निकलने और सीवेज सिस्टम जैसी सुविधाएं नहीं होती.

नतीजा ये कि इन बस्तियों में बीमारियां बड़ी तेज़ी से फैलती हैं.

43 वर्ष की सेलेस्टाइन एढियाम्बो, कीनिया की राजधानी नैरोबी के मुकुरू नाम की स्लम बस्ती में रहती हैं. यहां उनके पति और छह बच्चे भी साथ ही रहते हैं.

पानी का संकट

इमेज स्रोत, MUKURU PROMOTION CENTRE, WINNIE OGUTU

पानी की आपूर्ति

पूरे परिवार के रहने के लिए बस एक कमरे का घर है, जहां नल से पानी की सुविधा और बिजली का कनेक्शन नहीं है.

सेलेस्टाइन कहती हैं कि घर में इतनी कम जगह है कि उनके बच्चे एक-दूसरे से टकराए बिना ज़्यादा हिल-डुल तक नहीं सकते

सेलेस्टाइन ने बीबीसी को बताया, "अगर कोई संक्रमण होता है, तो हमारे लिए एक बच्चे को दूसरे से अलग करना संभव नहीं है. हमारे पास बिल्कुल भी जगह नहीं है. यहां कोई कमरा नहीं है. सरकार को चाहिए कि वो संक्रमित लोगों को अस्पताल ले जाए."

सेलेस्टाइन के पति एक बढ़ई का काम करते हैं. और जब वो काम करते हैं, तो हर दिन क़रीब 400 कीनियाई शिलिंग या क़रीब 4 डॉलर या यूं कहें कि क़रीब तीन सौ रुपये कमाते हैं.

और इसमें से 50 शिलिंग या क़रीब 38 रुपये तो सेलेस्टाइन का परिवार हर रोज़ दस बाल्टी पानी ख़रीदने में ही ख़र्च कर देता है.

पानी का संकट

इमेज स्रोत, MUKURU PROMOTION CENTRE, WINNIE OGUTU

नैरोबी की झुग्गी बस्ती मुकुरू

लेकिन, सेलेस्टाइन की बस्ती में पानी की आपूर्ति नियमित नहीं है. और कई दिन तो पानी बिल्कुल ही नहीं आता.

तब, उनका परिवार झटपट नहाने से भी बचता है, जिसका वो आदी हो चुका है. नैरोबी की झुग्गी बस्ती मुकुरू में क़रीब 5 लाख लोग रहते हैं.

यहां के मकान गत्तों या प्लास्टिक से बने हैं. जिन लोगों की माली हालत थोड़ी बेहतर है, उन्होंने अपने मकान लोहे की लहरदार चादरों से बना लिए हैं.

यहां कचरा जमा करने की कोई व्यवस्था नहीं है. घरों से निकलने वाला ज़्यादातर कचरा बह कर सीधे नदी में चला जाता है.

एक स्थानीय स्वयंसेवी संस्था मर्सी मुकुर, इस इलाक़े में चार प्राइमरी स्कूल चलाती है, जिसमें कुल क़रीब सात हज़ार बच्चे पढ़ने आते हैं.

कोरोना वायरस
कोरोना वायरस
वीडियो कैप्शन, 159 देशों में फैला कोरोनावायरस चीन, यूरोप के बाद अब दक्षिण पूर्व एशिया के लिए बना है ख़तरा

बच्चे साबुन नहीं ख़रीद सकते...

मर्सी मुकुरू की प्रमुख मैरी किलीन के मुताबिक़, इनमें से आधे बच्चे साबुन नहीं ख़रीद सकते.

सेलेस्टाइन कहती हैं, "मैं चिंतित हूं कि अगर कोरोना वायरस हमारे इलाक़े में फैलता है, तो हालात बेहद भयानक होंगे."

डॉक्टर पियर एम्पेले, विश्व स्वास्थ्य संगठन के पूर्व प्रतिनिधि हैं. वो मध्य और पश्चिमी अफ्रीका के कई देशों में काम कर चुके हैं.

डॉक्टर एम्पेले कहते हैं कि अफ्रीकी घरों में आम तौर पर बहुत भीड़ रहती है. और, कई मामलों में तो एक छोटे से मकान में 12 लोग रहते हैं.

वो कहते हैं, "इनमें से बहुत से घरों में ख़ुद को बाक़ी सदस्यों से अलग-थलग करना नामुमकिन है."

पानी का संकट

इमेज स्रोत, Getty Images

चेन्नई का संकट

ऐसा नहीं है कि केवल झुग्गी बस्तियां पानी की उपलब्धता का संकट झेल रही हैं.

दक्षिण अफ्रीका का जोहानेसबर्ग हो या फिर भारत का चेन्नई, दोनों ही शहरों में पिछले साल पानी कमोबेश ख़त्म हो गया था.

शांति सशिंद्रनाथ, दो बच्चों की मां हैं. वो चेन्नई के बाहरी इलाक़े में रहती हैं.

शांति ने बीबीसी को बताया, "अगर यहां पिछले साल जैसी पानी की किल्लत होती है, तो हमारे लिए बार-बार हाथ धोने का पानी जुटा पाना मुश्किल होगा."

पिछले साल जब चेन्नई में पानी का संकट हुआ था, तो उनके परिवार ने बिना शोधित किया हुआ पानी खेतों वाले कुओं से ख़रीद कर किसी तरह अपना काम चलाया था.

ये कुएं उनके घर से पचास किलोमीटर से भी ज़्यादा दूर स्थित थे.

पानी का संकट

इमेज स्रोत, SHANTHI SASINDRANTAH

शांति की समस्या

शांति कहती हैं, "शहर में सार्वजनिक शौचालय कम हैं. पानी की सुविधाएं भी सीमित हैं. और लोग सार्वजनिक स्वास्थ्य के बुनियादी मशविरों का भी पालन नहीं कर रहे हैं."

शांति बताती हैं, "लोकल ट्रेनों में लोग आप के मुंह से कुछ इंच की दूरी पर ही खांसते हैं और अपने मुंह को ढंकना भी ज़रूरी नहीं समझते. जब मैं उन्हें टोकती हूं, तो कुछ तो माफ़ी मांग लेते हैं. वहीं कई लोग तो लड़ने पर उतारू हो जाते हैं."

शांति के दोस्त और रिश्तेदार कमोबेश रोज़ ही उनके अपार्टमेंट में आते हैं. और वो अब तक नहीं सोच पायी हैं कि वो बाहर के लोगों से संपर्क कैसे सीमित करें.

शांति ने हमें बताया, "मैं अपने बच्चों को लगातार बताती रहती हूं वो अपने हाथों को धीरे-धीरे और अच्छे से धोएं. मैं उनसे ये भी कहती हूं कि वो जब भी बाहर से घर लौटें तो अपना हाथ ज़रूर धोएं. भले ही वो केवल पांच मिनट के लिए ही क्यों न बाहर गए हों. हम पूरे परिवार के साथ अब उतना बाहर नहीं जा रहे हैं, जैसे पहले जाया करते थे."

वीडियो कैप्शन, 137 लोगों के संक्रमित होने के बाद भारत में ताज महल समेत तमाम ऐतिहासिक इमारतें बंद.

विश्व स्वास्थ्य संगठन

डॉक्टर पॉपी लैम्बर्टन, ब्रिटेन की ग्लासगो यूनिवर्सिटी में स्वास्थ्य सेवाओं पर लेक्चर देते हैं.

डॉक्टर लैम्बर्टन कहते हैं, "सरकारों को इन मामलों में अपना रोल को कई गुना तक बढ़ाना होगा. कई देशों की सरकारों के पास पैसे नहीं हैं. वो ग़रीब देश हैं. लेकिन, वो अपने देश के आम नागरिकों जैसे ग़रीब नहीं हैं. अगर वायरस का प्रकोप बढ़ता है, तो उन्हें इतनी व्यवस्था कर के रखनी होगी कि पूरे के पूरे समुदाय को अलग-थलग करके रख सकें."

विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि वो इस महामारी से निपटने की तैयारी करने में तमाम देशों की सरकारों को सहयोग कर रहा है.

लेकिन, डॉक्टर एम्पेले का मानना है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन को एक ऐसा दिशा-निर्देश तैयार करना चाहिए, जो विकासशील देशों के लिए कारगर और व्यवहारिक हो.

वो इस बात की भी मांग कर रहे हैं कि ये महामारी अफ्रीका में भयंकर महामारी का रूप ले, इससे पहले, इस चुनौती से निपटने के अभियानों में अफ्रीका के स्थानीय समुदायों को भी शामिल किया जाए.

डॉ. पियरे

इमेज स्रोत, DR PIERRE MPELE

इमेज कैप्शन, डॉ. पियरे

ईश्वर से प्रार्थना

डॉक्टर एम्पेले कहते हैं, "उम्मीद जगाने वाली बात ये है कि कोरोना वायरस अफ्रीका में तेज़ी से नहीं फैल रहा है. यहां जिन लोगों में संक्रमण पाया गया है, ये वो लोग हैं जो चीन या यूरोप की यात्रा करके लौटे थे. हमें अभी इस बात का कारण नहीं पता कि अफ्रीका में ये वायरस तेज़ी से क्यों नहीं फैल रहा है."

विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि स्थानीय स्तर पर संक्रमण, यानी उन लोगों में इन्फेक्शन होना जो कहीं यात्रा पर नहीं गए, अफ्रीकी महाद्वीप में बहुत कम है. और ऐसी स्थिति में इसे नियंत्रित रखना सबसे उचित रणनीति है.

उधर, नैरोबी की मुकुरू बस्ती में ऐसा लगता है कि पिछले कुछ हफ़्तों में कुछ भी नहीं बदला

सेलेस्टाइन कहती हैं कि वो ख़ुद को लाचार महसूस करती हैं. और, बचाव के लिए बस वही उपाय कर पा रही हैं, जो वो जानती हैं.

सेलेस्टाइन कहती हैं, "मैं ईश्वर से प्रार्थना कर रही हूं कि वो हमारे परिवार और इस बस्ती को वायरस के प्रकोप से बचाए रखे."

छोड़िए YouTube पोस्ट
Google YouTube सामग्री की इजाज़त?

इस लेख में Google YouTube से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले Google YouTube cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.

चेतावनी: तीसरे पक्ष की सामग्री में विज्ञापन हो सकते हैं.

पोस्ट YouTube समाप्त

कोरोना वायरस हेल्पलाइन

इमेज स्रोत, MohFW, GoI

कोरोना वायरस के बारे में जानकारी

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)