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दिल्ली के घरों में काम करने वाली औरतों की ये हैं मांगें
- Author, भूमिका राय
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
एक दिन काम करने वाली घरेलू मेड न आए तो घर तितर-बितर हो जाता है. ख़ासतौर पर वो घर जहां पति-पत्नी दोनों ही काम पर जाते हों.
मेड आज के समय में ज़्यादातर मध्यमवर्गीय परिवारों की ज़रूरत बन चुकी हैं. कई घरों में तो पहली चाय से लेकर रात के खाने तक की ज़िम्मेदारी इन्हीं पर होती है.
लेकिन क्या आपने अपनी मेड से कभी ये पूछा है कि वो आपके यहां काम करके ख़ुश हैं? ये तय है कि काम करना उनकी मजबूरी है, लेकिन क्या आप उनके साथ अच्छा व्यवहार करते हैं?
ऐसे ही बहुत सारे सवाल लिए देश के अलग-अलग हिस्सों से घरेलू कामगार गुरुवार को दिल्ली की पार्लियामेंट स्ट्रीट पर जमा हुए. दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान के साथ-साथ पूर्वोत्तर तक से घरेलू कामगार यहां पहुंचे थे.
प्रदर्शन
देश के अलग-अलग हिस्सों से आए इन लोगों की संख्या सैकड़ों में थी, लेकिन मांग सबकी एक ही थी. ये प्रदर्शन नेशनल प्लेटफॉर्म फ़ॉर डोमेस्टिक वर्कर्स और सेंट्रल ट्रेड यूनियन के नेतृत्व में हुआ.
प्रदर्शन कर रहे लोगों की मांग है कि नए श्रम क़ानून को वापस लिया जाए. नेशनल प्लेटफॉर्म फ़ॉर डोमेस्टिक वर्कर्स के सदस्य रवींद्र कुमार कहते हैं कि वे घरेलू कामगारों के अधिकारों को सुरक्षित करने की मांग को लेकर यहां आए हैं.
उनकी प्रमुख मांगें हैं....
- वेतन और काम के घंटे तय हों
- चार अवकाश का अधिकार
- मानवीय व्यवहार
- सामाजिक सुरक्षा
नेशनल प्लेटफ़ॉर्म फ़ॉर डोमेस्टिक वर्कर्स की संयोजक अनीता जुनेजा का कहना है कि भारत में कितने घरेलू कामगार हैं, इसका सही अनुमान लगा पाना मुश्किल है.
संस्था की प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार नेशनल सैंपल सर्वे (एनएसएस) के 2005 के आंकड़ों के मुताबिक़ देश में कुल 47 लाख घरेलू कामगार थे लेकिन कुछ रिपोर्ट्स के हवाले से कहा गया है कि अब इनकी संख्या 9 करोड़ के आस-पास है.
अनीता कहती हैं, "डोमेस्टिक वर्कर्स को लेकर आज तक कोई सर्वे हुआ ही नहीं है जिससे ये पता चल सके कि उनकी प्रमाणिक संख्या कितनी है. जो आंकड़े हैं वो अलग-अलग आधार पर हैं."
अनीता कहती हैं कि 2008 में बने 'अनऑर्गनाइज्ड़ वर्कर्स सोशल सिक्योरिटी एक्ट' में भले ही घरेलू कामगारों को अब शामिल कर लिया गया हो, लेकिन उसमें जो बातें कही गई हैं वो बहुत स्पष्ट नहीं हैं.
अनीता कहती हैं, "सरकार ने समाजिक सुरक्षा देने के बदले हमारा सहयोग तो तय कर लिया है, लेकिन घरेलू कामगारों का वेतन तो तय ही नहीं होता."
हालांकि अनीता इस बात से ख़ुश हैं कि घरेलू कामगारों को अब नए श्रम क़ानून में श्रमिक मान लिया गया है.
घरेलू कामगारों की मांगें
ये क़ानून असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले कामगारों के वेतन को नियमित करने, काम करने की परिस्थितियों की बेहतरी और उन पर हो रहे अत्याचार को देखने के लिए लाया गया था.
लेकिन उसके बाद से डोमेस्टिक वर्कर्स के लिए अलग से क़ानून बनाने की मांग की जा रही थी. 10 साल से ज्यादा से ये मांग की जा रही है, लेकिन सरकार ने अभी तक उनकी सुध नहीं ली.
प्रदर्शन में मौजूद ज़्यादातर महिलाओं की शिकायत थी कि उनके साथ अच्छा व्यवहार नहीं होता है. करनजीत नाम की एक मेड ने बताया कि जब वो छोटी थी तभी से घरों में साफ़-सफाई का काम कर रही है, लेकिन किसी भी घर में उसे इज़्जत नहीं मिली.
करनजीत कहती हैं, "न तो हमें छुट्टी लेने का हक़ है न ही समय पर वेतन पाने का. वेतन बढ़ने की बात तो हम सोच भी नहीं सकते. चाहे जितना काम कर लो मालिकों को लगता है कि अभी थोड़ा और काम कर दे. जाते-जाते उन्हें काम याद आने लगते हैं. घर में कोई सामान नहीं मिले तो बिना सोचे-समझे हम पर चोरी का इल्ज़ाम लगा दिया जाता है."
संगठन के सदस्य रवींद्र की मांग है कि श्रम मंत्रालय एक ऐसा क़ानून बनाए जिससे मेड्स के अधिकारों को सुरक्षित किया जा सके.
रवींद्र कहते हैं, "क़ानून बन जाएगा तो काम को मान्यता मिलेगी, वेतन तय हो जाएगा, काम के घंटे तय हो जाएंगे, छुट्टी मिलेगी, मेडिकल की सुविधा मिलेगी, दुर्घटना हो गई तो मुआवज़ा मिलेगा. इनके लिए ऐसा कोई क़ानून नहीं है. अभी तो ये ऐसी हर सुविधा से दूर हैं."
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