फ़िदायीन चीटियां जो ख़ुद को उड़ा लेती हैं

चींटी

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    • Author, टीम बीबीसी हिन्दी
    • पदनाम, नई दिल्ली

नन्हीं चीटियों को उनकी मेहनत की वजह से जाना जाता है. वो धुन की पक्की होती हैं और बिना काम पूरा किए नहीं रुकतीं.

इसके अलावा उनकी तारीफ़ इसलिए भी होती है कि वो ख़ुद काफ़ी छोटी होने के बावजूद अपने से कई गुना ज़्यादा वज़न उठाकर ले जाती हैं. चीटियों का सामाजिक ताना-बाना भी गज़ब का है.

लेकिन अब ऐसी ख़बर आई है जो आपको हैरान कर सकती है. दुनिया को अब ऐसी चीटियों के बारे में पता चला है कि जो शहादत देती हैं.

ये चीटियां फ़िदायीन हमलावर की तरह ख़ुद में धमाका कर लेती हैं. जी हां, आपने सही पढ़ा.

न्यूयॉर्क टाइम्स ने जर्नल ज़ूकीज़ में छपी स्टडी के हवाले से बताया है कि ब्रुनेई के कुआला बेलालॉन्ग फ़ील्ड स्टडीज़ सेंटर के सामने पेड़ों के क़रीब चीटियों के ऐसे कई घर हैं, जो अपने घर पर हमला होने की सूरत में अपनी जान देने से भी पीछे नहीं हटतीं.

इन चीटियों को धमाका करने की ख़ास प्रवृति की वजह से कोलोबोपसिस एक्सप्लोडेंस कहा जाता है.

जब इनके घोंसलों पर हमला या अतिक्रमण किया जाता है तो वो अपने पेट में धमाका कर लेती हैं.

ऐसा करने से उनके पेट से चिपचिपा, चमकीला, पीला फ़्लूइड निकलता है, जो ज़हरीला होता है. जिस तरह मधुमक्खी डंक मारने के बाद दम तोड़ देती है, उसी तरह ये चींटियां भी अपनी जान दे देती हैं.

लेकिन उनकी ये शहादत कॉलोनी को बचा लेती है.

वैज्ञानिक ख़ुद फटने वाली इन चीटियों के बारे में दो सौ साल से ज़्यादा वक़्त से जानते हैं और सबसे पहले 1916 में इनके बारे में लिखा गया था.

लेकिन साल 1935 से इस समूह की चींटियों को कोई आधिकारिक नाम नहीं दिया गया था.

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