अरुण जेटली: एक आदमी की किडनी दूसरे में कैसे फ़िट हो जाती है?

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- Author, भरत शर्मा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
''मेरा किडनी से जुड़ी दिक्कतों और इंफ़ेक्शन की वजह से इलाज चल रहा है. इसलिए मैं फिलहाल घर के नियंत्रित माहौल में रहकर काम कर रहा हूं. आगे क्या इलाज होना है, ये डॉक्टर तय करेंगे.''
अरुण जेटली ने चार दिन पहले ये ट्वीट कर देश-दुनिया को बताया था कि वो किडनी से जुड़ी समस्याओं का सामना कर रहे हैं.
इसके बाद रविवार को ख़बर आई कि केंद्रीय वित्त मंत्री को एम्स में डायलिसिस पर रखा गया है और उनका किडनी ट्रांसप्लांट किया जाना है.
पहले ट्रांसप्लांट सर्जरी रविवार को होने वाली थी, लेकिन जेटली को डायबिटीज है इसलिए देरी हो रही है. जेटली को किडनी देने वाला शख़्स मिल गया है लेकिन उसकी पहचान गोपनीय रखी गई है.
किडनी की ज़िम्मेदारियां?

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लेकिन किडनी ट्रांसप्लांट है क्या? ये कैसे कामयाब या नाकाम हो सकता है? किस तरह एक शरीर से किडनी निकालकर दूसरे में लगा दी जाती है और वो काम भी करती है?
जैसा कि हम जानते हैं कि इंसानी शरीर में दो किडनी होती हैं और अगर इनमें से एक ख़राब हो जाए या फिर निकाल दी जाए तो भी काम चल सकता है.
किडनी बीन के आकार वाला ऑर्गन है, जो रीढ़ के दोनों तरफ़ होती हैं. आम तौर पर माना जाता है कि ये पेट के पास होती है लेकिन असल में ये आंत के नीचे और पेट के पीछे की तरफ़ होती है.
हर किडनी चार या पांच इंच की होती है. इनका मुख्य काम होता है ख़ून की सफ़ाई यानी छन्नी की तरह ये लगातार काम करती रहती है. ये वेस्ट को दूर करती हैं, शरीर का फ़्लूड संबंधी संतुलन बनाने के अलावा इलेक्ट्रोलाइट्स का सही स्तर बनाए रखती हैं. शरीर का ख़ून दिन में कई बार इनसे होकर गुज़रता है.
नेफ़्रोन क्या होते हैं?

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ख़ून किडनी में पहुंचता है, वेस्ट दूर होता है और ज़रूरत पड़ने पर नमक, पानी और मिनरल का स्तर एडजस्ट होता है. वेस्ट पेशाब में बदलता है और शरीर से बाहर निकल जाता है.
ये भी मुमकिन है कि किडनी अपने सिर्फ़ 10 फ़ीसदी स्तर पर काम कर रही है और शरीर इसके लक्षण भी न दे, ऐसे में कई बार किडनी के गंभीर इंफ़ेक्शन और फ़ेल होने से जुड़ी दिक्कतों के बारे में काफ़ी देर से पता चलता है.
हर किडनी में लाखों छोटे फ़िल्टर होते हैं जिन्हें नेफ़्रोन कहा जाता है. अगर ख़ून किडनी में जाना बंद हो जाता है, तो उसका वो हिस्सा काम करना बंद कर सकता है. इससे किडनी फ़ेल हो सकती है.
किडनी ट्रांसप्लांट क्या और कैसे होता है?

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किडनी ट्रांसप्लांट उस प्रक्रिया का नाम है जिसमें एक व्यक्ति के शरीर से किडनी निकालकर दूसरे के शरीर में डाली जाती है, जिसकी किडनी ने काम बंद कर दिया हो या ख़राब होने वाली है.
आम तौर पर क्रोनिक किडनी डिसीज़ या किडनी फ़ेल होती है तो ट्रांसप्लांट की ज़रूरत होती है. अरुण जेटली के मामले में ये ऑपरेशन करने से पहले डायलिसिस हो रहा है.
ये दरअसल ख़ून साफ़ करने से जुड़ी प्रक्रिया है जो ट्रांसप्लांट से पहले ज़रूरी होती है. हालांकि, इसमें दिक्कतें और वक़्त ज़रूर लगता है.
लेकिन क्या ये प्रक्रिया इतनी आसान है, जितना उसके बारे में बात करने में लगता है. जवाब है, नहीं.
लेकिन आसान नहीं पूरी प्रक्रिया

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दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल के नेफ़्रोलॉजी डिपार्टमेंट के डॉ डी एस राणा के मुताबिक इस प्रक्रिया में सबसे ज़रूरी है ऐसे व्यक्ति का होना, जिसकी दोनों किडनी पूरी तरह सेहतमंद हों. यही व्यक्ति डोनर होता है.
उन्होंने कहा, ''आम तौर पर किडनी दान करने वाला व्यक्ति जान पहचान का होता है लेकिन ऐसा ज़रूरी नहीं है. इसके अलावा ये उतना ही ज़रूरी है कि वो स्वेच्छा से ऐसा कर रहा हो.''
किडनी ट्रांसप्लांट में ख़ून और ब्लड ग्रुप का क्या महत्व होता है, डॉ राणा ने बताया, ''मरीज़ और डोनर का ब्लड ग्रुप एक हो, ये अच्छा है.''
''या फिर दान करने वाले व्यक्ति का ब्लड ग्रुप ओ होना चाहिए जिसे यूनिवर्सल डोनर ब्लड ग्रुप कहा जाता है. हालांकि, दोनों का ब्लड मैच न करने के बावजूद किडनी ट्रांसप्लांट हो सकता है.''
कितने घंटे का होता है ऑपरेशन?

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अगर अरुण जेटली किडनी ट्रांसप्लांट से गुज़रेंगे तो ये ऑपरेशन कितनी देर चलेगा, उन्होंने बताया, ''इसमें दो से चार घंटे लगते हैं और जैसे ही किडनी काम करने लगती है तो मरीज़ की रिकवरी शुरू हो जाती है. और डोनर को भी चार-पांच दिन बाद आम तौर पर डिस्चार्ज कर दिया जाता है.''
लेकिन क्या किडनी बदलने के बाद मरीज़ सामान्य रह पाता है? डॉक्टर राणा ने बताया कि किडनी ट्रांसप्लांट की प्रक्रिया सामान्य नहीं है. इसमें आप एक शरीर से कोई अहम अंग निकालकर दूसरे शरीर में डालते हैं, तो ये जटिल तो है ही.
उन्होंने कहा, ''किडनी रिजेक्शन का ख़तरा हमेशा रहता है. किडनी बदलने के शुरुआती सौ दिनों में ख़तरे ज़्यादा होते हैं लेकिन बाद में भी ऐसा हो सकता है. किडनी ट्रांसप्लांट के एक साल के बाद भी कामयाब रहने की संभावनाएं 90 फ़ीसदी के क़रीब हैं.''
किन लोगों का किडनी ट्रांसप्लांट हो सकता है?

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ब्रिटेन की नेशनल हेल्थ सर्विस के मुताबिक किडनी एक शरीर से निकालकर दूसरे में डालने के मामले में उम्र का इतना फ़र्क नहीं पड़ता लेकिन ये चीज़ें ज़रूरी हैं:
- मरीज़ में सर्जरी के असर और प्रभाव झेलने की क्षमता हो
- ट्रांसप्लांट के बाद उसके कामयाब होने की संभावनाएं हों
- ऑपरेशन के बाद ज़रूरी दवाएं और इलाज के लिए मरीज़ तैयार हो
- अगर पहले से कोई इंफ़ेक्शन है तो पहले उसका इलाज किया जाता है
- किडनी फ़ेल होने के मामले में हर तीन में से एक व्यक्ति ट्रांसप्लांट की प्रक्रिया से गुज़र सकता है
किडनी कहां से आती है?

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अगर किडनी दान देने वाला व्यक्ति जीवित है तो ऑपरेशन की पूर्व तैयारी की जाती है लेकिन अगर किसी मृत व्यक्ति से किडनी ली जानी है तो ट्रांसप्लांट सेंटर किडनी उपलब्ध होने पर जानकारी देता है.
इसके बाद सर्जरी होती है जिसमें नई किडनी डाली जाती है और फिर उसे मरीज़ के ब्लड वेसल और ब्लैडर से जोड़ा जाता है.
नई किडनी पेट के निचले हिस्से में लगाई जाती है. आम तौर पर किडनी बायें हिस्से की तरफ़ होती हैं. लेकिन किडनी ट्रांसप्लांट में कई ख़तरे होते हैं.
छोटी अवधि में ख़ून के थक्के जमने या इंफ़ेक्शन के ख़तरे होते हैं जबकि लंबे दौर में मधुमेह और गंभीर इंफ़ेक्शन के ख़तरे होते हैं. क्योंकि किडनी ट्रांसप्लांट के बाद ख़तरे होते हैं, ऐसे में नियमित जांच ज़रूरी होते हैं.
किडनी ट्रांसप्लांट के बाद क्या?

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जिस मरीज़ को नई किडनी मिलती है, उसे आगे ख़ास ख़्याल रखना होता है. ऐसे मरीज़ों को कुछ बातों का ध्यान रखना होता है:
- अगर धुम्रपान करते हों तो छोड़ दे
- सेहतमंद डाइट ले
- अगर मोटे हैं तो वज़न घटाएं
- इंफ़ेक्शन से बचने की कोशिश करें
अब ये सवाल कि किडनी ट्रांसप्लांट के बाद कितने वक़्त तक मरीज़ जिएगा? ये कई बातों पर निर्भर करता है. किडनी किससे मिली है, ब्लड ग्रुप और टिश्यू टाइप क्या है और जिसे नई किडनी लग रही है, उसकी सेहत कैसी है.
किडनी ट्रांसप्लांट के बाद औसत जीवनकाल:
- एक साल - 95%
- पांच साल - 85-90%
- दस साल - 75%
अगर किडनी ट्रांसप्लांट नाकाम रहता है तो फिर दूसरे ट्रांसप्लांट के लिए तैयारी करनी पड़ती है और तब तक मरीज़ को डायलिसिस पर रखा जाता है.












