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इराक़ से आए शव हमारे ही हैं, कैसे पता चला?
- Author, भरत शर्मा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
साल 2014 में 40 भारतीय इराक़ के मूसल शहर में लापता हो गए थे. इनमें से एक भाग निकला और दावा किया कि बाक़ी सभी 39 मारे जा चुके हैं.
तब इस दावे को ख़ारिज कर दिया गया था. सरकार ने कहा था कि जब तक उनके मारे जाने के सबूत नहीं मिलते, उन्हें जीवित माना जाएगा.
लेकिन कुछ दिन पहले जब संसद में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज बयान देने खड़ी हुई तो किसी को इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि 39 परिवारों की उम्मीद पल भर में टूट जाएगी.
इन शवों के अवशेष लेने इराक़ गए विदेश राज्य मंत्री वीके सिंह ने कहा कि 38 भारतीयों के अवशेष भारत पहुंच चुके हैं. एक शव का डीएनए मैच होने में दिक्कत हुई.
डीएनए सैम्पल से हुई पहचान
सुषमा स्वराज ने राज्यसभा में बताया था कि इराक़ में 2014 में लापता हुए 40 भारतीयों में से 39 मारे गए हैं और उनकी हत्या के लिए चरमपंथी संगठन आईएसआईएस ज़िम्मेदार है.
इस मौक़े पर विदेश मंत्री ने कहा कि मौत की पुष्टि मृतकों के परिजनों के डीएनए सैम्पल मैच करा कर किया गया है.
सुषमा ने ये भी बताया कि शवों को क़ब्र खोद कर निकाला गया था और तभी इस बात की जानकारी मिली. सभी शव एक ही क़ब्र में मिले थे.
वी के सिंह गए शव लेने
उन्होंने कहा कि चारों राज्यों की सरकारों से डीएनए सैम्पल मंगवाए गए थे और फिर शवों के साथ मिलाया गया. डीएनए मैच से बड़ा सबूत कुछ नहीं हो सकता है.
विदेश राज्य मंत्री वी के सिंह को इराक़ भेजकर शव भारत लाने की ज़िम्मेदारी दी गई. वो रविवार को रवाना हुए थे और सोमवार को लौट आए.
इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक 39वां शव भारत नहीं लाया जा रहा है क्योंकि डीएनए टेस्टिंग से सिर्फ़ 70 फ़ीसदी मैच मिला है, जबकि दूसरों के मामले में ये 95 फ़ीसदी से ज़्यादा है.
शवों को देखने की इजाज़त नहीं?
कुछ परिवारों का कहना है कि उन्हें ताबूत खोलकर न देखने और जल्द से जल्द अंतिम संस्कार करने की हिदायत दी गई है.
इसकी वजह समझी भी जा सकती है. जो शव कई महीनों से ज़मीन के नीचे दबा था, वो किस हालत में रहा होगा? लेकिन जो शव इतने ख़राब हालत में हो, उसकी पहचान कैसे कर ली गई?
कैसे पता चला होगा कि जो शव मिले हैं, वो भारतीय का है? और ये कैसे सुनिश्चित किया जाएगा कि बिहार वाले का शव पंजाब न पहुंचे और पंजाब वाले का बिहार?
क्या होता है डीएनए?
ये सारी चीज़ें मुमकिन हुई हैं डीएनए की वजह से. विदेश मंत्री ने भी कई बार ज़िक्र किया कि डीएनए मैच कराने के बाद ही शवों की शिनाख़्त की गई है.
लेकिन ये डीएनए होता क्या है? इसे डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिक एसिड कहते हैं. डीएनए मॉलेक्यूल से बना होता है जिसे न्यूक्लियोटाइड कहते हैं. हर न्यूक्लियोटाइड में एक फ़ॉस्फ़ेट ग्रुप, एक शुगर ग्रुप और नाइट्रोजन बेस होता है.
और ये शवों की पहचान करने में कैसे काम आता है और डीएनए टेस्टिंग के लिए शव से कहां से सैम्पल लेना सबसे अच्छा होता है?
कहां से लिया जाता है सैम्पल?
ख़ून, टिश्यू या फिर बालों की जड़ से डीएनए लिया जा सकता है. अगर शव को दबे कई दिन हो चुके हैं और वो काफ़ी ख़राब हालत में है तो ह्यूमरस या फ़ीमर जैसी लंबी हड्डियों से सैम्पल लिए जा सकते हैं.
इसके अलावा दांत भी डीएनए सैम्पल लेने के काम आते हैं.
दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान यानी एम्स के फ़ॉरेंसिक चीफ़ डॉक्टर सुधीर गुप्ता ने बीबीसी को बताया डीएनए को दुनिया भर में सबसे वैज्ञानिक तरीका माना जाता है और सैम्पल जांच के लिए ब्लड रिलेटिव चाहिए होता है.
और शव कैसे पहचाना जाता है?
मां-बाप, बेटा-बेटी या दादा-दादी, पोता-पोती हो, इनसे सैम्पल लिया जा सकता है. इसके बाद शव के सॉफ़्ट टिश्यू या बोन मैरो को इस सैम्पल से मिलाया जाता है.
लेकिन ऐसा कहा जा रहा है कि एक सैम्पल का 70 फ़ीसदी मैच मिला है, इसका क्या मतलब है?
डॉ गुप्ता ने कहा, ''इसमें पर्सेंटेज़ कुछ नहीं होता. लोकाई होता है. अगर एक स्तर तक लोकाई मैच होता है, तो सैम्पल मैच माना जाता है. 12-15 चीज़ें मैच की जाती हैं. और इन सभी के नतीजे मिलकर फ़ैसले पर पहुंचा जाता है.''
शव सड़ जाए, फिर भी मैचिंग?
शव इतने दिन तक दबा रहता है, फिर टिश्यू कैसे बचे रहते हैं? इसके जवाब में उन्होंने कहा, ''बोन मैरो से सैम्पल मिल जाते हैं, बालों से मिल जाते हैं.''
और कितने वक़्त बाद तक शव इस स्थिति में रहता है कि उससे सैम्पल के लिए टिश्यू मिल जाएं, इस पर उन्होंने कहा, ''जब तक शव में से टिश्यू मिल सकते हैं, डीएनए मैच किया जा सकता है.''
''और टिश्यू कब तक बचे रहते हैं, ये अलग-अलग बातों पर निर्भर करता है. कुछ मामलों में सालों-साल तक. ख़ास तौर से बोन मैरो से सैम्पल मिल जाते हैं.''
डीएनए से पहले क्या होता था?
और किन चीज़ों से डीएनए मैच किया जा सकता है, डॉ गुप्ता ने कहा, ''ख़ून, बाल, नाख़ून, लार, बोन मैरो, इन सभी से मैचिंग की जा सकती है.''
डीएनए मैचिंग से पहले शवों की पहचान कैसे की जाती थी, उन्होंने बताया, ''बहुत मुश्किल या यूं कहें कि क़रीब-क़रीब नामुमकिन होता था.''
''जबड़े के आकार या फिर दूसरी शारीरिक संरचनाओं से अंदाज़ा लगाया जाता था लेकिन डीएनए के बाद ये सब बहुत आसान हो गया.''
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