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क्राइम कॉल सेंटर का इंडिया कनेक्शन
- Author, जिऑफ़ व्हाइट
- पदनाम, टेक्नॉलॉजी रिपोर्टर
ब्रिटेन में टेलीफोन सर्विस मुहैया कराने वाली कंपनी 'टॉक टॉक' के ग्राहकों से धोखाधड़ी की कोशिश की गई है. बड़े पैमाने पर इस फ्रॉड को अंजाम देने वालों के तार भारत से जुड़े बताए जा रहे हैं.
इस ब्रितानी कंपनी के ग्राहकों को फंसाने के लिए सैंकड़ों स्टाफ रखे गए थे और उन्हीं में से एक ने इसका भंडाफोड़ कर दिया.
तीन सूत्रों ने इस आपराधिक मुहिम के बारे में तफसील से जानकारी दी है. उनका कहना है कि इसके लिए दो फ्रंट कंपनियां बनाई गईं और ऐसा करने वाले लोगों का धंधा ही फर्जीवाड़ा करना था.
ये सूत्र भारत के दो शहरों में मौजूद कॉल सेंटर्स में काम कर रहे हैं. उन्होंने बताया कि हरेक ऑफिस में तकरीबन 60 स्टाफ, शिफ्टों में काम करते हैं और उनका टारगेट 'टॉक टॉक' के ग्राहकों से बात कर उनके बैंक खातों की जानकारी हासिल करना है.
विसलब्लोअर्स का कहना है कि इसके लिए उन्हें स्क्रिप्ट दी गई थी. उन्हें 'टॉक टॉक' के ग्राहकों के सामने ये दावा करना था कि वे कंपनी की तरफ से फोन कर रहे हैं. टारगेट को अपने कंप्यूटर पर एक वायरस इंस्टॉल करने के लिए मनाना उनका काम था.
उन्होंने बताया कि इस वायरस का इस्तेमाल करने के लिए अलग से एक टीम बनाई गई थी जिसका काम टारगेट के ऑनलाइन बैंकिंग में सेंधमारी करना था.
हालांकि इन सूत्रों के दावों का किसी स्वतंत्र सूत्र से पुष्टि करना मुमकिन नहीं है लेकिन इस फर्जीवाड़े की बारीक बातों का वे बड़े तफसील से ब्योरा दे रहे हैं.
'टॉक टॉक' के ग्राहकों से अतीत में हुए फर्जीवाड़ों के मामलों से इन सूत्रों के दावे काफी हद तक मेल खाते हैं.
यहां तक कि फ्रॉड का शिकार हए एक महिला ने उस बातचीत के बारे में बताया जिसकी वजह से उन्हें पांच हजार पाउंड यानी तकरीबन चार लाख रुपये की चपत लगी थी.
इस पीड़ित महिला से मिली जानकारी सूत्र के स्क्रिप्ट वाले दावे की तसदीक करते थे.
अक्टूबर, 2015 में 'टॉक टॉक' सायबर हमले का शिकार हुआ था लेकिन उस घटना के तार भारत से नहीं जोड़े गए थे. इसके बदले कंपनी को सेवाएं दे रही एक दूसरी कंपनी की समस्याओं से इसे जोड़ा गया.
साल 2011 में 'टॉक टॉक' ने कॉल सेंटर वाले काम का कुछ हिस्सा कोलकाता आउटसोर्स कर दिया. कोलकाता में ये कंपनी विप्रो थी जो भारत की सबसे बड़ी आईटी कंपनियों में से एक है.
पिछले साल विप्रो के ही एक कर्मचारी को 'टॉक टॉक' ग्राहकों का डेटा बेचने के शक में गिरफ्तार किया गया था.
अक्टूबर, 2015 की साइबर हमले वाली घटना के बाद 'टॉक टॉक' ने फॉरेंसिक जांच की और इसके बाद विप्रो स्टाफ की गिरफ्तारी हो पाई.
'टॉक टॉक' की प्रवक्ता का कहना है, "हमें मालूम है कि कुछ अपराधी ब्रिटेन और दूसरी अंतरराष्ट्रीय कंपनियों को निशाना बना रही हैं. हम अपने ग्राहकों की सुरक्षा की जिम्मेदारी गंभीरता से ले रहे हैं. हमने स्पैमर्स के खिलाफ अभियान भी शुरू किया है."
विप्रो ने इस सिलसिले में पूछे गए हमारे सवालों के जवाब नहीं दिए.
विसलब्लोअर्स ने जिन दो कंपनियों के नाम लिए थे, उन्होंने भी इन आरोपों को पुरजोर तरीके से खारिज किया और जोर देकर कहा कि वे लीगल बिजनेस कर रहे हैं.