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मंत्रिमंडल में कई समीकरणों का समावेश | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के करीब 12 दिन बाद आख़िरकर भारत को संपूर्ण मंत्रिमंडल और सरकार मिल गई है( अगर जल्द ही विभागों की घोषणा भी हो जाए तो). 78 सदस्यीय कैबिनेट के गठन में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को अच्छी ख़ासी मशक्कत करनी पड़ी है. जिस तरह का जनादेश यूपीए और कांग्रेस के मिला था, उम्मीद जताई जा रही थी कि अबकी बार सब कुछ निर्विघ्न चलेगा लेकिन पाँच साल की पारी की शुरुआत में ही मंत्रिमंडल गठन को लेकर अड़चनें आईं. सहयोगी पार्टियों के मान मुनव्वल और कांग्रेस की अंदरूनी कमशकश में शुरुआती दिन ज़ाया हो गए. विभिन्न रंगों वाले मंत्रिमंडल के गठन का काम पूरा हो चुका है जिसमें 28 वर्षीय युवा मंत्री अगाथा संगमा हैं तो 77 वर्षीय मंत्री एसएम कृष्णा है, फ़ारुक़ अब्दुल्ला-सचिन पायलट के रूप में ससुर-दामाद की जोड़ी है तो कई ऐसे लोग भी हैं जिनके मंत्रिमंडल में होने और न होने दोनों पर हैरत जताई जा रही है. नए, पुराने चेहरे
नए मंत्रिमंडल से आशा थी कि उसमें विभिन्न क्षेत्रों, युवाओं, महिलाओं और अनुभवी नेताओं का सटीक मिश्रण होगा लेकिन बहुत से लोगों को इस मायने में थोड़ी निराशा होगी. मंत्रिमंडल में इस बार भी युवाओं की तुलना में वरिष्ठ नेताओं को ज़्यादा तरजीह दी गई. बड़ी संख्या में युवा इस बार चुन कर आए लेकिन 40 की उम्र से नीचे वाले करीब सात को ही मंत्रीमंडल में जगह मिली है जिसमें ज्योतिरादित्य सिंधिया, सचिन पायलट, अगाथा संगमा, जतिन प्रसाद शामिल हैं. कई वरिष्ठ नेता मंत्रिमंडल का हिस्सा है जिसमें से नौ किसी न किसी राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके हैं- हिमाचल से वीरभद्र सिंह, जम्मू कश्मीर से फ़ारुक़ अब्दुल्ला, सुशील कुमार शिंदे, शरद पवार, एसएम कृष्णा, वीरप्पा मोइली, एके एंटनी, ग़ुलाम नबी आज़ाद, और विलासराव देशमुख. विलासराव देशमुख को लेकर कई सवाल उठाए जा रहे हैं. अभी छह महीने पहले ही मुंबई हमलों के बाद उन्हें महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद से हटना पड़ा था. लेकिन महाराष्ट्र में आगामी चुनावों को देखते हुए मराठवाड़ा के इस नेता को दरकिनार करना कांग्रेस ने शायद मुनासिब नहीं समझा. क्षेत्रीय संतुलन
अब नज़र डालते हैं कि किस राज्य के खाते में कितने मंत्री गए. सबसे ज़्यादा प्रतिनिधित्व तमिलनाडू, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल को मिला है. तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल दोनों ही राज्यों से कांग्रेस की मुख्य सहयोगी पार्टियों के लोगों को फ़ायदा मिला. पश्चिम बंगाल से आठ तो महाराष्ट्र से नौ लोग (पाँच कैबिनट)मंत्री बने हैं. जबकि कांग्रेस के लिए अच्छा प्रदर्शन करने वाले कई राज्यों को मायूसी मिली है. मसलन आंध्र प्रदेश से कांग्रेस को 33 सीटें मिलीं लेकिन मंत्रिपद केवल छह मिले हैं. राजस्थान में भी कांग्रेस का प्रदर्शन अच्छा रहा लेकिन चार सांसद (एक कैबिनेट पद) ही मंत्री बनाए गए. इससे उल्ट कर्नाटक जहाँ कांग्रेस की किरकिरी हुई उसे पांच पद मिले. वहाँ से कांग्रेस को छह ही सीट मिली थी. सात सीटें जितवाने वाली दिल्ली को तीन पद मिले तो पंजाब से भी तीन लोग मंत्री बनें. वीरभद्र सिंह के रूप में केवल एक सांसद लाने वाले हिमाचल से दो लोग मंत्री हैं, आनंद शर्मा को कैबिनेट मंत्री बनाया गया है. वहीं कांग्रेस की 'सक्सेस स्टोरी' कही जाने वाले उत्तर प्रदेश से एक भी कैबिनेट मंत्री नहीं है. उसे कुल पाँच मंत्री मिले हैं. पिछली बार के मुकाबले मुस्लिम मंत्री भी कम है. वंशवाद
मंत्रिमंडल पर वंशवाद का साया भी देखा जा सकता है. पिता, पुत्र, पुत्री, ससुर, दामाद सब इस सूची में शामिल है. ज्योतिरादित्य सिंधिया और अगाथा संगमा जैसे सांसद तो हैं ही, जितेंद्र प्रसाद के बेटे जतिन प्रसाद, एनटी रामा राव के बेटी डी पुरंदेश्वरी, पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह की पत्नी परनीत कौर, माधव सिंह सोलंकी के बेटे भरत सिंह सोलंकी समेत कई नाम हैं जो राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं. इसके अलावा डीएमके परिवार की उपस्थिति तो मंत्रिमंडल में है ही. सचिन पायलट ने जहाँ पहली बार बतौर मंत्री शपथ ली तो उनके ससुर फ़ारुक़ अब्दुल्ला ने भी उसी समारोह में शपथ लेते नज़र आए. मंत्रिमंडल में कई नए चेहरे हैं जो पिछली बार की सरकार में नहीं थे जिसमें शशि थरूर जैसे मंत्रियों का नाम है. अगर महिलाओं की बात करें तो मनमोहन सिंह सरकार में कुल नौ महिला मंत्री हैं. मीरा कुमार, ममत बैनर्जी, अंबिका सोनी और कुमारी शैलजा कैबिनेट मंत्री हैं. ख़ैर 78 मंत्रियों वाला जंबो मंत्रिमंडल अब गठित हो गया है. प्रधानमंत्री ने 100 दिन के एक्शन प्लैन की बात की है, उसमें से कई दिन तो पहले ही निकल चुके हैं. आर्थिक हालात से निपटने समेत यूपीए सरकार के सामने कई बड़ी चुनौतियाँ हैं.मंत्रीमंडल गठन का 'जटिल' काम पूरा होने के बाद अब नागरिकों को यही उम्मीद होगी कि यूपीए को मिले जनादेश के बाद सरकार इन चुनौतियों की कसौटी पर खरी उतरेगी. |
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