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सत्ता का दबदबा और विपक्ष का अफ़सोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बिहार में पहले चरण के मतदान वाले क्षेत्रों में सम्पन्न होने वाले चुनाव प्रचार की दो बातें ख़ास हैं. पहली ये कि जनता दल यूनाइटेड और भारतीय जनता पार्टी गठबंधन के स्टार प्रचारकों की बड़ी तादाद और साधन संपन्न प्रचार व्यवस्था का भारी दबदबा देखने में आया. दूसरी ये कि राष्ट्रीय जनता दल और लोक जनशक्ति पार्टी गठबंधन भी अपनी पूरी आक्रामकता के साथ प्रचार में जुटा रहा, लेकिन अंदर से वो अपना कुछ चोट खाया हुआ चेहरा भी नहीं छुपा सका. लालू प्रसाद और राबड़ी देवी ने आचार संहिता की परवाह किए बिना जो कड़े तीखे शब्दबाण चलाए शायद उसकी असली वजह वही चोट रही हो. लालू-राम विलास गठबंधन को शुरू में ये ज़रूर लगा था कि इस नई दोस्ती का बड़ा चमत्कारिक असर होगा लेकिन इस संभावना को न तो मीडिया की तरफ़ से और न ही ‘वोट बैंक’ वाले समाज की तरफ़ से कोई ख़ास बढ़ावा या प्रचार मिला. नीतीश कुमार की कमज़ोरियों को छिपाने वाली ताक़तों ने लालू-पासवान गठबंधन को कुछ ज़्यादा ही चिढ़ा दिया है. ख़ास तौर से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के माथे पर ‘विकास तिलक’ सजाने जैसे प्रचार अभियान पर ‘लालू-राबड़ी राज’ वालों का ग़ुस्सा फूटता रहा.
पेट में दांत लालू प्रसाद अक़सर कहा करते हैं कि ‘नीतीश के पेट में दांत है’. इस मुहावरे से सहमत लोगों में नीतीश कुमार के कई नज़दीकी मित्रों के भी नाम हैं लेकिन वक़्त की बात है कि इसका असर लोगों पर नहीं हो रहा है. जिस बात को राबड़ी देवी ने नीतीश कुमार को शर्मिंदा करने के लिए उछाल दिया था, उसे नीतीश कुमार ने अपने हक़ में राजनीतिक हवा बनाने के लिए मोड़ दिया. इसे नीतीश कुमार की चतुराई ही कहेंगे कि उन्होंने अब तक के अपने चुनाव प्रचार में लालू और राम विलास की तमाम दुखती रगों पर उंगली रख दी, जबकि लालू प्रसाद या राम विलास अपने विरोधी की इस चतुराई के तीर की कोई कारगर काट पैदा नहीं कर पा रहे हैं. दरअसल कांग्रेस को बिहार में बिल्कुल गया-गुज़रा मानते आ रहे जातीय क्षत्रपों को इस बार थोड़ा चौंकाने वाला आघात लगा है. तीन सीटों के टुकड़े फेंकने वाले अपमान की जैसी कांग्रेसी प्रतिक्रिया सामने आई उसकी कल्पना इन क्षत्रपों ने नहीं की होगी. मात्र पाँच सीटें छोड़ देने से बात बन जाती, ऐसा सब मानते हैं. अफ़सोस
राजद-लोजपा ख़ेमा अब अफ़सोस कर रहा है कि मात्र पाँच सीटें कांग्रेस के लिए छोड़ देने से बात बन जाती यानी संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) का ऐसा बिखराव तब नहीं होता. जदयू-भाजपा ने संप्रग के इस बिखराव को बिहार में लालू-पासवान विरोधी प्रचार का एक कारगर हथियार बना लिया है. राजद-लोजपा गठबंधन को अपने प्रचार अभियान में सबसे अधिक संकोच कांग्रेस पर निशाना साधने में होता है और कुछ ऐसी ही हालत यहाँ चुनाव प्रचार के लिए आने वाले कांग्रेसी नेताओं की भी है. और यही वो धर्म संकट है जिस पर जदयू-भाजपा गठबंधन की तरफ़ से चोट पड़ते देख लालू-राम विलास गठबंधन अंदर से बहुत छटपटाता है. हालाँकि लालू प्रसाद अपने गठबंधन के प्रचार अभियान को पिछड़ने नहीं देने की कला जानते हैं फिर भी इस बार उन्हें इस बाबत ज़्यादा मसाला नहीं मिल पा रहा है. | इससे जुड़ी ख़बरें 'हवा में उड़ जाएगा तीसरा मोर्चा'14 अप्रैल, 2009 | भारत और पड़ोस सोनिया के निशाने पर आए लालू11 अप्रैल, 2009 | चुनाव 2009 पहले दिल जुड़े फिर दल जुड़े: पासवान12 अप्रैल, 2009 | चुनाव 2009 'जॉर्ज चुनाव का बोझ उठाने में सक्षम नहीं'11 अप्रैल, 2009 | चुनाव 2009 बिहार: पहले चरण में नफ़ा-नुक़सान10 अप्रैल, 2009 | चुनाव 2009 | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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