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चुनाव ने अलगाववादियों की मुश्किलें बढ़ाई | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
आने वाले चुनाव में भारत प्रसाशित कश्मीर में अलगाववादी हुर्रियत गठबंधन की घटती लोकप्रियता की परिक्षा हो जाएगी. कट्टरपंथी नेता सैयद अलीशाह गिलानी के नेतृत्व वाला हुर्रियत गठबंधन पहले ही चुनाव के बहिष्कार का आह्वान कर चुका है. लेकिन अंग्रेज़ी बोलने वाले श्रीनगर की जामा मस्जिद के इमाम मीर वाइज़ उमर फ़ारूक़ के नेतृत्व वाली हुर्रियत का उदारवादी धड़ा इस मामले में सावधान है. मीर वाइज़ ने बीबीसी से कहा “इस बार हम लोग संयुक्त रूप से चुनाव के बहिष्कार का आह्वान करने का फ़ैसला नहीं ले सके हैं. हम लोग दो सप्ताह के अंदर फ़ैसला ले लेंगे.” इसके बावजूद कश्मीर के कई पर्यवेक्षकों का मानना है कि हुर्रियत नेतृत्व लोगों के समर्थने के बारे में आश्वस्त नहीं है. गिलानी अलगाववादी नेता के रूप में एकाधिकार रखते थे लेकिन दिल्ली में उनके इलाज को लेकर ये बात उठाई गई कि नेता के इलाज और सामान्य जनता को मिलने वाली सुविधाओं में कोई मेल नहीं है. बहरहाल हुर्रियत नेता ने अलगाववादी नेतृत्व के विरूद्ध बड़े पैमाने पर पाए जाने वाले आक्रोष को ख़ारिज करते हुए कहा “हुर्रियत कश्मीर घाटी में बेमानी नहीं हुई है.” उन्होंने कहा “हम लोग भारत के नौकर हैं और मालिक अपने नौकरों का ख़्याल रखने के लिए कृतज्ञ हैं.” फिर भी गिलानी ने माना कि हर आंदोलन के इतिहास में “उतार- चढ़ाव” आता रहता है. विभिन्न मत
हुर्रियत कॉंफ़्रेंस को 1993 में अपनी स्थापना से लेकर आज तक जनसमर्थन हासिल रहा है जो कि पिछले वर्ष उस वक़्त सब से ज़्यादा देखने में आया जब इस ने अमरनाथ मंदिर को ज़मीन देने के सरकारी फ़ैसले के विरुद्ध आंदोलन चालाया था. बहरहाल, उसके बाद से स्थिति में काफ़ी बदलाव आया. दिसंबर में होने वाले विधान सभा चुनाव में हुर्रियत के बहिष्कार के आह्वान के बाद भी 60 प्रतिशत से अधिक लोग वोट देने के लिए आए जो कि भारत के किसी भी राज्य में वोट डालने के प्रतिशत के हिसाब से काफ़ी अच्छा माना जा सकता है. हालांकि गिलानी इस बात पर ज़ोर देते हैं कि मतदान के आंकड़े नक़ली हैं लेकिन कश्मीर की जनता का अलग विचार है. एक नागरिक सामाजिक ग्रुप के महत्वपूर्ण सदस्य ख़ुर्रम परवेज़ ने बीबीसी को बताया कि लोगों ने विकास के लिए वोट डाले. उन्होंने कहा “ये वोट स्वतंत्रता आंदोलन के विरुद्ध नहीं डाले गए बल्कि रोज़ाना की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए डाले गए हैं.” इस वर्ष के शुरू में हुर्रियत की लोकप्रियता में आने वाली कमी पर सावाल उठाए गए. इस ग्रुप की एक कट्टर विरोधी प्रोफ़ेसर हमीदा नईम हैं. उन्होंने हुर्रियत के एक धड़े के ज़रिए आयोजित किए जानी वाले एक सेमिनार में पृथक्तावादी नेताओं से कहा कि “उन्होंने लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ किया है.” उन्होंने कहा “पिछले साल के आंदोलने में लोग हुर्रियत के लोकप्रिय नेतृत्व में एक जुट होकर निकले थे. हुर्रियत को चाहिए था कि वह भारत से संवैधानिक गारंटी के लाभों पर बात करती लेकिन पिछले साल उसने यह मौक़ा गंवा दिया गया.” प्रोफ़ेसर नईम ने ग़ुस्से में कहा “लेकिन रमज़ान के महीने का हवाला देकर अचानक आंदोलन को वापस ले लिया गया और इस ने पूरे आंदोलन को पंगू बना कर रख दिया.” निराशा
न सिर्फ़ पिछले साल के आंदोलन में हुर्रियत के नेतृत्व पर प्रश्न चिन्ह लगा बल्कि बहुत से कश्मीरी ये महसूस करते हैं कि अलगाववादी उनकी दैनिक समस्याओं के हल में विफल रहे हैं. कश्मीर विश्वविद्यालय में सामज शास्त्र के डीन प्रोफ़ेसर नूर अहमद बाबा ने कहा कि जहां तक कश्मीरियों की स्वैछा का स्वाल वह तो सदा से टाला हुआ है लेकिन हुर्रियत स्वास्थ, शिक्षा और रोज़गार की समस्याओं को भी हल कने में विफल रही. इस दूरी की जीती जागती मिसाल 35 वर्षीय गृहिणि सैरा नूर (नाम बदल दिया गया है) हैं. पंद्रह साल पहले भारतीय सेना ने उन्हें उस समय घर से घसीट कर मारा था जब वह गर्भ से थीं. उन्होंने कहा “मेरा गर्भपात हो गया तब से मैंने हुर्रियत का समर्थन शुरू कर दिया.” पिछले साल उन्हें रोज़गार से वंचित होना पड़ा जब एक भारतीय सॉफ़्टवेयर कंपनी ने व्यापक हिंसा के कारण कश्मीर में अपने काम को बंद करने का फ़ैसला किया. उन्होंने कहा “मैंने सुना है कि मीर वाइज़ उमर फ़ारूक़ पढ़ाई के लिए अमरीका जा रहे हैं, मैंने भी आंदोलन में भाग लिया और मुझे अपनी नौकरी गंवानी पड़ी.” जब मीर वाइज़ से इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि वे अंतरराष्ट्रीय संबंधों और कंफ़्लिक्ट मैनेजमेंट की पढ़ाई करने के लिए हार्ववर्ड यूनिवर्सिटी जाने की योजना रखते हैं. उन्होंने बीबीसी से कहा “हार्वर्ड में वह जो सीखेंगे उसके ज़रिए वो आंदोलन में अपना योगदान देंगे.” लेकिन उनके वहां जाने की उम्मीद कम है क्योंकि भारत सरकार ने उनका पासपोर्ट ज़ब्त कर रखा है. बहरहाल हुर्रियत के विरूद्ध कश्मीरियों का आक्रोष उन्हें किसी प्रकार भारत से क़रीब नहीं लाने वाला है. राजनीति शास्त्र के एक छात्र सुवैद यासीन ने, जिसने पिछले साल के आज़ादी समर्थक आंदोलन में भाग लिया था, बीबीसी को बताया, “कश्मीरी नेतृत्व भले ही विफल हो गया हो लेकिन कश्मीर का स्वतंत्रता आंदोलन ज़िंदा है.” उन्होंने कहा, “अलगाव वादी नेताओं ने हमें निराश किया है लेकिन इसका ये मतलब हरगिज़ नहीं कि हमने भारत की नीतियों का विरोध करना छोड़ दिया है.” | इससे जुड़ी ख़बरें चुनाव मैदान में उतरेंगी लोन की बेटी10 नवंबर, 2008 | भारत और पड़ोस हुर्रियत ने चुनाव बहिष्कार की अपील की10 नवंबर, 2008 | भारत और पड़ोस भारत प्रशासित कश्मीर में ढीला प्रचार10 नवंबर, 2008 | भारत और पड़ोस चुनाव की घोषणा पर मिश्रित प्रतिक्रिया19 अक्तूबर, 2008 | भारत और पड़ोस 'कश्मीर विवाद का हल बातचीत से ही'08 अक्तूबर, 2008 | भारत और पड़ोस हुर्रियत नेता की मौत, पूरे श्रीनगर में कर्फ़्यू11 अगस्त, 2008 | भारत और पड़ोस अमरनाथ मंदिर से जुड़े विवाद की जड़27 जून, 2008 | भारत और पड़ोस कश्मीर में आम हड़ताल के दौरान झड़पें05 अप्रैल, 2008 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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