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रविवार, 08 मार्च, 2009 को 17:48 GMT तक के समाचार
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महिलाओं के हाथ में सत्ता की चाबी

महिला राजनेता

राजनीति और वो भी भारत में एक ऐसा क्षेत्र रहा है जिसमें महिलाओं की उपस्थिति मात्र उत्सुकता और कौतूहल का विषय हुआ करती थी.

लेकिन ये भारतीय लोकतंत्र की मज़बूती और उसकी क़ामयाबी ही कही जाएगी कि आज देश की राजनीति की डोर बहुत हद तक कुछ महिलाओं ने थाम रखी हैं.

हम बात कर रहे हैं सोनिया गांधी, मायावती, जयललिता और ममता बैनर्जी जैसी नेताओं की. ये सूची और भी लंबी है लेकिन फ़िलहाल राजनीति में निर्णायक भूमिका अदा करने की ताक़त आज इन्हीं चार नेताओं में दिख रही है.

राशिद अल्वी कांग्रेस पार्टी से राज्यसभा सदस्य हैं और एक समय उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती के भी बेहद क़रीबी थे.

ज़माना

राशिद अल्वी कहते हैं, "ख़वातीन का ज़माना है. मेरा मानना है कि आज की तारीख़ में इन चार महिलाओं के बिना हिंदुस्तान की सियासत का तसव्वुर नहीं लिखा जा सकता."

 ख़वातीन का ज़माना है. मेरा मानना है कि आज की तारीख़ में इन चार महिलाओं के बिना हिंदुस्तान की सियासत का तसव्वुर नहीं लिखा जा सकता
राशिद अल्वी

वहीं, इन शक्ति संपन्न महिला नेताओं की शक्ति के स्रोत को वरिष्ठ पत्रकार चो रामास्वामी कुछ इस तरह से देखते हैं.

चो रामास्वामी कहते हैं- सोनिया गांधी का मूल्यांकन देश को एक रबर स्टैंप प्रधान मंत्री देने के रूप में है, ममता बनर्जी ने वास्तविक लोकतंत्र का प्रदर्शन किया और पश्चिम बंगाल सरकार को नैनो परियोजना को राज्य से बाहर भेजना पड़ा. जहां तक मायावती का सवाल है तो उन्होंने देश में जातिवादी राजनीति का व्यापक प्रसार किया. जयललिता ने बतौर मुख्यमंत्री आतंकवाद से लड़ने में काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई लेकिन कुल मिलाकर उनकी राजनीति को बुद्धिमत्ता पूर्ण नहीं कहा जा सकता.

कहा जाता है कि राजनीति में व्यक्ति को बेहद विनम्र होना पड़ता है. क्योंकि नेता के वजूद का आधार जनता ही होती है.

लेकिन ये विडंबना ही है कि इन सभी महिलाओं के बारे में आम धारणा है कि इनके पास आम आदमी तो क्या इनकी पार्टी के बड़े नेताओं तक का पहुँचना टेढ़ी खीर होता है.

इतना ही नहीं, इन नेताओं ने अपने समानांतर किसी और नेता को खड़ा नहीं होने दिया. बावजूद इसके पार्टी में इनका इतना बड़ा क़द, देश की राजनीति में इतनी बड़ी भूमिका और इन सबसे हट कर आम जनता इन्हें स्वीकार क्यों करती है, ये सवाल उठना लाज़िमी है.

 सोनिया गांधी का मूल्यांकन देश को एक रबर स्टैंप प्रधान मंत्री देने के रूप में है, ममता बनर्जी ने वास्तविक लोकतंत्र का प्रदर्शन किया और पश्चिम बंगाल सरकार को नैनो परियोजना को राज्य से बाहर भेजना पड़ा. जहां तक मायावती का सवाल है तो उन्होंने देश में जातिवादी राजनीति का व्यापक प्रसार किया. जयललिता ने बतौर मुख्यमंत्री आतंकवाद से लड़ने में काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई लेकिन कुल मिलाकर उनकी राजनीति को बुद्धिमत्ता पूर्ण नहीं कहा जा सकता
चो रामास्वामी

इसके जवाब में वरिष्ठ पत्रकार और सोनिया गांधी की जीवनी लिखने वाले राशिद क़िदवई कहते हैं, "पुरुष प्रधान राजनीतिक समाज में शुरू से ही ऐसा रहा है कि किसी ने भी अपने समानांतर नेतृत्व पैदा नहीं होने दिया. कांशीराम जब तक रहे बीएसपी का कोई आंतरिक संविधान नहीं था. तो इसी का अनुसरण ये महिला नेता भी कर रही हैं."

सोनिया गांधी आज कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष और संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की अध्यक्ष हैं. देश के बड़े राजनीतिक परिवार से ताल्लुक रखने के बावजूद एक समय था जब वो राजनीति से बहुत दूर रहती थीं.

लेकिन पिछले चुनाव के बाद उनकी छवि किंगमेकर यानी राजा बनाने वाले की बनी और आज भी इस रूप में वो सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं.

उम्मीद

वहीं मायावती देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर चौथी बार आसीन हैं. बहुजन से सर्वजन की ओर पार्टी का रुख मोड़ देने की वजह से आज न सिर्फ राजनीतिक स्तर पर उनका क़द काफी बढ़ गया है बल्कि उन्हें भावी प्रधानमंत्री के तौर पर भी देखा जा रहा है.

महिलाओं की स्थिति कितनी सुधरेगी- ये बड़ा सवाल है

ममता बैनर्जी की छवि इन सबसे हटकर है. वाम मोर्चे के गढ़ पश्चिम बंगाल में उनके ख़िलाफ़ राजनीति उन्हीं की भाषा में कर रही हैं. यानी आक्रामक जनविरोध की राजनीति.

जहाँ तक जयललिता का सवाल है तो वो दक्षिण भारत खासकर तमिलनाडु में एकमात्र महिला नेता हैं जिनका राजनीति में ज़बर्दस्त प्रभाव है. फ़िल्मी दुनिया से राजनीति में क़दम रखने वाली जयललिता अपने समर्थकों के बीच बेहद लोकप्रिय हैं.

बहरहाल, देश की राजनीति में इन महिलाओं की मह्तवपूर्ण भूमिका कोई नकार नहीं सकता उसके पीछे वजह चाहे जो भी हो.

चुनाव के बाद इनमें से कोई सत्ता के शीर्ष पर पहुँचती है या किसी अन्य को शीर्ष तक पहुँचाती है-दोनों ही स्थितियाँ महिला सशक्तिकरण का उत्कृष्ट उदाहरण होंगी.

लेकिन महत्वपूर्ण सवाल ये भी है कि क्या सत्ता के शीर्ष तक महिला को पहुँचा देना ही सशक्तिकरण है. इस सवाल का जवाब इन शक्ति संपन्न महिलाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी.

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