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हौसला ज़ोरदार, बेकार हथियार | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सुदम अबा पंदरकर उन सिपाहियों में से हैं जिन्होंने मुंबई पर हमला करनेवाले चरमपंथियों से मोर्चा लिया और इन दिनों अस्पताल में इलाज करा रहे हैं. पंदरकर ने छत्रपति शिवाजी टर्मिनल (सीएसटी) पर अपनी थ्री नॉट थ्री राइफ़ल के सहारे ही इन चरमपंथियों को ललकारा था. हालांकि तकनीक के पिछड़े होने की वजह से आगे बढ़कर मोर्चा लेने का जज़्बा भी कुछ ख़ास नहीं कर सका. रेलवे पुलिस में असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर पंदरकर ने हमें बताया कि उस रात क्या कुछ हुआ सीएसटी स्टेशन पर. गोलीबारी उस रात मैं नाइट ड्यूटी पर था. मुझे पैट्रोलिंग का काम दिया गया था इसलिए मैं गश्त पर निकला.
गश्त लगाकर 26 नवंबर की रात क़रीब 9.50 बजे मैं वापस सीएसटी पहुँचा. यहाँ पहुँचा ही था कि मुश्किल से पाँच मिनट बाद ही गोलियों के चलने की आवाजें आईं. मैंने देखा कि दो जवान हथियारबंद लोग जिनमें एक लंबा था और एक कुछ कम कद का, वे लोगों को बेरहमी से अपनी ऑटोमैटिक राइफ़लों का निशाना बना रहे थे. लोग बदहवास से भाग रहे थे. उन्होंने पहले मेन लाइन की तरफ़ गोलीबारी की फिर उसके बाद लोकल लाइन की तरफ़ जाकर लोगों पर गोलीबारी शुरू कर दी. हमारे एक अधिकारी ने तुरंत हम लोगों से कहा कि मुझे इन लोगों को रोकने के लिए दो-तीन लोग चाहिए. मैं अपनी एक थ्री नॉट थ्री राइफ़ल और सिर्फ़ पाँच राउंड गोलियों के सहारे हमलावरों को रोकने चल दिया. अफ़रातफ़री अब तक स्टेशन पर अफ़रातफ़री मच चुकी थी. लोग बाहर तो किसी सुरक्षित स्थान की ओर भाग रहे थे.
मैंने अपनी राइफ़ल से इन लोगों पर तीन राउंड फ़ायर किए. इसके बाद मैं प्लेटफ़ॉर्म सात की ओर बढ़ा जहाँ ये लोग मौजूद थे. मैं अभी प्लेटफॉर्म पर पहुँचकर इन्हें बाक़ी बचे दो राउंडों से रोकता कि तब तक छोटे क़द वाला हमलावर मेरे काफ़ी क़रीब आ गया. मैं राइफ़ल में गोली भर ही रहा था कि उसने काफ़ी नज़दीक आकर मुझे अपनी राइफ़ल से गोली मार दी. गोली मेरे कंधे के नीचे सीने के हिस्से में लगी. उन्हें शायद लगा हो कि इस गोली के बाद मैं अब बचूंगा नहीं पर गोली मेरे शरीर को चीरती हुई पार निकल गई. 56 वर्षीय पंदरकर के पास बस यह पुरानी राइफ़ल और पाँच गोलियाँ ही थीं चरमपंथियों को रोकने के लिए. मलाल पंदरकर को एक ही बात का मलाल है, अगर हमलावरों की तरह उनके पास भी अच्छी तकनीक वाली राइफ़ल होती तो वो तुरंत कार्रवाई शुरू कर सकते थे और उन्हें कड़ी टक्कर दे सकते थे. पुरानी पड़ चुकी राइफ़ल में राउंड भरना, ख़ाली करना जितना समय लेती थी, हमलावरों के लिए उतने समय में कई गोलियां दाग पाना संभव था. तो फिर क्या सोचकर उन्होंने चरमपंथियों को चुनौती दी, पंदरकर बताते हैं कि लोग मारे जा रहे थे. मैंने सोचा कि जितनी तैयारी और सामान मेरे पास है उससे कुछ लोगों को बचाने की कोशिश की ही जा सकती है. यही सोचकर उन्होंने उनके ख़िलाफ़ मोर्चा संभाला. पंदरकर की कहानी उस रात कई जगहों पर मोर्चा संभाले पुलिसवालों की कहानी से मिलती जुलती है. ऐसा नहीं है कि पुलिस के पास अच्छे हथियार और संसाधन एकदम नहीं हैं पर जबतक वो सामने आते, मुंबई मौत का तांडव देख चुकी थी. |
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