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'भगवान की दया से बच गए' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
असम में सिलसिलेवार विस्फ़ोटों में उन लोगों के चेहरों से अभी भी आतंक की परत उतरी नहीं है जो धमाकों के समय घटनास्थल पर मौजूद थे. ऐसा ही चेहरा लिए सारा फ्रांसिस अपनी खाक हो चुकी दुकान के अंदर खड़ी थी. सारा ने 1993 में अपनी सार जमा पूंजी जोड़कर रिंकी अटायर्स नामक टेलरिंग स्टोर खोला था जो गुरुवार को धमाकों की भेंट चढ़ गया. धमाकों के समय दुकान में मौज़ूद सारा अंदर होने के कारण बाल बाल बच गईं. वो कहती हैं, ‘‘ धमाकों की आवाज़ सुनते ही मैं मुड़ी तो मेरे मुंह में काला धुआं भर गया. सब कुछ ख़त्म हो चुका था. कुछ भी नहीं बचा था लेकिन भगवान की दया से मैं बच गई हूं. ’’ सारा के बगल की आसाम सिल्क की दुकान के पोबिन कलिता पर भगवान शायद इतना कृपावान नहीं हुआ. इन धमाकों में उनका एक जवान बेटा भी गया और दुकान का सारा सामान भी. सिल्क क्वीन यानी रेशम की रानी जैसे खूबसूरत नाम वाली इस दुकान में जब मैं घुसा तो वहां एक इंच जगह भी ऐसी नहीं थी जहां कांच के किर्चें बिखरी न हों. दुकान की घड़ी में 11 बजकर 20 मिनट और 19 सेकेंड दिखाई दे रहे थे. दुकान में घुसते ही कैश काउंटर पड़ता है जिस पर बैठे पोबिन के बेटे समरज्योति मारे गए. पान बाजार पुलिस सदर थाना और उससे सटा पुलिस कर्मियों के निवास का परिसर. इसी परिसर के सामने यह विस्फोट हुआ था जिसमें सात छोटी गाड़ियां इस तरह जल गईं कि उनका माडल भी पहचान में नहीं आ रहा था. यही नजारा कचहरी में सीजेएम कोर्ट के सामने था. अस्पताल में इलाज करा रहे बार एसोशिएसन में तैनात सुरक्षाकर्मी अश्विनी महंत बताते हैं कि वो हमेशा गाड़ी के साथ ही रहते हैं लेकिन उस समय टहलते हुए जरा से आगे निकल गए और उसी बीच धमाका हो गया. इन धमाकों में वकील शम्सुल हक को भी चेहरे सहित शरीर के कई स्थानों पर चोटें आई हैं। वे कोर्ट की पहली मंजिल पर दस्तावेज दाखिल करने गए थे, उसी बीच धमाके की आवाज उनके कान में पड़ी. वो कहते हैं, ‘‘चेहरे पर हाथ फेरा तो हाथ खून से भर गया. हिम्मत कर खुद ही नीचे उतरा, वाश बेसिन पर चेहरा धोया. मेरे बड़े भाई, जो वकील भी हैं, उन्हें मदद कर बाहर निकाला और एमएमसी सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया.’’ गुवाहाटी मेडिकल कालेज अस्पताल में छोटी सी बच्ची मरमी शर्मा अपने स्कूल के यूनीफार्म में ही भर्ती हैं. वह अभी कक्षा एक में पढ़ती है यानी उम्र होगी ज्यादा से ज्यादा चार साल. किसी कारण गुरुवार को उसके पिता जल्दी स्कूल से ले गए लेकिन जैसे ही वे गणेशगुड़ी स्थित फ्लाईओवर के नीचे पहुंचे कि विस्फोट हो गया. इस बच्ची को कौन अस्पताल लाया पता नहीं, लेकिन अस्पताल लाने के बाद रोगियों की सेवा करने वाली जानकी बेजबरुवा ने उसे संभाल लिया और अस्पताल में लंबे समय के अनुभव का फायदा उठाते हुए प्लास्टिक सर्जरी विभाग में भर्ती कराकर ही दम लिया. मरमी की दादी उसे खोजती अस्पताल पहुंच गई लेकिन मरमी के पिता का पता नहीं है. आम तौर पर चिकित्सक और नर्स जैसे पेशों के लोग अपना धैर्य नहीं खोते लेकिन जीएससीएच में ड्यूटी कर रही एक नर्स ने जैसे ही देखा कि जख्मी लोगों में उसका भाई और मां भी है वह अपना धैर्य खोकर रोने-बिलखने लगी. इससे घायलों से भरे वार्ड का माहौल भी गमगीन हो गया और कई अन्य नर्सें भी रोने लगीं. शहर में जिनका कोई अपना काफी तलाश के बाद भी नहीं मिल रहा था वे गमगीन चेहरा लिए जीएससीएच दौड़े चले आ रहे थे. वहां बेड पर और फर्श पर लेटे घायलों में अपना रिश्तेदार नहीं मिलने के बाद कफन से ढके एक-एक शव का कपड़ा उघाड़ कर उन्हें देखते हुए देखना एक हृदय विदारक दृश्य था. |
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