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बगलिहार के 'मास्टर ब्लास्टर' की कहानी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर में बगलिहार पनबिजली परियोजना में अहम रोल अदा करने वाले मोहम्मद रफ़ीक़ की कहानी ऐसी है जिसमें उन्हें ख़ुशी और ग़म दोनों ही मिले हैं. चंद्रकोट में बगलिहार पनबिजली परियोजना के निर्माण में मोहम्मद रफ़ीक़ ने चट्टानों और पहाड़ों को विस्फ़ोटकों से उड़ाने का काम किया है. इस परियोजना की चपेट में उनका घर भी आ गया. 'मास्टर ब्लास्टर' चट्टानों और पहाड़ों को उड़ाकर बाँध व सुरंग बनाने में वो इतने माहिर हुए के उन्हें इसके कारण 'मास्टर ब्लास्टर' कहा जाने लगा. रफ़ीक़ का सपना 450 मेगावाट के बगलिहार पनबिजली परियोजना के तौर पर साकार हो रहा है जहाँ वो पिछले आठ सालों से चट्टानों और पहाड़ों को नष्ट करने का काम करते आए हैं. चनाब नदी के 50 वर्ग किलोमिटर के क्षेत्र पर फैली इस परियोजना की चपेट में चंद्रकोट से 65 किलोमीटर दूर पॉल डोडा में स्थित उनका पैतृक घर बाँध के निर्माण से पानी में डूब गया. ग़म और ख़ुशी से नम आँखें मोहम्मद रफ़ीक़ नम आँखों से कहते हैं, "ये ग़म और ख़ुशी के आँसू हैं. मैं ख़ुश हूँ कि ये परियोजना जिसके लिए मैंने आठ साल तक काम किया, उसका उदघाटन प्रधानमंत्री कर रहे हैं - ग़म इसलिए है कि बाँध बनने से मेरा घर उजड़ गया है." वो दुविधा में हैं कि क्या करें. उनका कहना है, "इस परियोजना की शुरूआत पर ख़ुशी मनाएँ या अपने पैतृक घर के उजड़ जाने का ग़म करें. एक तरफ़ मैंने इस परियोजना को आगे बढ़ाने में अहम योगदान दिया है तो दूसरी तरफ़ एक ऐसा घर उजड़ा है जिससे मेरा भावनात्मक लगाव रहा है." आश्चर्य भाव से रफ़ीक़ कहते हैं, "सही मानों में मैं नहीं समझ पा रहा हूँ कि मुझे क्या करना चाहिए, शायद परियोजना और बाँध जैसे बड़े फ़ायदे के लिए ही ये बलिदान हो." बगलिहार पनबिजली परियोजना से 450 मेगावाट बिजली पैदा होगी, जो जम्मू-कश्मीर में मौजूदा बिजली के पैदावार सें 159 मेगावाट ज़्यादा होगी. इस समय राज्य की बिजली पैदा करने की क्षमता 309 मेगावाट है. राज्य को प्रतिदिन 2000 मेगावाट बिजली की आवश्यकता है. 1350 मेगावाट उसे उपलब्ध है, बाक़ी बाहर से लेनी पड़ती है. रफ़ीक़ ने अपने विस्फोटकों और डेटोनेटरों के इस्तेमाल में जो महारत हासिल की है, उसके कारण ही लोग उन्हें 'मास्टर ब्लास्टर' कहते हैं. सबसे ख़तरनाक पल रफ़ीक़ कहते हैं, "हर विस्फोट इतना ख़तरनाक होता है कि किसी एक को सबसे से ख़तरनाक कहना मुश्किल है. क्योंकि पता नहीं होता के अगले पल क्या होने वाला है." लेकिन उन्हें एक घटना याद है जो उनके लिए बहुत बड़ी चुनौती थी, "सुरंग का मोड़ तैयार था और इसके मुँह को एक विस्फोट से खोला जाना था नहीं तो सब धरा का धरा रह जाता, और ये काम एक धमाके में हो गया." रफ़ीक़ कहते है, "मैं कभी नाकाम नहीं हुआ और मेरी वजह से कभी किसी की जान नहीं गई." आख़िर में रफ़ीक़ कहते हैं, "वास्तव मैं अपने आप को बहुत गौरवानवित महसूस करता हूँ, मैंने इस परियोजना में विनम्रता के साथ अपना योगदान दिया, जो इस राज्य को अलग पहचान देगा." |
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