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सोमवार, 18 अगस्त, 2008 को 14:30 GMT तक के समाचार
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ग़रीब नवाज़ की इबादत को लेकर विवाद

सारा रज़ा ख़ान
दरगाह परिसर में महिलाओं के गाने की कोई परंपरा नहीं है
अजमेर स्थित प्रसिद्ध सूफ़ी संत ख़्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर पाकिस्तानी गायिका सारा रज़ा ख़ान के इबादत बतौर नात, यानी एक प्रकार का धार्मिक गीत पेश करने पर विवाद उठ खड़ा हुआ है.

दरगाह के ख़ादिमों ने इस पर आपत्ति व्यक्त की है और कहा है कि भविष्य में इसकी पुनरावृत्ति नहीं होनी चाहिए.

ख़ादिमों की संस्था अंजुमन का कहना है कि दरगाह परिसर में महिलाओं के गाने की कोई परंपरा नहीं है, लिहाजा इस परंपरा का निर्वाह किया जाना चाहिए.

दरअसल सारा रविवार को अपनी माँ कुलसुम के साथ दरगाह में ज़ियारत करने आई थीं. उनके साथ उनका ख़ादिम भी था. सारा ने ग़रीब नवाज़ को अक़ीदत के फूल चढ़ाए और फिर बतौर इबादत गाने का नज़राना पेश करने की ख़्वाहिश ज़ाहिर की, लेकिन ख़ादिम ने परंपरा का हवाला दे कर रोक दिया.

गायिका सारा इबादत में इतनी तल्लीन हुईं की दरगाह में स्थित एक हुजरे में आई और वहाँ नात मनक़बत के नज़राने पेश किए.

 दरगाह में महिलाओं के गायन पर पाबंदी है. इस पवित्र दरगाह में ऐसी कोई परंपरा नहीं है कि महिलाएँ वहाँ गायन करे. ये सब ग़लती से हो गया, इरादतन नहीं
महमूद हसन चिश्ती, ख़ादिम

ख़ादिमों की बिरादरी को इसका पता चला तो बावेला मच गया. सारा ने बाद में पत्रकारों से कहा कि यह महज़ उनकी इबादत थी.

परंपरा नहीं

अंजुमन के सचिव महमूद हसन चिश्ती ने बीबीसी को बताया, "दरगाह में महिलाओं के गायन पर पाबंदी है. इस पवित्र दरगाह में ऐसी कोई परंपरा नहीं है कि महिलाएँ वहाँ गायन करे. ये सब ग़लती से हो गया, इरादतन नहीं. लिहाज़ा हमने दोबारा सब को आगाह कर दिया है."

इससे पहले पाकिस्तान की एक और गायिका मारिया बलोच के इबादत के बतौर गायकी का नज़राना पेश करने पर भारी विवाद उठ खड़ा हुआ था.

दरगाह के नाज़िम अहमद रज़ा कहते हैं, "ये ख़ादिमों के बीच का मामला है. हाँ इतना ज़रुर है कि महिलाओं के गायन पर यहाँ पाबंदी है. ग़रीब नवाज़ के यहाँ अक़ीदतमंद अपनी पूरी आस्था को शिद्दत से पेश करते हैं. सारा तो एक कलाकार है, उसे लगा उसके पास सबसे बेहतर उसकी गायिकी है. उसने ख़्वाजा के दरबार में प्रस्तुत कर दी. लेकिन उसे नहीं मालूम कि परंपरा इसकी इजाज़त नहीं देती है."

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