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मंगलवार, 22 जुलाई, 2008 को 00:06 GMT तक के समाचार
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दुनिया की सबसे बड़ी अफ़ीम की फ़ैक्ट्री

गाज़ीपुर में अफ़ीं फ़ैक्ट्री
गाज़ीपुर स्थित अफ़ीम की फ़ैक्ट्री 188 वर्ष पुरानी है
दो शताब्दी पुरानी यह फ़ैक्ट्री दुनिया की सबसे बड़ी अफ़ीम की फ़ैक्ट्री है, जिसे क़ानूनी मान्यता मिली हुई है. इस फ़ैक्ट्री से गुज़रना इतिहास के एक भूले पन्ने को फिर से पढ़ने जैसा है.

उत्तर प्रदेश के गाज़ीपुर स्थित अफ़ीम की यह फ़ैक्ट्री प्रसिद्ध उपन्यासकार अमिताभ घोष की चर्चा में आई पुस्तक 'सी ऑफ़ पॉपीज़' की वजह से एक बार फिर से चर्चा में है.

अमिताभ घोष का यह उपन्यास उस काल को चित्रित करता है जब अफ़ीम का कारोबार ब्रिटिश शासन के दौरान काफ़ी फल-फूल रहा था और ज़्यादातर अफ़ीम गाज़ीपुर की फ़ैक्ट्री से ही निकल कर आ रही थी.

घोष लिखते हैं कि अफ़ीम ही वह उत्पाद था जिससे ब्रिटिश शासन का सूर्य चमकता था.

लेकिन 188 वर्ष पुरानी गाज़ीपुर फ़ैक्ट्री में न तो कोई अमिताभ घोष की किताब के बारे में जानता है न हीं फ़ैक्ट्री के विवादास्पद इतिहास को.

फलता-फूलता कारोबार

यहां पर कारोबार पहले की ही तरह चल रहा है. 52 एकड़ में फैली इस फ़ैक्ट्री में 900 से भी ज़्यादा कामगार नौकरी करते हैं. इस फ़ैक्ट्री का वार्षिक कारोबार लगभग 180 करोड़ रुपए का है.

 फ़ैक्ट्री काफ़ी बड़ी थी. गंगा नदी के तट पर 45 एकड़ में फैली इस फ़ैक्ट्री में दो बडे़ प्रांगण थे जिसमें कई आँगन, वाटर टैंक और लोहे से छाई हुई छप्पर थी
सी ऑफ़ पॉपीज़ का एक अंश

वर्तमान में जापान, फ्रांस और श्रीलंका की दवाई कंपनियों को इस फ़ैक्ट्री से अफ़ीम निर्यात की जा रही है.

फ़ैक्ट्री के मालिक माणिक मुखर्जी कहते हैं कि भारतीय अफ़ीम 'शुद्ध' होती है जिसका औषधीय गुण काफ़ी है.

वर्ष 1988 में विख्यात लेखक रुडयार्ड किपलिंग ने पायोनियर अख़बार के लिए रिपोर्टिंग करते हुए इस फ़ैक्ट्री के बारे में जीवंत वर्णन किया है.

उन्होंने लिखा है, "गंगा नदी के तट पर बनारस से 40 मील दूर स्थित गाज़ीपुर फ़ैक्ट्री से अफ़ीम का उत्पादन होता है. भारत सरकार की तिजोरी यहाँ से भरती है."

अमिताभ घोष 'सी ऑफ़ पॉपीज़' में लिखते हैं, "फ़ैक्ट्री काफ़ी बड़ी थी. गंगा नदी के तट पर 45 एकड़ में फैली इस फ़ैक्ट्री में दो बडे़ प्रांगण थे जिसमें कई आँगन, वाटर टैंक और लोहे से छाई हुई छप्पर थी."

इतने वर्षो के बाद भी औपनिवेशिक इतिहास के अवशेष अब भी फ़ैक्ट्री में दिखाई देते हैं. लाल दीवारें और वाटर टैंक जिसका गवाह हैं.

पुरानी उत्पादन के साधनों को दो वर्ष पहले ही आधुनिक रंग में ढाला गया है.

20वीं सदी के आख़िर में उत्तर प्रदेश में अफ़ीम के उत्पादन में गिरावट आई और वर्तमान में राजस्थान और मध्य प्रदेश से अफ़ीम का ज़्यादा हिस्सा आता है.

घोष लिखते हैं कि फ़ैक्ट्री के चारों ओर आलस्य का साम्राज्य हमेशा फैला दिखाई देता था. इसका एक उदाहरण फ़ैक्ट्री के आसपास नशे में धुत बंदरों को देख कर लगता था.

फ़ैक्ट्री के अवशिष्टों को खाकर नशे में धुत बंदरों को अब भी देखा जा सकता है.

एक मज़दूर का कहना है, " बंदरों पर अफ़ीम का नशा चढ़ गया है. हर वक्त हमें उन्हें यहाँ से भगाना पड़ता है."

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