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मंगलवार, 10 जून, 2008 को 01:24 GMT तक के समाचार
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दास्तां, एक दिलेर पत्रकार की...

समद रोहानी
बीबीसी ने अपना एक दिलेर और निर्भीक पत्रकार खो दिया है
अफ़ग़ानिस्तान के कई इलाकों में ख़बरों को खोजते और दुनिया के बाकी लोगों तक पहुँचाते पहुँचाते बीबीसी ने अपना एक युवा जुझारू पत्रकार खो दिया.

रोहानी कहा करता था- मछली तभी स्वस्थ रहेगी जब वो पानी में हो.

इस अफ़ग़ानी कहावत के कहने का मतलब होता था कि जब वो लोगों के बीच मौके पर जाकर ख़बरें कर रहा होता था, उस वक्त वो खुद को सबसे संजीदा पाता था.

मैं पिछले आठ साल से काबुल में बीबीसी के साथ काम कर रहा हूँ. बीबीसी के कई पत्रकार अफ़ग़ानिस्तान के कई कठिन, दुर्गम और ख़तरों भरे इलाकों में तैनात हैं और उनसे मैं लगातार संपर्क में रहता हूं.

ये वो बहादुर और निर्भीक पत्रकार हैं जो अपने घर-परिवार से दूर इन इलाकों में इसलिए बने हुए हैं ताकि लोगों का पता चल सके कि यहाँ आम लोग किन कठिनाइयों में रह रहे हैं.

इसी कड़ी का एक नाम था समद रोहानी का. रोहानी वर्ष 2006 में बीबीसी से जुड़े और वो केवल पस्तो भाषा में ही काम नहीं करते थे बल्कि बीबीसी के अंग्रेज़ी स्टाफ़ को भी ख़ास मदद औऱ जानकारी मुहैया कराते थे.

एक चुनौतीपूर्ण मोर्चा

हेलमंद प्रांत का इलाका तालेबान लड़ाकों के सर्वाधिक प्रभाव वाले इलाकों में है. यहाँ बड़े पैमाने पर ब्रितानी सैनिक तैनात हैं और ऐसे में यह जगह ब्रिटेन में बीबीसी के दर्शकों, श्रोताओं के लिए ख़ास महत्व की हो जाती है.

बीबीसी
समद रोहानी अफ़ग़ानिस्तान के सबसे चुनौतीपूर्ण प्रांत, हेलमंद से ख़बरें भेजते थे

रोहानी की ख़ास बात यह थी कि हेलमंद के बारे में उनको जितनी जानकारी थी, उतनी जानकारी वाला आदमी मुझे दूसरा नहीं मिला.

रोहानी हेलमंद में ही पैदा हुए और यहाँ एक पत्रकार ही नहीं रहे, स्थानीय स्तर पर एक अच्छे कवि बनकर भी उभरे.

हेलमंद में शायद ही कोई दिन किसी घटना के बिना बीतता है और रोहानी तो अक्सर मेरे साथ फोन के ज़रिए दिनभर जुड़ा रहता था. मुझे इस व्यक्ति की बहादुरी हमेशा याद रहेगी.

वो चाहते थे कि तालेबान के नियंत्रण वाले इलाके के लोगों की ज़िंदगी जो कुछ देख रही है, उसे दूसरों तक पहुँचाया जाए.

अक्सर ऐसा हुआ जब रोहानी काबुल में हमारे घर पर रुके. जब भी वो घर पर होते, मेरा और मेरे दोस्तों का अपनी रोमांटिक पश्तो कविताओं से दिल बहलाते थे.

पर रोहानी के साथ शाम का वक्त बहुत सारी रुकावटों भरा होता था. उन्हें लगातार सरकारी मुलाज़िमों, कबायली नेताओं और स्थानीय व्यापारियों के फोन आते रहते थे.

ऐसा भी कई बार हुआ कि उनसे दिनभर कोई संपर्क ही नहीं हो पाता था. कारण, कि वो किसी ज़िले के दौरे पर होते थे जहाँ नेटवर्क नहीं होता था और इस तरह हमारा उनसे संपर्क नहीं हो पाता था.

आजकल मेरा काफी वक्त अमरीका में कुछ अध्ययन करते हुए बीत रहा है. इस दौरान भी समद का लगातार फोन आता रहता था. अक्सर तब जब में रात को सो रहा होता था और ऐसा उन्हें याद दिलाने पर वो बहुत सरलता से कहते थे- अफ़ग़ानिस्तान में तो दिन निकल आया है न.

इस सारी बातों से यह हुआ कि हम केवल एक साथ काम करने वाले साथी भर नहीं रह गए बल्कि एक गहरी दोस्ती भी विकसित हो गई हमारे बीच.

अलविदा दोस्त...अलविदा

मैं जब भी काबुल आता था, समद सबसे पहले फोन करने वालों में होते थे. वो कहते थे, "हमारे अफ़ग़ानिस्तान में आपका स्वागत है. मैं हेलमंद के एक गाँव से आपको शुभकामनाएं भेज रहा हूँ."

बीबीसी
दुनियाभर में बीबीसी के सदस्यों ने रोहानी को याद किया

पर शनिवार को ऐसा नहीं हुआ. मुझसे उनकी बात नहीं हुई तो मैंने उनसे संपर्क करना चाहा. रोहानी का पता नहीं चल रहा था और उनके फोन भी स्विच ऑफ़ थे.

मुझे लगा कि कुछ गड़बड़ है पर आशा कर रहा था कि रोहानी किसी अंदरूनी इलाके में ख़बर खोजने गए होंगे.

इसके बाद एक अशुभ समाचार मिला....

एक अनजान व्यक्ति ने हेलमंद में मौजूद बीबीसी के एक अन्य सदस्य से फोन पर कहा कि रोहानी के शव को ले जाने की व्यवस्था करें.

यह मुझे अंदर तक हिलाकर रख देने वाली ख़बर थी. ऐसा लगा जैसे पूरी दुनिया ही बिखर गई हो.

रोहानी की स्मृतियाँ हमेशा मेरे साथ रहेंगी. एक अफ़ग़ान के रूप में मैं सदा इस बात पर गर्व करूंगा कि रोहानी मेरे मित्र थे और सहयोगी भी.

समद ने अपनी ज़िंदगी लोगों तक सच बताने और अफ़ग़ानिस्तान की सहायता करने के नाम कर दी थी.

मुझे यह तो नहीं मालूम कि रोहानी की हत्या किसने की पर एक बात विश्वास के साथ कह सकता हूँ- हममें से और भी ज़्यादा लोग सच को सामने लाते रहेंगे और सच हमेशा अपनी रक्षा करता रहेगा.

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