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शुक्रवार, 30 मई, 2008 को 15:21 GMT तक के समाचार
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एक माँ का फौलादी जज़्बा और हिम्मत

नितीश कटारा की माँ नीलम कटारा
नितीश कटारा हत्या के मामले में फ़ैसला आने पर माँ नीलम कटारा ने संतोष व्यक्त किया
जब मैं सात चैम्सफ़ोर्ड रोड यानी कटारा परिवार के निवास पर पहुँची, तो वहाँ सबसे पहले मेरी नज़र हरे रंग की एक जिप्सी पर पड़ी जिसके बोनट पर नितीश की फ़ोटो रखी हुई थी और ज़मीन पर जली हुई रंग-बिरंगी मोमबत्तियों के अंश बाक़ी थे.

पिछले छह साल से अख़बारों और न्यूज़ चैनलों पर दिखने वाली नीलम कटारा किसी अख़बार से आई एक पत्रकार को इंटरव्यू दे रही थीं.

कमरे में दिवारों पर खेलती, मुस्काराती नितीश की तस्वीरें टंगी हुई थीं. उसी मुस्कान की झलक नीलम के होठों पर भी दिखाई दे रही थी.....जैसे दोनों माँ-बेटे जीत की खुशी मना रहे हो.

हरे रंग की साड़ी पहने और माथे पर बिंदी लगाए नीलम उस पत्रकार से उस शादी का ज़िक्र कर रही थी जिससे उनका बेटा कभी वापिस लौट कर नहीं आया.

एक बार ख़याल भी आया कि अगर नीलम कटारा की जगह मैं होती तो क्या मैं उन दुख देने वाले क्षणों को उस तरह से बयान कर पाती?

मैं थोड़ा सिहर गई लेकिन नीलम बोले जा रही थी....उन्होंने मुझे बैठने का इशारा किया लेकिन मैं उन्हें देखती रही - '.....एक मां का जज़्बा, उसकी हिम्मत....'

शिक्षक के क़दम कोर्ट की ओर

मैं सोच रही थी कि बच्चों को पढाने वाली एक अध्यापिका के क़दम किस तरह कोर्ट कचहरी की तरफ़ बढे होंगे. उनका चेहरा सहज और बिना भावहीन था. लेकिन जो जोश था वो ये ज़ाहिर करता था कि उन्होंने किस तरह से ख़ुद को तैयार किया होगा उस लंबी लड़ाई को लड़ने के लिए.

 'मुझे दो सेंकड लगे थे अपने बेटे की आधी जली हुई लाश पहचानने में औऱ उसकी लाश देखते ही मैंने ये ठान लिया था कि ये किसी दूसरी माँ के साथ नहीं होना चाहिए. जब भी मैं कमजोर पड़ती तो उस क्षण को याद कर लिया करती थी
नीलम कटारा

नीलम ने पत्रकार को अलविदा कहा और मुझसे बातचीत शुरू की.... सज़ा होने पर उन्हें संतुष्टि तो थी लेकिन उनका कहना था कि इस पर यक़ीन कर पाना अब भी मुशिकल हो रहा है.

उनका कहना था, "सालों से इस दिन की कल्पना की थी, मगर जब आया तो अभी भी यक़ीन नहीं हो पा रहा है. मगर मुझे बहुत बड़ी राहत महसूस हो रही है क्योंकि इसको लेकर मैं मानसिक रूप से परेशान थी."

वह बोलीं - "एक मक़सद था जिसे पाना था और उसे पाना आसान नहीं था. बहुत आभारी हूँ मैं ईश्वर की, न्यायपालिका की, न्यायाधीश की, सरकारी वकील और अपने वकील की, पुलिस की -- सबने जिसने भी इसमें कोई भूमिका अदा की. 23 वर्ष के बेटे की मौत और फिर पति की मौत -- कोई भी समझ सकता है कि वो कितना परेशानी का समय रहा होगा.

उसके बावजूद क़ानून में विश्वास रखते हुए न्याय पाने के लिए लड़ाई लड़ना एक साहसी महिला ही कर सकती है जो उनकी 'बॉडी लैंग्वेज' से छन-छन कर निकल रहा था.

'चिंपू वॉज़ ए फ़ूल'

जब मैंने उनसे पूछा कि क्या इस अंतराल में वे कभी टूटी भीं, तो उन्होंने कहा - 'मुझे दो सेंकड लगे थे अपने बेटे की आधी जली हुई लाश पहचानने में और उसकी लाश देखते ही मैंने ये ठान लिया था कि ये किसी दूसरी माँ के साथ नहीं होना चाहिए. जब भी मैं कमज़ोर पड़ती तो उस क्षण को याद कर लिया करती थी और ये ज़रुर सोचती थी कि अगर नितीश या मेरे पति ऐसी स्थिति में होते तो क्या करते, और फिर आगे क़दम बढ़ा लेती.'

नीलम कटारा ने बताया, "मुझे याद है जब मेरे पति आईसीयू में वैनटीलेटर पर थे. अपनी मौत से दो दिन पहले उन्होंने लिखा था कि चिंपू (नितीश का घर का नाम) वाज़ ए फ़ूल टू गो आऊट विद विशाल."

ये कहते हुए वो 'फ्लैश बैक' में चली गई...

 नितीश ने डायरी को टेबल पर रख दिया जिसे मैंने देखा तो मुझे लगा कि नितीश उसे मेरे लिए लाया है.....मैंने उसे पलटकर देखा. उसमें एक जगह भारती ने लिखा था - अगर हमारी शादी नहीं हुई तो क्या होगा.....मुझे डर लगता है. लेकिन मैं जानती हूँ कि ये शादी होगी क्योंकि फ़ैसला तो भारती को ही करना है....
नीलम कटारा

उन्होंने बीबीसी के साथ भारती यादव की डायरी का विस्तार से ज़िक्र किया - "उन्होंने कहा कि एक और दिलचस्प बात जो मैंने किसी और को नहीं बताई है वो ये हैं कि एक बार भारती की एक लाल रंग की डायरी जिप्सी में रह गई थी जो लड़कियों की डायरी जैसी थी.... नितीश ने डायरी को टेबल पर रख दिया जिसे मैंने देखा तो मुझे लगा कि नितीश उसे मेरे लिए लाया है.....मैंने उसे पलटकर देखा. उसमें एक जगह भारती ने लिखा था - अगर हमारी शादी नहीं हुई तो क्या होगा.....मुझे डर लगता है. लेकिन मैं जानती हूँ कि ये शादी होगी क्योंकि फ़ैसला तो भारती को ही करना है..... "

नितीश-भारती का रिश्ता

उन्होंने बताया कि उस डायरी में ये भी लिखा था - "बाक़ी तो सलाह देंगे या रोकेंगे, लेकिन फ़ैसला मैं करूँगी....पता नहीं नितीश क्या सोचते हैं? लेकिन मैं उनके बिना नहीं रह पाऊँगी...."

नीलम कटारा ने बताया - "कुछ देर बाद नितीश आ गया तो मैंने ये बताए बिना उसे लौटा दिया कि मैंने कुछ पढ़ा है. तभी मुझे लगा कि ये रिश्ता इतना गंभीर है, ये लड़की इसे लेकर बहुत गंभीर है और इसे लेकर कुछ विरोध भी हो."

जब मैंने नीलम से पूछा कि क्या डायरी पढ़कर आप में ये उम्मीद की किरण जगी कि भारती यादव आपके बेटे को न्याय दिलाएगी?

उनका कहना था - "मुझे उम्मीद थी वो न्याय दिलाएगी लेकिन मीडिया में मैने ये खबरें देखी थीं कि उसे भावुक किया जा रहा था लेकिन फिर भी उम्मीद थी कि वो सच बोलेगी. उसने अपने सारे कार्ड, चिठ्ठियाँ और तस्वीरों को दिखाया और जिसने सब कुछ बयान कर दिया. हांलाकि उसने बोला कि उसके भाई उससे बहुत प्यार करते हैं और वो ऐसा नहीं कर सकते...लेकिन वो चिठ्ठियाँ सब कुछ कह गईं कि वो क्यों डरती थी, किससे डरती थी."

उन्होंने बताया कि भारती ने एक बार कोर्ट में उन्हें देखा था और उसकी आखों से साफ़ ज़ाहिर था कि वो दुखी है. उन्होंने ये भी बताया कि फिर भारती के पिता सामने आ गए और फिर सुनवाई के दौरान हमेशा दो वकील दोनों के बीच में रहते थे...

हालाकि नीलम पटियाला हाउस कोर्ट के फ़ैसले से संतुष्ट है लेकिन इस बात से भी वाकिफ़ हैं कि अभियुक्त अभी आगे भी अपील करेंगे और उन्हें फिर इस जद्दोजहद से गुजरना पड़ सकता है.

नीलम कटारा ने न्याय की जो मशाल जलाना चाही उसकी रोशनी जेसिका लाल मामले, प्रियदर्शनी और फिर नीतिश कटारा मामले में नज़र आई और संभवत: आम आदमी का न्याय व्यवस्था पर विश्वास बढ़ा होगा. उन्होंने दिखाया कि समाज में प्रभावशाली और ताक़तवर लोगों के खिलाफ़ न्याय पाने के लिए साहस जुटाया जा सकता है.

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