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रविवार, 25 मई, 2008 को 13:56 GMT तक के समाचार
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कर्नाटक जनादेश: कांग्रेस के लिए बुरा संकेत

कर्नाटक विधानसभा
कर्नाटक में जो जनादेश देखने को मिला है, उसे दो तरह से देखा जा सकता है. पहला तो यह कि दक्षिण भारत के किसी राज्य में भाजपा पहली बार अपने बलबूते पर सरकार बनाने की स्थिति में आई है.

राष्ट्रीय स्तर पर कहीं यह भी दिखाई दे रहा है कि पिछले वर्षों में राज्यों के चुनावों के बाद कांग्रेस कमज़ोर होती दिख रही है तो कांग्रेस के मुक़ाबले भाजपा की स्थिति बेहतर होती दिखाई दे रही है.

पहली बार है जब दक्षिण भारत में भाजपा ऐसी स्थिति में पहुँची है जहाँ ऐसा लगे कि यह पार्टी सरकार बनाने की स्थिति में हो सकती है और जनता की पहली पसंद भी...

इन चुनावों में जनता दल (सेक्युलर) को जो हार मिली है उसके आधार पर कुछ लोग यह भी अनुमान लगा रहे हैं कि आने वाले दिनों में दो पार्टियों के बीच ही मुक़ाबला रह जाएगा और क्षेत्रीय दलों को नुकसान होगा.

मैं इस तर्क से सहमत नहीं हूँ. जनता दल (एस) को जो नुकसान हुआ है उसके पीछे की वजह उनका सत्ता में रहना है, न कि क्षेत्रीय दल के तौर पर उनका असर कम होना.

जेडी(एस) ने राज्य में 'एंटी इन्कंबेंसी' का नुकसान उठाया है. वहीं केंद्र के लिए एंटी इन्कंबेंसी का नुकसान कांग्रेस को उठाना पड़ा है.

दूसरा जेडी(एस) को लोगों ने एक नैतिक राजनीति न करने वाले दल के तौर पर भी देखा है.

 कांग्रेस यह बता ही नहीं पा रही है कि क्योंकर वो एक के बाद एक चुनाव हारती जा रही है. क्यों उनकी रणनीति सफल नहीं हो रही है. क्यों कांग्रेसी एक अच्छी राजनीतिक समझ के साथ ख़ुद को पेश नहीं कर पा रहे हैं

जेडी(एस) को जब अपना वादा सहयोगी दलों के साथ निभाना होता था तो वो उससे पीछे हटकर सत्ता की कुर्सी से चिपके रहना चाहते थे, इसे लोगों ने नकारा है.

मीडिया का प्रचार और लोगों के बीच बनी या प्रचारित की गई ऐसी छवि के बावजूद जेडी(एस) को जितनी सीटें मिली हैं, उसे देखकर ऐसा लगता है कि अगर भाजपा को इतना लाभ न होता या कांग्रेस को और फ़ायदा होता तो सरकार बनाने की चाबी जेडीएस के पास ही होती.

जेडी(एस) को जो नुकसान हुआ है उसके आधार पर यह कह देना कि जेडी(एस) या देश में अन्य क्षेत्रीय दलों के पतन का दौर शुरू हो चुका है, मैं इससे सहमत नहीं हूँ.

भाजपा की रणनीति

एक बात और भाजपा के लिए सकारात्मक रही कि उन्होंने एक ऐसी पार्टी के तौर पर अपने को लोगों के समक्ष प्रस्तुत किया जो एक स्थिर सरकार बना सकती है.

दूसरी बात थी राज्य में उनका नेतृत्व यानी मुख्यमंत्री के रूप में येदुरप्पा का चेहरा. एक समय था जब राष्ट्रीय राजनीति में कहा जाता था कि अटल जी प्रधानमंत्री बनने लायक हैं पर उन्हें अवसर नहीं मिल रहा. कुछ इसी तरह की छवि राज्य में येदुरप्पा की रही है.

भाजपा इस बात को भी प्रचारित करने में और लोगों के सामने रखने में सफल रही कि उनके साथ एक राजनीतिक धोखा हुआ है और उन्हें अपनी बारी आने पर काम करने का मौक़ा नहीं मिला है.

कांग्रेस को नुक़सान ज़्यादा

इन चुनावों का कुल निचोड़ यह भी दिखता है कि भाजपा को इसमें लाभ हुआ है पर उससे कहीं ज़्यादा कांग्रेस को नुकसान हुआ है. पिछले कुछ सालों में कांग्रेस राज्य स्तर पर एक के बाद एक चुनाव हारती जा रही है.

वर्ष 2004 के आम चुनावों के तुरंत बाद हुए महाराष्ट्र चुनावों को छोड़ दें तो कांग्रेस को नुकसान ही हुआ है राज्यों में.

कांग्रेसी यह बता ही नहीं पा रहे हैं कि क्योंकर वो एक के बाद एक चुनाव हारते जा रहे हैं? क्यों उनकी रणनीति सफल नहीं हो रही है? क्यों वो एक अच्छी राजनीतिक समझ के साथ ख़ुद को पेश नहीं कर पा रहे हैं?

कांग्रेसः परंपरा की क़ीमत

कई लोगों का मानना है कि कांग्रेस की हार के पीछे उसकी अपनी राजनीति करने की एक पुरानी परिपाटी है जिसमें किसी एक व्यक्ति को मुख्यमंत्री के तौर पर पेश नहीं किया जाता बल्कि हाईकमान के जादू पर कांग्रेस के नाम पर चुनाव होता था.

धरम सिंह
कांग्रेस के कई दिग्गजों को हार का सामना करना पड़ा है

अब स्थितियाँ वैसी नहीं हैं...जैसे-जैसे क्षेत्रीय दलों का दख़ल बढ़ा है, उसी तरह क्षेत्रीय स्तर पर लोगों की अपेक्षाएं भी बढ़ी हैं और अब लोग अपने नेता को अपने सामने देखना चाहते हैं.

भाजपा ने इसी तरह से येदुरप्पा को अपना नेता बनाकर लोगों के सामने पेश किया था. कांग्रेस को भी ऐसा करना चाहिए था जो कि उन्होंने नहीं किया और इसका भी नुकसान उन्हें केवल कर्नाटक में ही नहीं बल्कि बाक़ी राज्यों में भी उठाना पड़ा है.

कांग्रेस की यह आदत कि बाद में नेता चुन लेंगे, वो बात अब बिखरी है और छत्तीसगढ़, राजस्थान, मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में आगामी चुनावों के मद्देनज़र भी अभी तक कोई नेता कांग्रेस की ओर से घोषित नहीं किया गया है.

दूसरी एक बात और भी है कि अब वक्त राज्य स्तर पर नेतृत्व खड़ा करने का है. नेहरू जी के समय में भी प्रताप सिंह कैरों होते थे, कामराज जैसे नेता होते थे पर आज कांग्रेस में दूसरी और तीसरी पंक्ति के कद्दावर नेताओं की कमी है और पिछले 10-20 वर्षों में कांग्रेस की ऐसी संस्कृति पनपी है कि जो भी नेता उभरा है, उसके पर कतर दिए गए हैं.

इससे दूसरी और तीसरी पंक्ति का नेतृत्व पार्टी के पास नहीं है जो राज्यों में पार्टी की मुहिम चला सके. पार्टी को इससे बहुत नुकसान हो रहा है.

एक और समस्या है कि कांग्रेस अगर ऐसा करे भी और चुनाव से पहले एक आदमी को नेता बनाकर पेश करे भी तो कांग्रेस में यह देखने को मिलता रहा है कि अगर किसी नेता को मुख्यमंत्री के तौर पर पेश न करें तो उसकी कोशिश यह रहती है कि सरकार ही न बने. वे अपने बीच के किसी व्यक्ति को आगे जाते नहीं देखना चाहते.

कांग्रेस इसलिए भी किसी को पहले से नेता के तौर पर घोषित करने से कतराती रही है और जीत के बाद मन भांपकर निर्णय लेती रही है पर अब वो परिपाटी पुरानी हो चुकी है और कांग्रेस को इसका लाभ कम, नुकसान ज़्यादा हो रहा है.

कांग्रेस बनाम बसपा

एक बात और है. जहाँ-जहाँ कांटे की टक्कर हुई है, नहीं-नहीं करते हुए भी मायावती ने कांग्रेस को बहुत नुकसान पहुँचाया है.

 अब वक्त राज्य स्तर पर नेतृत्व खड़ा करने का है. नेहरू जी के समय में भी प्रताप सिंह कैरों होते थे, कामराज जैसे नेता होते थे पर आज कांग्रेस में दूसरी और तीसरी पंक्ति के कद्दावर नेताओं की कमी है और पिछले 10-20 वर्षों में कांग्रेस की ऐसी संस्कृति पनपी है कि जो भी नेता उभरा है, उसके पर कतर दिए गए हैं

कर्नाटक चुनाव से एक बार फिर से यह साबित हो गया है कि आने वाले राज्य चुनावों में कांग्रेस को मायावती से नुकसान होना है. गुजरात में भी ऐसा हुआ था.

इसका यह मतलब नहीं है कि मायावती कांग्रेस की प्रतिद्वंद्वी हैं पर मायावती जहाँ-जहाँ वोट काटेंगी, कांग्रेस को नुकसान होगा और कांग्रेस के प्रतिद्वंद्वी दलों को इसका लाभ मिलेगा.

आगामी राज्य चुनावों में भाजपा की नज़र इस बात पर होगी कि कैसे और कितना नुकसान मायावती कांग्रेस को पहुँचा सकती हैं ताकि उन्हें इसका लाभ मिले.

कांग्रेस के लिए यह आत्ममंथन का समय है. इस चुनौती को समझने का वक्त है कि कैसे इस संकट से उबरें और मतदाता को कटने से रोकें वरना इसका दुष्परिणाम उन्हें आगामी राज्य विधानसभा चुनावों और फिर आम चुनावों में उठाना पड़ सकता है.

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