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उत्तर प्रदेश में किताब पर प्रतिबंध लगा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
उत्तर प्रदेश सरकार ने एक सरकारी अधिकारी की लिखी किताब 'जातिराज' की सभी प्रतियाँ ज़ब्त करने के आदेश दिए हैं. लक्ष्मीकांत शुक्ल को पहले ही यह किताब लिखने के लिए निलंबित किया जा चुका है. यह किताब 2006 में प्रकाशित हुई थी और ये इंटरनेट पर भी उपलब्ध है. सरकार की दलील उत्तर प्रदेश के गृह सचिव महेश गुप्त ने बीबीसी को बताया, "इस किताब में कुछ जानी-मानी हस्तियों के बारे में अपमानजनक बातें लिखी गई हैं. इससे समाज में कड़वाहट फैल सकती है. इसलिए सरकार ने इस पर प्रतिबंध लगा दिया है." सरकार की ओर से जारी आदेश में कहा गया है कि ऐसी पुस्तक का लिखना जिसमें भड़काने वाली सामग्री हो और उसका प्रकाशन, दोनों ही भारतीय अपराध संहिता के तहत दंडनीय अपराध हैं. अंबेडकर के ख़िलाफ़ आरोप यह आदेश पाँच मई को जारी किया गया था, लेकिन इसे गुप्त रखा गया था. बीबीसी के पास इस आदेश की एक प्रति उपलब्ध है. पुस्तक में भारतीय संविधान के जनक कहे जाने वाले दलित नेता डॉक्टर बीआर अंबेडकर पर एक लेख में आरोप लगाया गया है कि उन्होंने राजनीतिक फ़ायदे के लिए समाज को जाति के आधार पर बाँटा. उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती डॉक्टर अंबेडकर को एक महान नेता मानती हैं और उनकी पार्टी बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का गठन दलितों के उत्थान के लिए हुआ था. बाद में उन्होंने अपना जनाधार बढ़ाने के लिए अपनी रणनीति बदल दी और अपनी पार्टी में ब्राह्मण और अन्य ऊंची जाति के लोगों को शामिल करना शुरू कर दिया. लेखक की दलील इसके लेखक ब्राह्मण जाति के हैं. उन्होंने कहा कि पुस्तक पर प्रतिबंध पूर्वाग्रह के आधार पर लगाया गया है. उनके अनुसार इसमें बताई गई बातें ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित हैं. इसका मक़सद किसी समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं है. उन्होंने कहा कि ये दो साल पहले प्रकाशित हुई थी और उससे समाज में कहीं भी तनाव पैदा नहीं हुआ था. |
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