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मंगलवार, 06 मई, 2008 को 13:52 GMT तक के समाचार
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आसान नहीं है देवगौड़ा की डगर

देवगौड़ा
देवगौड़ा मीडिया पर पक्षपात करने का आरोप लगा रहे हैं
बंगलौर में सड़क पर घूमते आम आदमी से अगर आप हरदनहल्ली डोडेगौडा़ देवगौडा़ के बारे में पूछेंगे तो आपको ज़्यादा सकारात्मक सुनने को नहीं मिलेगा.

उन्हें ढीला-ढाला नेता माना जाता है. ठीक चुनावों के बीच यह सुन कर लग सकता है कि यह देवगौडा़ और उनकी पार्टी जनता दल (सेक्युलर) के बुरे वक्त का संकेत है.

पर राजनीतिक विश्लेषक आगाह करते हैं कि पार्टी के बारे में इतनी जल्दी कोई राय बनाना ठीक नहीं.

बंगलौर स्थित 'इंटरनेशनल एकेडमी फॉर क्रिएटिव टीचिंग' के संचालक डॉक्टर संदीप शास्त्री कहते हैं, "देवगौड़ा की एक अलग राजनीतिक ज़मीन हैं. उनका मतदाता शहरों में नहीं रहता, वो उन्हें मीटिंग में सोते हुए टीवी पर नहीं देखता, अख़बारों से उसका ज़्यादा सरोकार नहीं. उसके लिए देवगौड़ा एक ऐसे नेता हैं जो उसकी भाषा में बात करते हैं".

 श्रीमान जी, इस देश में क्या होने वाला है कोई नहीं समझ सकता. कुछ भी हो सकता है
देवगौड़ा

संदीप शास्त्री की बात से बंगलौर स्थित एशियन एज़ अख़बार के ब्यूरो प्रमुख भास्कर हेगडे़ इत्तेफ़ाक़ रखते हैं. वे कहते हैं, 'देवगौड़ा का इतिहास देखते हुए उन्हें ख़त्म मान लेना गलत होगा".

वर्ष 1999 के चुनावों में देवगौड़ा के दस विधायक जीत कर आए थे और उनमें से चार विधायकों को छोड़कर सबने कांग्रेस की तरफ़ पाला बदल लिया. लेकिन वर्ष 2004 में देवगौड़ा 58 विधायकों के साथ वापस आए.

कर्नाटक के पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को सबसे ज़्यादा 35 फ़ीसदी मत मिले पर सीटों के मामले में वह 65 सीटों के साथ दूसरे स्थान पर रही.

भाजपा को सबसे ज़्यादा 79 सीटें मिलीं पर उन्हें सिर्फ़ 29 प्रतिशत वोट ही मिले. इन मतों में अगर उस समय के गठबंधन साथी जनता दल(यू) के मत भी मिला दिए जाएँ तो उसे कांग्रेस से भी कम मत मिले.

जनता दल (सेक्युलर) को केवल 21 फ़ीसदी मत मिले, पर इनके विधायकों ने 58 सीटें जीती.

इसका अर्थ यह कि जनता दल (सेक्युलर) और भाजपा के मतदाता ख़ास इलाकों में केंद्रित हैं, जबकि कांग्रेस के मतदाता पूरे राज्य में फैले हुए हैं.

चुनावी समीकरण

पर इस बार देवगौड़ा की मुश्किलें कुछ ज़्यादा ही हैं. पिछली बार उनकी पार्टी के टिकट पर जीते 25 विधायकों ने पार्टी छोड़ दी है.

इनमे से कद्दावर पूर्व उप-मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और एमपी प्रकाश जैसे लोग भी हैं. अधिकांश छोड़ने वाले नेता कांग्रेस में गए हैं.

 देवगौड़ा जी की एक अलग राजनीतिक ज़मीन हैं. उनका मतदाता शहरों में नहीं रहता, वो उन्हें मीटिंग में सोते हुए टीवी पर नहीं देखता, अख़बार से उसका ज़्यादा सरोकार नहीं. उसके लिए देवेगौड़ा एक ऐसे नेता हैं जो उसकी भाषा में बात करता है
डॉक्टर संदीप शास्त्री

देवगौड़ा की आगामी रणनीति पर भास्कर हेगडे़ का कहना हैं कि पूर्व प्रधानमंत्री इस बार अपनी पार्टी की रणनीति अलग अलग विधानसभा क्षेत्र की ज़रूरतों के हिसाब से बनाएँगें.

उनका कहना है, "वो हर क्षेत्र में जाति और अन्य स्थानीय समीकरण देख कर अपने प्रत्याशियों पर काम करेंगे."

देवगौड़ा अपने राजनीतिक कार्यकाल में कई उतार-चढ़ाव देख चुके हैं. उनके चेहरे पर हताशा और कमज़ोरी का कोई भाव नहीं हैं. वह कांग्रेस और भाजपा को लानतें भेज रहे हैं और मीडिया पर पक्षपात का आरोप लगा रहे हैं.

जब उनसे मैंने पूछा कि भविष्य के बारे में वह क्या सोचते हैं तो देवगौड़ा ने कहा, "श्रीमान जी, इस देश में क्या होने वाला है कोई नहीं समझ सकता. कुछ भी हो सकता है."

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