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मुंबई में उजड़ेगी एक पुरानी बस्ती | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
हवाई जहाज़ों की भीषण आवाज़ 12 वर्षीय सुनीता विश्वकर्मा के लिए मोटर गाड़ियों की आवाज़ों से भी ज़्यादा जानी-पहचानी है. बचपन से उसने हवाई जहाज़ों को उड़ते-उतरते देखा है. वह भारत की आर्थिक राजधानी मुबंई के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के एक रनवे के नज़दीक वर्षों पुरानी झुग्गी बस्ती में एक छोटे-सी झोपड़ी में रहती है. आज़ाद नगर की संकरी गलियों वाली इस झोपड़पट्टी में कई घर पचास वर्षो से भी ज़्यादा पुराने हैं. इन गलियों में ज़्यादातर छोटी फ़ैक्टरियों में काम करने वाले कामगार रहते हैं. अब सरकार ने एयरपोर्ट की ज़मीन पर अनाधिकृत रूप से 200 एकड़ में फैली इन झुग्गियों को हटाने का फ़ैसला किया है. दशकों से हवाई यात्रा करने वालों के लिए झुग्गियों के ऊपर से हो कर मुबंई के इस रनवे पर उतरना दहशत से भरा अनुभव रहा है. विरोध सुनीता की माँ गीता अपनी बड़ी बेटी गुड़िया के साथ मिलकर नकली गहनों के लिए मनके बनाती है जिससे उनके घर का चूल्हा जलता है. वह कहती हैं, "काफ़ी समय से हमें यहाँ से दूसरी जगह बसाने की बात चल रही है. हमारे कई पड़ोसी तो गली छोड़ कर जा भी चुके हैं." झुग्गी बस्ती में रहने वाले कुछ लोगों ने झुग्गियों को ध्वस्त करने का काफ़ी विरोध किया है. उन्हें डर है कि इससे उन्हें काम करने और बाज़ार में माल बेचने में दिक्कतें आएँगी. साथ ही नई जगह से दूर होने की वज़ह से उनके बच्चों को स्कूल जाने में भी परेशानी होगी. मुबंई अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट के प्रवक्ता मनीष कालघातगी का कहना है, "झुग्गियों में रहने वालों को दूसरी जगहों पर बसाया जाएगा. झुग्गियाँ एयरपोर्ट की ज़मीन पर हैं और रन वे काफ़ी नज़दीक है." आज़ादनगर के निवासी दिक्कतों के बावज़ूद झुग्गियों को नहीं छोड़ना चाहते हैं. तीन वर्ष पहले मानसून में पूरा रनवे पानी में डूब गया था फिर भी लोगों ने अपनी झुग्गियों को नहीं छोड़ा. आमीना मोहम्मद शेख़ कहती हैं कि बाढ़ ने उन्हें नहीं डराया था लेकिन पड़ोसियों को चुपचाप झोपड़ियों को छोड़ कर जाते देख उन्हें दहशत सी होती है. वो कहती हैं, "अगर सब लोग चल जाऐँगे तो हम यहाँ क्या करेंगें? इस गली में सिर्फ मेरा घर ही बचा है. अब मैं भी यहाँ नहीं रहना चाहती हूँ. नया घर दूर है तो क्या हुआ, मैं अकेले यहाँ पर नहीं रह सकती." वो कहती हैं कि ज़्यादातर लोगों को शहर के बाहरी इलाक़ों में बसाया जा रहा है. मानवाधिकारों के लिए काम करने वाले मोहम्मद यासीन कहते हैं कि झुग्गियों में रहने वालों का पुनर्वास हमेशा से विवाद में घिरा रहा है. एक अनुमान के मुताबिक मुबंई के 60 प्रतिशत लोग झुग्गियों और झोपड़पट्टियों में रहते हैं. उन्होंने कहा, "यदि सिर्फ इस वज़ह से कि झुग्गियाँ देखने में अच्छी नहीं लगती उन्हें हटा कर शहर से बाहर कर दिया जाए, यह काफ़ी दुखद है." | इससे जुड़ी ख़बरें झुग्गी-झोंपड़ी वाले भी निकाल रहे हैं पत्रिका08 अगस्त, 2004 | भारत और पड़ोस चटगांव की झुग्गियों में आग, 21 मरे06 मार्च, 2007 | भारत और पड़ोस धारावी को धराशायी करने की तैयारी31 मई, 2007 | भारत और पड़ोस झुग्गी बस्ती धारावी को सँवारा जाएगा01 मार्च, 2004 | भारत और पड़ोस झोपड़ पट्टी में लगी आग, पाँच की मौत04 अप्रैल, 2006 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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