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रोज़गार के अवसरों के लिए लोगों में चिंता | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
दिसंबर के महीने में हिमाचल प्रदेश घूमकर चुनावों की रिपोर्टिंग करना मेरे लिए चुनौतियों से भरा था. उस पर समस्या ये कि मुझे ठंड कुछ ज़्यादा ही लगती है. दिसंबर में रजाई छोड़ने की बात से ही मुझे कंपकंपी सी लगने लगती है. हिमाचल यात्रा के दौरान मैं जिस होटल में ठहरा, पहली चिंता होती थी कि हीटर ठीक चलता है कि नहीं, कमरा गर्म रहेगा कि नहीं, आदि आदि. लेकिन मेरी चिंता यहां ख़त्म नहीं होती थी. मैं दिल्ली से हिमाचल में कुछ जानने वालों के मोबाइल नंबर लेकर गया था. सोचा था कि कुछ समस्या होगी तो उनसे मदद ले लूंगा. लेकिन वहां ठंडे मौसम में डर लगता था कि अगर साढ़े दस या ग्यारह बजे सुबह फ़ोन कर दिया तो उस वक्त वो कहीं सो तो नहीं रहा होगा. मेरे ड्राइवर मक़बूल ने ताना दिया. कहा, आपको पहाड़ी लोगों के बारे में कुछ पता है नहीं, और इतनी दूर चले आए हैं. मेरे सफ़र का पहला पड़ाव था शिमला. राष्ट्रीय चैनलों से खफ़ा जब हिमाचल में चुनावी रैलियां पूरे शबाब पर थीं, राष्ट्रीय मीडिया में गुजरात में होने वाले चुनाव छाए हुए थे. हिमाचल का ज़िक्र बेहद कम था. एक वेबसाइट पर पढ़ा कि कैसे राष्ट्रीय मीडिया ने हिमाचल की पूरी तरह से उपेक्षा की है. मैं जहां भी बीबीसी का माईक लेकर पहुंचता था, लोगों को आश्चर्य होता था कि बीबीसी को हिमाचल के चुनावों में क्या दिलचस्पी है. जब मैं रात शिमला के प्रेस क्लब पहुंचा तो एक पत्रकार तो अड़ ही गए कि मैं अपना प्रेस कार्ड दिखाऊं. मैने पहले सोचा कि वो मज़ाक कर रहे हैं. लेकिन ऐसा नहीं था. वे अपना प्रेस कार्ड सामने रखी मेज़ पर फेंकते हुए बोले, दिखाइये आप अपना प्रेस कार्ड. मैं नहीं मानता आप बीबीसी से हैं. माहौल गर्माते देख, कुछ स्थानीय पत्रकार उन्हें समझाने में जुट गए और मामला बिगड़ते देख मैं वहां से खिसक लिया. यात्रा के दौरान मैं ऐसे कई लोगों से मिला जो इस बात से थोडे़ खफ़ा दिखे कि राष्ट्रीय टीवी चैनलों में हिमाचल के चुनावों का ज़्यादा ज़िक्र नहीं है. हालांकि हिमाचल का स्थानीय मीडिया चुनावी समाचारों का ज़ोर-शोर से प्रसारण कर रहा था. लोगों की चिंता यहां ये कहते चलें कि कुछ टीवी चैनलों ने तो मान ही लिया कि एक पार्टी ने चुनाव जीत ही लिया है. किसी पार्टी के प्रोपोगैंडे या प्रचार में कितना ज़ोर होता है, ये तब पता चला जब मैने लोगों से बात की. भारतीय जनता पार्टी जहां बात कर रही थी भ्रष्टाचार की, लोग बात कर रहे थे रोज़गार की.
हिमाचल की इस यात्रा में मैंने कई जगहों का दौरा किया. शिमला के अलावा मैं मंडी, हमीरपुर, पालमपुर, कांगडा और ऊना भी गया. जिस विषय ने मुझे सबसे ज़्यादा प्रभावित किया वो थी फैली हुई बेरोज़गारी और लोगों का इस बात को समझना कि उनके लिए बेरोज़गारी एक बड़ा सामाजिक मुद्दा है, ना कि भावनात्मक मुद्दा. समाज के हर वर्ग में चिंता थी कि कैसे उनके प्रदेश में रोज़गार के अवसर पैदा किए जाएं और इसमें सरकार की भूमिका क्या हो. वैसे मैं मंडी पहुंचा तो था पंडित सुखराम का साक्षात्कार करने. पता चला राहुल गांधी भी वहां पहुंच रहे हैं. कांग्रेस के मीडिया मैनेजर ये कहते रहे कि राहुल पहुंचेंगे करीब बारह बजे, और वो आए काफ़ी लेट. काफी भीड़ वहां जमा थी. हालांकि इस भीड़ में ज़्यादातार पार्टी कार्यकर्ता ही थे. बगल में बैठे एक स्थानीय पत्रकार ने मेरे कान में कहा, कार्यकर्ताओं ने जगह छोड़ी हो, तभी तो जनता आएगी. राहुल गांधी आए और थोड़ी ही देर में अपनी गाड़ी में उड़न-छू हो गए. हालांकि लोगों ने काफ़ी दूर तक उनका पीछा किया. लेकिन जल्द ही वे बहुत दूर निकल गए. हिमाचल के लोग हर कोशिश कर रहे हैं कि उनके नेता सिर्फ़ वादे न करें. उन्हें अपने वोट की ताकत पर पूरा भरोसा है. | इससे जुड़ी ख़बरें हिमाचल प्रदेश में 67 प्रतिशत मतदान19 दिसंबर, 2007 | भारत और पड़ोस हिमाचल में दूसरे चरण का मतदान18 दिसंबर, 2007 | भारत और पड़ोस हिमाचल में दूसरे चरण का प्रचार अभियान 17 दिसंबर, 2007 | भारत और पड़ोस 'अभी भी है राजनीति पर सुख राम की पकड़'16 दिसंबर, 2007 | भारत और पड़ोस हिमाचल चुनावों के लिए सूची जारी22 नवंबर, 2007 | भारत और पड़ोस हिमाचल में तीन सीटों के लिए मतदान13 नवंबर, 2007 | भारत और पड़ोस गुजरात और हिमाचल में चुनाव घोषित10 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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