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गुजरात में 60 प्रतिशत मतदान | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
गुजरात विधानसभा चुनाव के पहले चरण में मंगलवार को मतदान शांतिपूर्ण समाप्त हो गया है जिसमें 182 में से 87 सीटों के लिए लोगों ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया. भारतीय चुनाव आयोग की शुरुआती रिपोर्ट के अनुसार 60 से 65 प्रतिशत मतदाताओं ने वोट डाले. सूरत से बीबीसी संवाददाता का कहना है कि शुरुआत में मतदान धीमा था लेकिन बाद में इसने रफ़्तार पकड़ी और कई मतदान केंद्रों पर लंबी लाइनें देखी गईं. राजकोट से भी लोगों के बड़ी संख्या में वोट डालने के लिए निकलने की ख़बरें मिलीं. इस चुनाव में मुख्य मुक़ाबला भाजपा के नरेंद्र मोदी और कांग्रेस के बीच है. मंगलवार को मतदान दक्षिण गुजरात, सौराष्ट्र और कच्छ के इलाक़े में हुआ. पहले दौर में एक करोड़ 78 लाख 77 हज़ार से ज़्यादा लोग अपने मताधिकार का प्रयोग करने के योग्य थे. मतदाता इस दौर में 53 महिलाओं समेत 669 उम्मीदवारों के राजनीतिक भाग्य का फ़ैसला मतपेटियों में बंद हो गया. इस चरण में मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के 10 मंत्रियों की चुनावी क़िस्मत दांव पर लगी है जिनमें सिंचाई मंत्री नरोत्तम पटेल, ऊर्जा मंत्री सौरभ पटेल, वित्त मंत्री वाजू वाला भी हैं. गुजरात विधान सभा में विपक्ष के नेता अर्जुन मोधवादिया और भारतीय जनता पार्टी के कुछ असंतुष्ट नेताओं का भी राजनीतिक भाग्य पहले चरण के मतदान के बाद मतपेटियों में बंद हो गया है. भाजपा के विद्रोहियों में एक प्रमुख नेता हैं धीरूभाई गजेरा जो सूरत (उत्तर) से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़े हैं. 2002 के चुनाव में उन्होंने भाजपा के टिकट पर जीत हासिल की थी. ख़ुद गजेरा ने सूरतद में भारी सुरक्षा इंतज़ामों के बीच मतदान किया. बालूभाई ताँती, बेचड़ भदानी, बावकू अंधड़ कुछ ऐसे भाजपा विद्रोही नाम हैं जो कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं. भाजपा विद्रोहियों के अलावा कांग्रेस के अनेक मौजूदा विधायक भी चुनावी क़िस्मत आज़मा रहे हैं. चुनाव का दूसरा और अंतिम चरण 16 दिसंबर को होगा जबकि 23 दिसंबर को मतगणना होगी. ये चुनाव गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए बहुत अहम हैं. भाजपा लगातार तीसरी बार राज्य में सत्ता हासिल करने की कोशिश कर रही है. वहीं कांग्रेस का कहना है कि भाजपा ने 2002 का चुनाव सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के कारण जीता था लेकिन इस बार मोदी के विकास के दावे खोखले साबित हो गए हैं. चुनौती प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने अपनी चुनावी सभाओं में नरेंद्र मोदी को निशाना बनाया है.
गोधरा कांड और उसके बाद हुई सांप्रदायिक हिंसा की छाप इन चुनावों पर भी स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है. नरेंद्र मोदी को चुनाव में मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है. पटेल समुदाय में ख़ासा असर रखने वाले उन्हीं की पार्टी के नेता केशुभाई पटेल बाग़ी तेवर अख़्तियार किए हुए हैं. भाजपा के आठ बाग़ी नेता कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं. जानकारों का कहना है कि सौराष्ट्र और कच्छ का इलाक़ा बहुत हद तक फ़ैसला कर सकता है कि गुजरात में सत्ता की बागडोर किसके हाथों में होगी. सन् 2002 के चुनावों में भाजपा ने इस इलाक़े से 39 सीटें हासिल कीं थीं. कांग्रेस के हाथ 18 सीटें लगी थीं. एक सीट निर्दलीय उम्मीदवार की झोली में गई थी. |
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