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मंगलवार, 20 नवंबर, 2007 को 05:50 GMT तक के समाचार
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भारत-रूस संबंध अब उतने मधुर नहीं?

मनमोहन सिंह पुतिन के साथ (फ़ाइल फ़ोटो)
पिछले कुछ समय से भारत और रूस के संबंधों में दरार आती नज़र आ रही है
भारत और रूस की दोस्ती काफ़ी पुरानी है और समय ने इसकी काफ़ी परीक्षा भी ली है. लेकिन पिछले काफ़ी समय से संकेत आ रहे हैं कि दोनों देशों के बीच रिश्ते उतने मधुर नहीं रह गए हैं जितने शायद दो दशक पहले हुआ करते थे.

किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री का रूस दौरा इतना संक्षिप्त नहीं रहा जितना कि मनमोहन सिंह का हाल का दौरा. वो सिर्फ़ 28 घंटे मॉस्को में रहे और उनकी यात्रा के बाद कोई संयुक्त विज्ञप्ति भी जारी नहीं की गई.

क्या यह भारत-रूस संबंधों का सबसे ख़राब दौर है या दोनों देशों के बीच अभी भी रणनीतिक साझीदारी की भूमिका निभाने की संभावना है?

दोनों देशों के संबंध लॉर्ड सॉल्सबरी के उस कथन का उदाहरण है - 'विदेश नीति में न तो कोई स्थाई दोस्त होते हैं और न ही स्थाई दुश्मन - स्थाई होते हैं तो सिर्फ़ राष्ट्रीय हित.'

रिश्तों में कड़वाहट

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर पुष्पेश पंत कहते हैं, "मुझे लगता है कि इस तरह की बेरुख़ी और इस तरह की बेमुरव्वती पहले कभी हिंदुस्तान और रूस के रिश्तों में देखने को नहीं मिली थी.

प्रोफ़ेसर पंत का कहना है, "चर्चा पहले ही शुरू हो गई थी कि पुतिन उनका गर्मजोशी से स्वागत नहीं करेंगे और रूस के प्रधानमंत्री उनसे मिलेंगे. तो एक तरह से भारत के प्रधानमंत्री को रूस के लिए उनकी अहमियत बता दी गई थी - फिर चाहे रूस महाशक्ति न हो लेकिन वहां का राष्ट्रपति उनसे मिलने को आतुर नहीं है."

मनमोहन सिंह
टीकाकार मानते हैं कि हाल के रूस दौरे में मनमोहन का फीका स्वागत हुआ

एक कारण तो साफ़ नज़र आता है कि पिछले दस सालों में भारत जिस तरह अमरीका के क़रीब आया है, रूस को ये नागवार गुज़रा है. लेकिन न आज का भारत सत्तर के दशक का भारत है और न ही आज का रूस सत्तर के दशक का सोवियत संघ है.

भारत के पूर्व विदेश सचिव मुचकुंद दुबे रूस की भारत से नाराज़गी के कुछ और कारण गिनाते हैं, "अमरीका रूस के पड़ोस के देशों में मिसाइल-रोधी हथियार तैनात करने जा रहा है. भारत बिल्कुल चुप है. इसलिए रूस का यह सोचना वाजिब है कि भारत एक तरह से अमरीका के पक्ष में है."

रूस-भारत संबंध का स्वर्णिम युग शुरू हुआ था 1971 में जब दोनों देशों ने एक दीर्घकालीन मित्रता संधि की थी. भारत-पाकिस्तान युद्घ में रूस ने न केवल भारत की सैन्य मदद की बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी भारत का भरपूर साथ दिया था.

शीतयुद्ध का समय

साउथ एशिया एनालिसिस ग्रुप के सुभाष कपिला कहते हैं, "वो शीतयुद्घ का ज़माना था और उस वक्त भारत अपनी नीतियों के हिसाब से बहुत अकेला पड़ रहा था. भारत की गुटनिरपेक्षता की नीति अमरीका को पसंद नहीं थी और इसी वजह से अमरीका ने भारत को बड़े दबाव में डाला."

 वो शीतयुद्घ का ज़माना था और उस वक्त भारत अपनी नीतियों के हिसाब से बहुत अकेला पड़ रहा था. भारत की गुटनिरपेक्षता की नीति अमरीका को पसंद नहीं थी और इसी वजह से अमरीका ने भारत को बड़े दबाव में डाला
सुभाष कपिला

कपिला आगे कहते हैं, "उस समय चीन के साथ भी रिश्ते कुछ सही नहीं थे तो भारत को रूस की तरफ़ देखना पड़ा."

लेकिन अब हालात बदल चुके हैं. हथियारों के लिए भारत के पास न केवल बेहतर विकल्प हैं बल्कि उनकी बिक्री के बाद सेवाएँ भी रूस से बेहतर हैं.

जाने-माने रक्षा विश्लेषक और इंडियन डिफेंस रिव्यू के संपादक भरत वर्मा मानते हैं, "भारत के पास आज पश्चिमी देशों के उन्नत तकनीकी विकल्प हैं. रूस भी आज फ़्रांस और इसराइल जैसे देशों के पास जा रहा है."

उनका कहना है, "ये संभव है कि भारत की तकनीक और रक्षा उपकरणों जैसे क्षेत्रों में रूस का हिस्सा कुछ कम हो जाए, क्योंकि सबसे उन्नत तकनीक रूस के पास नहीं पश्चिमी देशों के पास है."

सिक्के का दूसरा पहलू

सिक्के का दूसरा पहलू ये है कि जिस तरह से रूस ने चीन को महत्व देना शुरू किया है वो भारत को पसंद नहीं आया है. क्या ऐसा अमरीका को नीचा दिखाने के लिए किया गया है ?

भरत वर्मा कहते हैं, "रूस अब ख़ुद अमरीका के क़रीब गया है और पुतिन के कार्यकाल के दौरान ही गया है. येल्तसिन के समय में रूस केवल पश्चिमी देशों की ओर देख रहा था. लेकिन रूस को उनसे कुछ मिला नहीं और उस समय जो बर्बादी हुई वो पुतिन ने संभाली है."

पुतिन
'रूस अब चीन को ख़ासा महत्व दे रहा है'

लेकिन क्या समय के चलते भारत-रूस संबंधों का रणनीतिक महत्व कम हो गया है? नई राजनीतिक परिस्थितियों में क्या रूस को साथ लेकर चलना भारत के हित में नहीं रहा ?

कपिला ऐसा नहीं मानते, "भारत और रूस के बीच रणनीतिक भागीदारी का समय-समय पर परीक्षण किया जा चुका है जबकि भारत और अमरीका की रणनीतिक भागीदारी अभी तक साबित नहीं हुई है. अमरीका जब तक इसे साबित न कर दे तब तक भारत को कोई परिवर्तन नहीं लाना चाहिए."

आज दोनों देशों का अपना अपना महत्व है और उन्हें एक दूसरे की ज़रूरत भी है. परमाणु करार के मामले में न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी में भारत को रूसी समर्थन की दरकार होगी. वहीं भारत की तेज़ आर्थिक प्रगति और बढ़ते बाज़ार की अनदेखी करना भी रूस के हित में नहीं होगा.

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