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चार पत्रकारों को चार-चार महीने की जेल | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अदालत की अवमानना के एक मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय ने 'मिड डे' अख़बार के चार पत्रकारों को चार-चार महीने की जेल की सज़ा सुनाई है. सज़ा पाने वालों मे 'मिड डे' के स्थानीय संपादक और प्रकाशक के साथ-साथ एक कार्टूनिस्ट भी हैं. अदालत की अवमानना का मामला 'मिड डे' अख़बार में 18 मई को छपे एक लेख से संबंधित है. अदालत ने अपने आदेश में कहा कि 'लेख से सुप्रीम कोर्ट की छवि धूमिल होती है. इससे इस संस्था में आम लोगों के विश्वास में कमी आ सकती है.' उधर पत्रकार इस मामले को सुप्रीम कोर्ट ले गए थे और सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि दोषी ठहराए गए लोगों को उच्च न्यायालय तत्काल ज़मानत दे दे. इसके बाद अब इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में 28 सितंबर को होगी. पूर्व मुख्य न्यायाधीश पर टिप्पणी 'मिड डे' में छपे लेख में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायधीश वाईके सभरवाल पर दिल्ली में अवैध तरीक़े से रिहायशी इलाक़ों में चल रही दुकानों को सील करने के आदेश से संबंधित कुछ टिप्पणियाँ की थीं. उधर 'मिड डे' की स्थानीय संपादक वितुषा ओबरॉय ने पत्रकारों को बताया, "हमने अदालत से कहा था कि ये एक व्यक्ति के खिलाफ़ कही गई बात थी. ऐसा करके सुप्रीम कोर्ट के पूरे बेंच के खिलाफ़ कोई आरोप लगाने की हमारी कोई मंशा नही थी." कुछ वरिष्ठ पत्रकारों ने इस मामले में अपने विचार रखे हैं. टाइम्स ऑफ़ इंडिया अख़बार के पूर्व संपादक दिलीप पडगाँवकर ने इसे मीडिया के लिए एक दुखद दिन बताया है. उनका कहना था, "आज का दिन प्रेस की आज़ादी के लिए एक दुखद दिन है क्योंकि अदालत की अवमानना के प्रस्तावित क़ानून पर इस देश मे बहस अभी जारी है. मेरे विचार में दोषियों को एक सांकेतिक सज़ा देकर आम लोगों और मीडिया को अवमानना पर प्रस्तावित क़ानून पर अपनी राय और सुझाव देने का मौक़ा दिया जा सकता था." पडगाँवकर का कहना था, "मीडिया और न्यायपालिका के हित में है की वो इस बात को निर्धारित करें कि ये सब संतुलित तरीक़े से हो. आशा है जब सुप्रीम कोर्ट के सामने मामला आएगा तो इन प्रश्नों पर ज़रूर विचार होगा." उधर दिल्ली यूनियन ऑफ़ जर्नलिस्ट्स ने इस मामले में दी गई सज़ा को सख़्त बताते हुए कहा है कि पत्रकार तो जनहित में ही काम कर रहे थे. इस मामले में पत्रकारों के इस संगठन ने 22 सितंबर को एक आपात बैठक बुलाई है. | इससे जुड़ी ख़बरें 'अदालती फ़ैसले पर राजनीति उचित नहीं'23 अगस्त, 2005 | भारत और पड़ोस क्या आम आदमी पर नज़र है अदालतों की?25 अगस्त, 2005 | भारत और पड़ोस 'शरीयत अदालतें समानांतर अदालतें नहीं'28 अगस्त, 2005 | भारत और पड़ोस सरकार ने कहा, अदालतें ही सर्वोपरि17 अगस्त, 2005 | भारत और पड़ोस शरीयत अदालतों पर नोटिस16 अगस्त, 2005 | भारत और पड़ोस अदालत का एक फ़ैसला और कई सवाल20 अप्रैल, 2005 | भारत और पड़ोस गुजरात दंगा पीड़ितों के लिए राहत की उम्मीद20 दिसंबर, 2004 | भारत और पड़ोस डॉक्टर की चूक अपराध नहीं-अदालत05 अगस्त, 2004 | भारत और पड़ोस इंटरनेट लिंक्स बीबीसी बाहरी वेबसाइट की विषय सामग्री के लिए ज़िम्मेदार नहीं है. | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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