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अदालत का एक फ़ैसला और कई सवाल

सुप्रीम कोर्ट
कल्पना करें कि आप किसी आम नागरिक की तरह एक मकान ख़रीदने जाएँ और हाउसिंग सोसाइटी आपसे आपकी जाति या धर्म पूछे और मकान बेचने से इनकार कर दे.

या हो सकता है कि आपको कोई मकान बेचने से इसलिए इनकार कर दिया जाए कि आपका रहन-सहन और खान-पान सोसाइटी के नियमों के अनुसार नहीं है.

अगर आपको यह कल्पना कठिन लगती है तो तैयार रहिए कि ऐसी कठिन परिस्थिति आपके जीवन में किसी भी समय आ सकती है.

और इसका रास्ता खोला है भारत के सर्वोच्च न्यायालय के एक फ़ैसले ने.

इसका मतलब यह है कि गुजरात में हिंदू और मुस्लिम बस्तियों की जो सिहराने वाली कहानियाँ थीं वो अब हर शहर का सच हो सकती हैं और गाँवों में अलग दलित बस्तियों की कड़वी सच्चाई अब शहरों में भी दिखाई पड़ सकती हैं.

समाज विज्ञानी और क़ानून के जानकार मानते हैं कि ये फ़ैसला पिछली सदी का, समस्याएँ बढ़ाने वाला और राष्ट्रीय एकता के ख़िलाफ़ दिखता है.

इसका मतलब यह है कि हाउसिंग सोसाइटी चाहें तो किसी ख़ास जाति और धर्म के लोगों को सदस्यता और मकान आदि देने से इनकार कर सकती हैं.

फ़ैसला

दरअसल सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक फ़ैसले में कहा है कि जाति, धर्म, लिंग और व्यवसाय के आधार पर हाउसिंग सोसाइटी बनाना ठीक है.

इस फ़ैसले के अनुसार अगर कोई सोसाइटी चाहे तो अपने नियम-क़ायदों के अनुसार किसी को मकान या फ़्लैट बेचने से इनकार कर सकती है.

जस्टिस बीएन अग्रवाल और पीके बालासुब्रमण्यम के एक पीठ ने यह फ़ैसला गुजरात की एक हाउसिंग सोसाइटी की याचिका पर दिया है जो पारसियों ने बनाई थी.

सर्वोच्च न्यायालय ने इस तर्क को मानने से इनकार कर दिया कि यह नागरिकों के मूलभूत अधिकारों का हनन है.

इससे पहले अहमदाबाद हाईकोर्ट ने धर्म-जाति और व्यवसाय के आधार पर सोसाइटियों में रहने का अधिकार देने से इनकार कर दिया था.

इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ ही सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की गई थी.

जानकार लोग कहते हैं कि जब संविधान की भावना को न समझ कर उसे सिर्फ़ शब्दों के रुप में पढ़ा जाएगा तब यही समस्या पैदा होगी.

सवाल

इस एक फ़ैसले ने कई मूलभूत सवाल खड़े कर दिए हैं.

 भारतीय समाज पहले से ही छोटे-छोटे समूह, जाति-उपजाति आदि में विभाजित है तब यह ख़तरा बढ़ा है कि इससे लोगों की सोच का दायरा और संकुचित हो जाए
सुधीश पचौरी

भारतीय समाज यूँ भी अपने वर्ण और वर्ग भेद की समस्या से जूझता रहा है और इक्कीसवीं सदी में भी हालत ये है कि भारतीय गाँवों में दलितों और कथित उच्च जातियों के लोग एक साथ नहीं रहते.

उनकी बस्तियाँ अलग हैं उनके कुएँ अलग हैं और उनके तालाब अलग हैं और अगर एक हैं भी तो उनके घाट अलग हैं. यह सब भी बिना किसी क़ानूनी व्यवस्था के बदस्तूर जारी है.

संतोष करने भर को इतना था कि शहरों में अब तक इस तरह की कोई व्यवस्था आमतौर पर नहीं दिखती थी और अगर कहीं थी भी तो उसे कोई क़ानूनी मान्यता नहीं थी.

लेकिन सर्वोच्च न्यायालय के इस फ़ैसले ने इस व्यवस्था को क़ानूनी जामा पहना दिया है.

सो अब तक ये सिर्फ़ गुजरात की कहानी थी कि हिंदू बहुल इलाक़ों में मुसलमानों को कोई मकान नहीं बेचना चाहता था और यही कहानी दूसरे सिरे पर भी थी.

यह भी सच था कि व्यवसाय के आधार पर हाउसिंग सोसाइटियाँ बनाई जा रही थीं और आमतौर पर दूसरे व्यवसाय के लोगों को वहाँ प्रवेश की अनुमति नहीं थी लेकिन अब यह व्यवस्था हर स्तर पर लागू हो सकेगी.

यानी एक ख़ास तरह के रहन-सहन और आचार व्यवहार वाले लोग यदि चाहे तो उनके आसपास कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं रह सकेगा जिसे वे अपने स्तर का नहीं मानते.

'अपने समय से पीछे'

समाज विज्ञानी सुधीश पचौरी मानते हैं कि सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय चिंता पैदा करने वाला है. उन्होंने बीबीसी से कहा कि वे सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय को समय से पीछे धकेलने वाला मानते हैं.

सुधीश पचौरी ने कहा कि जब समाज में यह कोशिश चल रही है कि किसी वर्ग विशेष की गोलबंदी न हो तब यह उल्टा असर डालेगा.

उनका कहना है कि जिस ज़माने में वैश्विकरण की बात की जा रही हो और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लोगों को कहा जा रहा हो कि वे आकर इस देश में संपत्ति ख़रीद लें तब ये निर्णय चकित करता है.

पचौरी मानते हैं कि भारतीय समाज पहले से ही छोटे-छोटे समूह, जाति-उपजाति आदि में विभाजित है तब इस फ़ैसले से यह ख़तरा बढ़ा है कि इससे लोगों की सोच का दायरा और संकुचित हो जाए.

पचौरी का कहना है कि यह फ़ैसला अपने समय को ठीक तरह से नहीं पढ़ पा रहा है और समाज में आवश्यक सांस्कृतिक बहुलता को इससे ख़तरा हो सकता है.

'सामाजिक रुप से ग़लत'

वहीं दूसरी ओर क़ानूनविद पीएन लेखी मानते हैं कि यह निर्णय सामाजिक रुप से ग़लत दिखाई देता है और राष्ट्रीय स्तर पर सामाजिक एकता क़ायम करने वाला भी नहीं है.

उनका कहना है कि इस फ़ैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने हाउसिंग सोसाइटी को राज्य सत्ता का हिस्सा नहीं माना है बल्कि इसे निजी संस्था के रुप में देखते हुए फ़ैसला दिया है.

वे कहते हैं कि अल्पसंख्यकों के कथित संरक्षण के लिए जिस तरह से उनको एक्सक्लूसिव एडमिनिस्ट्रेशन राइट दिए गए हैं उसी तरह के अधिकार देने के रुप में यह फ़ैसला आया है.

बीबीसी से उन्होंने कहा कि वैसे भी इस तरह के मामले में सुप्रीम कोर्ट का रवैया कभी दाएँ कभी बाएँ रहा है और इसमें कोई स्थिरता नहीं दिखाई देती.

वे बताते हैं कि थोड़े दिनों पहले जब गुजरात के लोग महाराष्ट्र के उस क़ानून के ख़िलाफ़ अदालत में आए कि महाराष्ट्र में मराठी पढ़ना आवश्यक कर दिया गया है और इससे उनकी संस्कृति को नुक़सान होगा तब अदालत ने कहा था कि गुजरात के लोगों को मराठी भी पढ़ना चाहिए और यह राष्ट्रीय एकता के लिए अच्छा है.

वह कहते हैं कि अपने उस फ़ैसले को अगर सर्वोच्च न्यायालय ध्यान में रखता तो शायद यह निर्णय कुछ और होता.

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