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गुरुवार, 30 अगस्त, 2007 को 11:55 GMT तक के समाचार
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परमाणु संधि पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन

मनमोहन सिंह
परमाणु समझौते पर मनमोहन सिंह को वामपंथी दलों का विरोध झेलना पड़ रहा है
भारत और अमरीका के बीच परमाणु समझौते की आलोचना अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बुद्धिजीवी भी करने लगे हैं और इस मसले पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन हो रहा है.

भारत के साथ-साथ अमरीका, पाकिस्तान और जर्मनी से यहाँ पहुँचे बुद्धिजीवियों ने अलग अलग कारणों से इसकी आलोचना की है.

जहाँ प्रोफेसर अचिन विनायक कहते हैं कि परमाणु ऊर्जा आर्थिक रुप से भी लाभप्रद नहीं हैं वहीं पाकिस्तान के करामात अली इस परमाणु समझौते को पूरे दक्षिण एशिया में हथियारों की होड़ से जोड़ कर देखते हैं.

अमरीका में निशस्त्रीकरण के क्षेत्र में काम करने वाले एंड्रयू लिचरमैन कहते हैं कि यह समझौता दोनों ही देशों में सिर्फ असैन्य परमाणु ऊर्जा से नहीं जुड़ा है बल्कि इसका संबंध हथियारों के उत्पादन से भी जुड़ा हुआ है.

जर्मनी से आए ओलिवर मायर का कहना है कि यह परमाणु समझौता परमाणु अप्रसार संधि का विरोध तो करता ही है, सुरक्षा के उपायों के बारे में भी कोई बात नहीं करता.

जर्मनी परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) का सदस्य है और परमाणु समझौते के तहत यूरोनियम प्राप्त करने के लिए एनएसजी की मंजूरी आवश्यक है.

मायर कहते हैं कि अगर हर देश के साथ अलग-अलग स्तर पर ऐसे समझौते होने लगे तो एनपीटी का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा.

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जितने देश उतने तरह के विचारों का उठना स्वाभाविक है, इसमें कोई शक नहीं लेकिन अपने वामपंथी रूझान रखने वाले विनायक स्पष्ट कहते हैं कि अगर ये सस्ता होता तो कोई बात होती.

वैसे फ्रांस और जापान इस दिशा में सबसे आगे है जहाँ भारी मात्रा में परमाणु ऊर्जा का इस्तेमाल किया जाता है. फ्रांस में सत्तर प्रतिशत जबकि जापान में चालीस प्रतिशत ऊर्जा ज़रुरतें परमाणु ऊर्जा से पूरी होती हैं.

यह दलील देने पर विनायक कहते हैं कि इसके पीछे सरकार से मिलने वाली सब्सिडी को नहीं भूलना चाहिए.

इसके अलावा वो ये भी कहते हैं कि अगर ये सस्ता होता तो यूरोप के बाकी देश भी क्यों इसी दिशा में नहीं जाते.

वो स्वीडन का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि जिस तरह स्वीडन में अक्षय ऊर्जा यानी सौर ऊर्जा, वायु ऊर्जा आदि का इस्तेमाल होता है, उसी तरह भारत को भी इन स्त्रोतों पर ध्यान देना चाहिए.

अब सरकार इन बुद्धिजीवियों की बात कितना सुनेगी ये तो पता नहीं लेकिन इतना ज़रुर है कि इस तरह के सवाल और सुझाव लोगों को न केवल परमाणु ऊर्जा के बारे में जागरुक करेंगे बल्कि अपनी राय बनाने में मदद भी करेगे.

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