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रविवार, 29 जुलाई, 2007 को 10:03 GMT तक के समाचार
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'औरतों के सब्ज़ी बेचने पर प्रतिबंध'

टोंक में सब्जी बेचती महिला
कुछ महिलाओं ने प्रतिबंध मानने से इंकार कर दिया है
राजस्थान में जाति पंचायत का एक और फ़ैसला आया है. टोंक में माली समाज ने अपनी बिरादरी की महिलाओं के फल-सब्ज़ी बेचने पर प्रतिबंध लगा दिया है.

माली समाज का कहना है कि इससे बिरादरी की छवि ख़राब हो रही है. लेकिन महिलाओं ने जाति-पंचायत के इस फ़ैसले को मानने से इंकार कर दिया है.

समाज के पंच प्रमुखों के मुताबिक यह कदम तब उठाया गया जब बिरादरी की कुछ औरतों ने जाति के बाहर शादी कर ली.

माली समाज के लादू सरपंच कहते हैं, "हमारी जाति की कुछ युवतियों ने बिरादरी के बाहर जाकर शादी कर ली. लिहाज़ा समाज में सुधार के लिए पंचों ने यह फ़ैसला किया है."

लेकिन इस निर्णय से माली समाज की कामकाजी औरतों के सामने संकट खड़ा हो गया है.

जीवन यापन

 हमारी जाति की कुछ युवतियों ने बिरादरी के बाहर जाकर शादी कर ली. लिहाज़ा समाज में सुधार के लिए पंचों ने यह फ़ैसला किया है
लादू सरपंच

ननागी देवी 40 साल से फल-सब्जी बेचकर जीवन यापन कर रही हैं.

वह कहती हैं, "परिवार में हम पति-पत्नी ही हैं. पति बीमार रहते हैं. अगर सब्जीमंडी में पुश्तैनी काम न करें तो हमें कौन रोटी देगा."

नानगी ने पंच प्रमुखों की बात नहीं सुनी तो उसकी दुकान पर रखी सब्ज़ियों को नुकसान पहुँचाया गया.

जाति-पंचायत और इन महिलाओं में विवाद इतना बढ़ा कि पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा.

टोंक ज़िला प्रशासन ने इन महिलाओं को सुरक्षा का भरोसा दिलाया है.

माली समाज के कैलाश चंद कहते हैं, "टोंक में 200 से अधिक महिलाएँ सब्ज़ी बेचती हैं. इनमें से मुट्ठी भर औरतें ही इस फ़ैसले का विरोध कर रही हैं."

कैलाश कहते हैं, "जाति-पंचायत इनमें से ज़रूरतमंद औरतों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था करेगी."

आवाज़

 पंचायत सामाजिक बुराइयों के ख़िलाफ़ फ़ैसला क्यों नहीं सुनाती. बाल-विवाह और दहेज जैसे मुद्दों पर कार्रवाई करने की बजाए हम मेहनतकश महिलाओं को निशाना बनाया जा रहा है
मधु, सब्जी बेचने वाली एक महिला

टोंक की रहने वाली मधु पंचों के इस फ़ैसले के विरुद्ध आवाज़ उठा रही है.

मधु पूछती हैं, "पंचायत सामाजिक बुराइयों के ख़िलाफ़ फ़ैसला क्यों नहीं सुनाती. बाल-विवाह और दहेज जैसे मुद्दों पर कार्रवाई करने की बजाए हम मेहनतकश महिलाओं को निशाना बनाया जा रहा है."

पंचायत ने फ़ैसला न मानने पर आर्थिक दंड की भी व्यवस्था की है.

पंचों के फ़ैसले से डरे बैठे कुछ परिवार के लोगों ने स्कूल जाने वाले अपने बच्चों को सब्ज़ी मंडी में बैठा दिया.

दस साल का किशन पैरों से लाचार है. औरतों पर पाबंदी लगी तो उसे दुकान पर बैठा दिया गया.

नवाबी पृष्ठभूमि से निकलकर आधुनिक राजस्थान का हिस्सा बने टोंक की सब्ज़ी मंडी में ख़रीद-बेच का माहौल तो वैसा ही है.

लेकिन अब उसमें औरतों का स्वर मंद पड़ गया है.

पंचों को परमेश्वर माना जाता है. लेकिन कल अगर कोई जाति-पंचायत का इतिहास लिखेगा तो यह ज़रूर पूछेगा कि उनका हर फ़ैसला औरतों के ख़िलाफ़ क्यों आता है.

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