|
शौचालय नहीं बनवाया तो कुर्सी छोड़ो | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मध्यप्रदेश के हज़ारों पंचायत पदाधिकारियों की कुर्सी अब ख़तरे में नज़र आ रही है. इन लोगों का क़सूर ये है कि इन्होंने अपने घर पर आधुनिक शौचालय का निमार्ण नहीं करवाया है. इनके घर में या तो कच्चे शौचालय हैं या फिर निस्तार के लिये ये लोग अपने गांव के बाहर जाते हैं. मध्यप्रदेश पंचायत राज एवं ग्राम स्वराज अधिनियम 1993 के तहत पंचायत पदाधिकारियों के लिये यह ज़रुरी कर दिया गया है कि उनके घर में आधुनिक शौचालयों हों. इस क़ानून के तहत यदि चुने जाने के एक साल के अंदर वो अपने पर आधुनिक शौचालय का निमार्ण नहीं करते तो उन्हें पद से हटाया जा सकता है. मैला ढोने की प्रथा को ख़त्म करने और गाँवों में साफ़सफ़ाई को बढ़ावा देने के लिए ये क़ानून बनाया गया था. वैसे केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय भी इस पक्ष में है कि गाँवों में शौचालयों के निर्माण को चुनाव लड़ने की पात्रता से जोड़ देना चाहिए. पहली शिकार सरकार के इस क़ानून की पहली शिकार बनीं प्रदेश के नरसिंहपुर जिले के गोटेगांव ब्लाक के गाँव चंदाखेड़ा की सरपंच मंगोबाई. मंगोबाई को अपने घर पर आधुनिक शौचालय नहीं बनाने के कारण अपनी कुर्सी गँवानी पड़ी है.
उन्हें अविश्वास प्रस्ताव के ज़रिए हटाया गया है. इसे अमलीजामा पहनाने वाले तहसीलदार शाश्वत शर्मा का कहना है क़ानून ने सिर्फ़ अपना काम किया है. हालांकि मध्यप्रदेश पंचायती राज संचालक विजय सिंह निरंजन का कहना है कि मंगोबाई को इस कार्रवाई के ख़िलाफ़ अपील करने का पूरा हक़ है. उनका कहना है कि करीब 25 हजार जनप्रतिनिधियों पर आधुनिक शौचालय नहीं बनाने की गाज गिर सकती है. निरंजन का कहना है कि सभी ज़िलों में जनप्रतिनिधियों को समय-समय पर इस तरह के नोटिस जारी किए जाते रहे हैं. इस साल फ़रवरी माह में लगभग दो लाख 48 हज़ार सरपंच, पंच और ज़िला और ब्लाक सदस्यों को नोटिस जारी किया गया था. नोटिस के अनुसार अब उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई का समय आ गया है. 'उदाहरण बनें' पंचायत मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर का कहना है कि ये प्रतिनिधि दूसरों के लिये उदाहरण पेश करें और सफ़ाई के प्रति जागरूकता लाएँ. तथ्य ये है कि मध्र्यप्रदेश में कुल तीन लाख 24 हज़ार 167 पंचायत प्रतिनिधियों में से सिर्फ़ 76 हज़ार 123 प्रतिनिधियों ने ही आधुनिक शौचालयों का निमार्ण कराया है. जब ये क़ानून बना था तो जनप्रतिनिधियों ने सवाल उठाए थे कि इसका खर्च वे नहीं उठा सकते. लेकिन नरेन्द्र सिंह तोमर कहते हैं कि इन शौचालयों के निमार्ण के लिये पैसा जुटाने में जनप्रतिनिधियों को किसी तरह की दिक्क़त नहीं है, एक्ट के मुताबिक़ इसके लिये अनुदान दिया जाता है. इन लोंगो को कई नोटिस जारी किये गये और साथ ही इन्हें समय पर चेतावनी भी दी गई थी. अच्छा या बुरा कुछ जनप्रतिनिधि इस कानून को अच्छा मानते हैं.
विदिशा जिले के समधा गांव के पंच नरेश सिंह मानते है कि क़ानून बहुत अच्छा है. उनका कहना है, "जो लोग अपने घर पर ही सफाई नहीं रख सकते तो पूरे गांव की सफ़ाई की उम्मीद उनसे कैसे की जा सकती है." उनका कहना है कि ऐसे व्यक्ति को पद पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं होना चाहिए. एक छोटे किसान और पलासिया ग्राम पंचायत के पंच सूरत सिंह की कुर्सी भी ख़तरे में है. वे कहते हैं कि शौचालय न बनवाने पर पद छोड़ने की शर्त कुछ ज़्यादा ही बड़ी सज़ा है. राजधानी भोपाल के क़रीब के गांव दीपड़ी के 74 वषीर्य सुरेश राय का कहना है कि इतनी छोटी सी वजह के लिये चुने हुए प्रतिनिधियों को पद से हटाना ग़लत है. उनका मानना है कि इसके लिये दूसरी सज़ा दी जा सकती है. पता नहीं कि जब निर्वाचित पद खोने के डर से भी जो लोग शौचालय नहीं बनवा रहे हैं उन्हें और कौन सी सज़ा डरा सकती है. | इससे जुड़ी ख़बरें 'अच्छा टॉयलेट, ख़ुशियाँ लाए'03 जून, 2003 | पहला पन्ना चुनाव लड़ना हो तो शौचालय बनवाइए04 अगस्त, 2005 | भारत और पड़ोस अगर सड़क पर किया तो जुर्माना08 मई, 2005 | भारत और पड़ोस शौचालयों का अनोखा संग्रहालय12 जून, 2004 | भारत और पड़ोस साफ़ शौचालय, सुखी शरीर17 नवंबर, 2003 | पहला पन्ना | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||