|
चढ़ता पानी, बहते साँप और बढ़ती कमाई | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बाढ़ हर साल आम लोगों के लिए तबाही लेकर आती है लेकिन पश्चिम बंगाल में एक तबका ऐसा भी है जिसके लिए के राज्य के मेदिनीपुर इलाक़े में आई बाढ़ वरदान बन गई है. यह तबका है सँपेरों का. पूर्वी और पश्चिमी मेदिनीपुर ज़िलों में बाढ़ में सिर्फ पानी ही नहीं आया बल्कि सांपों की भी बाढ़ आई हुई है. इलाके में जितनी मौतें बाढ़ के पानी से हुई हैं उससे कहीं ज्यादा साँपों के डँसने से हुई है. अब लोग मुँहमाँगी क़ीमत पर इन सँपेरों को बुला रहे हैं ताकि वे लोग साँपों को पकड़ सकें. मेदिनीपुर में आई बाढ़ के साथ हज़ारों की तादाद में ज़हरीले साँप भी गाँवों में पहुँच गए हैं. वजह यह है कि बाढ़ से उनके बिलों में भी पानी भर गया है और वे तैरकर एक जगह से दूसरी जगह जा रहे हैं. इलाक़े में बाढ़ के साथ साँपों का भी भारी आतंक है. ऐसे में यह सँपेरे लोगों को सरकारी राहत से भी ज्यादा राहत दिला रहे हैं. घाटाल के रवींद्र गिरी कहते हैं कि "मेरे गाँव में साँप काटने से अब तक दस लोग मारे जा चुके हैं. पानी में बहते हुए कई नाग साँप गाँव में आ चुके हैं. हमने दोगुनी कीमत देकर बगल के गाँव से सँपेरों को बुलाया है. उन्होंने तीन दिनों के भीतर दो दर्जन से ज्यादा जहरीले साँप पकड़े हैं." मोटी कमाई मालदा से मेदिनीपुर आए एक सँपेरे दिलीप सरकार का कहना है कि "हर साल बाढ़ उनके लिए एक वरदान बन कर आती है. साँप को पकड़ने के लिए गाँव वाले तो पैसा देते ही हैं, उनका ज़हर निकालने से भी हमें कुछ अतिरिक्त कमाई हो जाती है." सँपेरे बाढ़ के मौक़े पर साँप पकड़ने की अपनी फ़ीस बढ़ा देते हैं. इसके बावजूद सँपेरों को बुलाना लोगों की मजबूरी है. इसकी वजह यह है कि एक बार अगर सांप किसी घर में घुस गया तो सँपेरे के अलावा कोई भी उसे बाहर नहीं निकाल सकता.
सँपेरा रमेन मंडल कहते हैं कि "बाढ़ का मौसम ही हमारे लिए कमाई का पैगाम लेकर आता है. रोज़ाना आठ से दस साँप पकड़ लेता हूँ, हर साँप को पकड़ने के लिए सौ रुपए लेता हूँ. कई बार गाँव वाले दो सौ रूपए देने को तैयार हो जाते हैं." पिंगला गांव से स्वप्न नायक बताते हैं कि "उनके घर में घुटने तक पानी होने के कारण उन्होंने सपरिवार छत पर शरण ली है. वहाँ से शाम को मैंने अपने आंगन में एक कोबरा साँप को चौकी पर बैठे देखा." स्वप्न ने अपने पड़ोसी को इसकी सूचना दी और पड़ोसी ने अपने परिचित एक सँपेरे को. दूसरे दिन दोपहर को सँपेरे ने आकर उस कोबरा साँप को पकड़ा, तब जाकर स्वपन छत से नीचे उतरने की हिम्मत जुटा पाया. विधानसभा में कांग्रेस पार्टी विधायक दल के नेता मानस भुंइया बताते हैं कि "इलाक़े में साँपों का भारी आतंक है. मैंने कम से कम 20 ऐसे लोगों को अस्पताल में दाखिल कराया है जिन्हें साँपों ने डँसा था." राज्य के वित्त मंत्री असीम दासगुप्ता, जिन्होंने मुख्यमंत्री के साथ उन जिलों का दौरा किया है, कहते हैं कि "साँपों का आंतक तो है. लेकिन सरकार ने अस्पातलों में तमाम इंतजाम किए हैं ताकि सर्पदंश का समुचित इलाज हो सके." जब तक बाढ़ का पानी नहीं उतरता तब तक तो इन सँपेरों की चाँदी ही है. |
इससे जुड़ी ख़बरें साँप-बिच्छुओं का ज़हर बेअसर27 मार्च, 2005 | भारत और पड़ोस सँपेरों को विधानसभा में घुसने से रोका10 दिसंबर, 2004 | भारत और पड़ोस रोज़ी-रोटी के लाले पड़ रहे हैं सँपेरों को09 फ़रवरी, 2004 | भारत और पड़ोस इंडोनेशिया में दुनिया का सबसे लंबा साँप30 दिसंबर, 2003 | पहला पन्ना | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||