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साँप-बिच्छुओं का ज़हर बेअसर | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
झारखंड के दुमका निवासी दिलीप कुमार चौरसिया को साँप-बिच्छुओं का ज़हर नहीं लगता. उन पर नींद की गोलियों का भी असर नहीं पड़ता. दरअसल दिलीप 20 वर्षों से अनिद्रा रोग के शिकार हैं. उन्होंने बताया, "मैं 1985 के बाद से किसी भी दिन तीन घंटे से ज़्यादा नहीं सो पाया हूँ. पटना, राँची से लेकर कोलकाता और दिल्ली तक में इलाज कराया, लेकिन कोई फ़ायदा नहीं." दुमका टीन बाज़ार में छोटी-सी दुकान चलाने वाले चौरसिया कहते हैं, "इलाज में हज़ारों रुपये ख़र्च करने के बाद भी मुझे सामान्य व्यक्तियों जैसी नींद नहीं आई. मैंने एक साथ कई नींद की गोलियाँ लेकर भी देखी, लेकिन कोई फ़ायदा नहीं." साँप-बिच्छुओं से कटवाने की शुरुआत के बारे में उन्होंने कहा, "अनिद्रा रोग के कारण बीच में कुछ दिनों तक मेरी दिमागी हालत भी सामान्य नहीं रह गई थी. उन्हीं दिनों में मैं एक व्यक्ति की सलाह पर अमल कर बैठा कि 'साँप-बिच्छू का ज़हर बड़े-बड़ों को सुला देता है.' लेकिन मुझे बड़ी निराशा हुई जब साँप-बिच्छुओं का ज़हर मुझ पर बेअसर रहा." परिजनों की नाराज़गी दिलीप के पिताजी कार्तिक प्रसाद चौरसिया को भी पूरी नींद नहीं आती, लेकिन उन्होंने कभी नींद की गोली तक नहीं ली है.
उन्होंने कहा, "दिलीप ने किसी के बरगलाने के बाद पहली बार साँप-बिच्छुओं से ख़ुद को कटवाया. उसके बाद लोगों का ध्यान खींचने के लिए ऐसा करने में उसे भी मज़ा आने लगा." कार्तिक कहते हैं, "नींद तो मुझे भी पूरी नहीं आती, लेकिन मैंने साँप-बिच्छुओं से कटवाना तो दूर कभी नींद की गोली तक नहीं ली." परिजनों की नाराज़गी को देखते हुए दिलीप कुमार चौरसिया अब साँप-बिच्छुओं से कटवाने की अपनी क्षमता का सार्वजनिक प्रदर्शन करने से बचते हैं. उन्होंने कहा, "घर वाले नाराज़गी दिखाते हैं. लेकिन फिर भी दोस्तों के कहने पर साँप-बिच्छुओं से कटवाना पड़ता है." अपनी पसंद के बारे में उन्होंने कहा, "बिच्छू ठीक होते हैं. डंक मारा और उठाया. लेकिन साँप माँस नोच लेते हैं, घाव बना देते हैं." |
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