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वादी में लहलहाती नशे की फ़सल | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
दक्षिणी कश्मीर के एक गाँव मलंगपुरा में धान के एक खेत में दूर-दूर तक सफेद और लाल रंग के फूल खिले हैं. ऐसा लगता है कि किसी ने लाल रंग के फूलों का का बाग लगाया हो. असल में यह पोस्त की फ़सल है जिससे अफ़ीम बनती है. कश्मीर घाटी में हज़ारों एकड़ जमीन पर पोस्ते की खेती की जा रही है. सरकार ने इसके ख़िलाफ़ ज़ोरदार अभियान शुरू किया हुआ है. पोस्त की फ़सल से जो नशीले पदार्थ बनाए जाते हैं उनमें अफ़ीम और हेरोइन भी शामिल हैं. लेकिन अधिकारियों का कहना है कि कश्मीर में पोस्त से अधिकतर फ़ीकी या भुक्ती नाम का पदार्थ तैयार किया जाता है. इस तैयार पदार्थ को पंजाब में लस्सी के साथ मिलाकर पिया जाता है. दक्षिणी कश्मीर के उप पुलिस महानिरीक्षक एचके लोहिया का कहना है कि फ़ीकी की सारी पैदावार की राज्य से तस्करी की जाती है. लोहिया का कहना है कि इस धंधे में जो लोग भी शामिल हैं उनका बाहर के राज्यों से संबंध है. उन्होंने बताया कि इस धंधे से जुड़े जितने भी लोगों को हमने अब तक गिरफ़्तार किया है वो सब दिल्ली, पंजाब, गुजरात और महाराष्ट्र से हैं. लेकिन लोहिया ने स्पष्ट किया, "ये हमारी ख़ुशक़िस्मती है कि पोस्ते से अभी हेरोइन तैयार नहीं बनाई जाती." मजबूरी कश्मीर में मुसलमानों का बहुसंख्यक हैं और इस्लाम में नशे की मनाही है.
इसकी वजह बताते हुए पुलवामा ज़िले के सफ़ानगरी गाँव के रहने वाले नबी ग़नी कहते हैं," पोस्त की खेती करने पर हमें तक़रीबन 20 हज़ार रुपए की आमदनी होती है. सेब बीमारियों से ख़त्म हो जाता है. इसके अलावा हमारे पास आमदनी का कोई ज़रिया भी नहीं है." वे बताते हैं कि गाँव के कुछ ही लोगों को सरकारी नौकरी मिल पाती है. बाकी लोग आमदनी के लिए पोस्ते की खेती करने के लिए मजबूर हैं. कई लोगों का ये भी कहना है कि नशीले पदार्थों के बारे में सरकार की नीतियों में विरोधाभास है. सफ़ानगरी के एबी माज़िद कहते हैं कि इस्लाम में शराब पीना भी पाप है लेकिन शराब बेचने के लिए सरकार लाइसेंस देती है. वो बताते हैं, "किसान लोग पोस्त की फ़सल को शराब से अधिक बुरा नहीं समझते हैं इसीलिए लोग पोस्त की खेती करते हैं." माज़िद का कहना है कि जिन लोगों ने भी पोस्ता की खेती करना छोड़ दिया है उनमें से 70 फ़ीसदी ने क़ानून के डर से और 30 फ़ीसदी ने भगवान के डर से ऐसा किया है. सरकारी प्रयास अधिकारियों का कहना है कि पोस्ते की खेती के विरुद्ध सरकारी अभियान के अच्छे परिणाम सामने आए हैं.
बिजबिहाड़ा तहसील के दो गांवों की मिसाल देते हुए आबकारी विभाग के सहायक आयुक्त मोहम्मद कासिम कहते हैं, "पिछले साल हमने वहाँ पोस्ते के बड़े-बड़े खेत तबाह किए थे. इस साल मेरा इरादा था कि वहीं से पोस्ता की तबाही शुरू करूं लेकिन वहां पहुंच कर बहुत ख़ुशी हुई क्योंकि इस साल मुझे वहां एक भी पौधा नहीं मिला." उपमहानिरीक्षक लोहिया ने बताया कि पुलिस ने अब तक पोस्ते की खेती करने पर 200 लोगों के ख़िलाफ़ मामला दर्ज़ किया है. उनका कहना है कि इनमें से कई लोग फ़रार हैं और पुलिस उनकी जमीन कुर्क करने पर विचार कर रही है. लेकिन महिलाओं के संगठन दुख़्तरान-ए-मिल्लत की अध्यक्ष आसिया अंदराबी का कहना है कि पोस्ता की खेती करने वालों को पुलिस का समर्थन मिला हुआ है. आसिया कहती हैं कि जो लोग पुलिस के पास शिकायत लेकर जाते हैं पुलिस उल्टा उन्हीं को तंग करती है. | इससे जुड़ी ख़बरें 'तालेबान की नशा विरोधी नीति कामयाब'19 जनवरी, 2004 | भारत और पड़ोस राजस्थान में अफ़ीम की खेती पर विवाद23 अक्तूबर, 2006 | भारत और पड़ोस नैटो ने विवादित विज्ञापन वापस लिया25 अप्रैल, 2007 | भारत और पड़ोस करज़ई ने अंतरराष्ट्रीय मदद की अपील की09 फ़रवरी, 2004 | भारत और पड़ोस अफ़ग़ानिस्तान के लिए सहायता बढ़ी01 अप्रैल, 2004 | भारत और पड़ोस अफ़ीम की खेती नष्ट करने पर हिंसा22 अप्रैल, 2004 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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