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आवारा घोड़ों पर क़ानून का कोड़ा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पिछले कुछ सालों से छत्तीसगढ़ के बिलासपुर शहर की सड़कों पर आवारा घूमते घोड़ों पर अदालत के आदेश की भारी गाज़ गिरी है. छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के आदेशानुसार नगर निगम न सिर्फ़ इन्हें पकड़कर बंद कर रहा है बल्कि उसने ऐसे आवारा घोड़ों को पकड़कर लाने वालों के लिए ईनाम की घोषणा भी की है. मगर कोर्ट के सख्त आदेश और नगर निगम के पिछले 15 दिनों के विशेष 'घोड़ा पकड़ अभियान' के बावज़ूद अब तक सिर्फ़ पांच घोड़े ही कैद किए जा सके हैं. बिलासपुर नगर निगम आयुक्त एमए हनीफ़ी का कहना है कि हालांकि वह एक जनहित याचिका पर दिए गए उच्च न्यायालय के इस आदेश के पालन की पूरी कोशिश कर रहे हैं लेकिन इन चौपायों को काबू करना इतना आसान नहीं है. उन्होंने कहा,"घोड़ों को पकड़ने के लिए निगम कर्मियों को इनके पीछे न सिर्फ़ लंबा भागना पड़ता है बल्कि कई दफ़ा इन जानवरों ने निगम कर्मियों को अपने दाँतों का शिकार भी बनाया है." स्थानीय नागरिक हबीब ख़ान के अनुसार बिलासपुर शहर में पिछले कुछ सालों में तेज़ी से बढ़े साइकिल और ऑटो रिक्शॉ की वजह से ताँगों का चलन ख़त्म हो गया है और बहुत से ताँगे वालों ने इन जानवरों को सड़कों पर खुला छोड़ दिया है. सड़कों और गलियों में आवारा फिरते ये घोड़े यातायात में तो बाधा पैदा कर ही रहे हैं साथ ही इन्होंने कई लोगों को काट भी लिया है. जिसमें स्थानीय अदालत के एक जज भी शामिल हैं. निगम का कहना है कि शहर में फ़िलहाल 80 से 85 घोड़े हैं जिनमें से एक बड़ी तादात का ठिकाना खुले आसमान के नीचे ही है. समस्या छत्तीसगढ़ इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज़ की डॉ यास्मीन ख़ान का कहना है कि अगर घोड़े किसी वजह से रैबीज़ से ग्रस्त हो गए हों तो उनका काटना ख़तरनाक हो सकता है और ऐसे में एंटी-रैबीज़ इंजेक्शन लेने की ज़रूरत होती है.
अदालत के सामने घोड़े का मामला तब उठा जब कुछ नागरिकों ने ट्रैफ़िक और शहर की दूसरी समस्याओं को लेकर एक जनहित याचिका दायर की. निगम आयुक्त हनीफ़ी ने बताया कि जब यातायात को व्यवस्थित करने के लिए उन्होंने हाईकोर्ट के सामने सड़क पर आवारा घूमती गाय, भैंस और बकरियों को पकड़कर काँजी हाउस में लाने और उनके मालिकों पर ज़ुर्माना करने की बात की तो अदालत ने निगम को घोड़ों की समस्या से निबटने के भी आदेश दिए. उन्होंने कहा कि बिलासपुर नगर निगम इस काम को पूरी 'गंभीरता' से कर रहा है लेकिन काटे जाने के डर से उनका विभाग डरा हुआ है. एमए हनीफ़ी के अनुसार घोड़ों को पकड़ने के लिए विशेषज्ञों की ज़रूरत होती है जो उनके पास नहीं हैं. इसलिए निगम ने स्थानीय ताँगेवालों और घुड़सवारों की मदद भी लेनी शुरू की है. साथ ही यह भी घोषणा की है कि जो कोई भी इन आवारा घोड़ों को पकड़कर निगम के पास लाएगा उसे 300 रुपए प्रति घोड़ा दिया जाएगा. | इससे जुड़ी ख़बरें अश्वराज की हिनहिनाहट....12 मई, 2004 | भारत और पड़ोस तुग़लक़ को नहीं मारा जाएगा08 दिसंबर, 2003 | भारत और पड़ोस तोहफ़े का घोड़ा नियमों से लंगड़ा21 अप्रैल, 2005 | भारत और पड़ोस घोड़ी वाले वकील साहब15 सितंबर, 2006 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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