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रविवार, 01 अप्रैल, 2007 को 15:14 GMT तक के समाचार
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बुद्धदेब पर भारी पड़े बुद्धिजीवी

बुद्धिजीवियों का विरोध
बुद्धदेब को बुद्धिजीवियों का भारी विरोध झेलना पड़ रहा है
नंदीग्राम की घटना के बाद पश्चिम बंगाल की कम्युनिस्ट सरकार को अगर पिछले तीन दशकों में पहली बार झुकना पड़ा तो इसके पीछे विपक्षी दलों के अलावा सांस्कृतिक विरोध की भी मुख्य भूमिका रही.

नंदीग्राम में इंडोनेशियाई कंपनी सलीम समूह के विशेष आर्थिक क्षेत्र (एसईज़ेड) के लिए ज़मीन अधिग्रहण का विरोध कर रहे बेक़सूर गाँववालों पर पुलिस की गोलीबारी का सांस्कृतिक संगठनों ने जमकर विरोध किया है.

वामपंथी दल इस घटना का राजनीतिक विरोध तो झेल गए लेकिन ये चौतरफ़ा सांस्कृतिक विरोध का ही नतीजा था कि मुख्यमंत्री को घटना के 15 दिनों बाद इस मामले में अपनी गलती क़बूल करनी पड़ी.

चौतरफा विरोध के दबाव में राज्य सरकार को भू-अधिग्रहण की अधिसूचना वापस लेनी पड़ी और वहाँ प्रस्तावित एसईज़ेड परियोजना को रद्द करना पड़ा.

मुख्यमंत्री ने कुछ साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों से मिल कर अपनी स्थिति साफ़ करने का भी प्रयास किया. लेकिन उसके बावज़ूद उनके समर्थन में बोलने वालों की तादाद उंगलियों पर गिनी जा सकती है.

नंदीग्राम की गोलीबारी के लिए अब भी सांस्कृतिक हलकों में मुख्यमंत्री का भारी विरोध हो रहा है. इसमें वामपंथी बुद्धिजीवी सबसे आगे हैं.

उनकी दलील है कि सिर्फ ग़लती मान लेने से इस ग़लती की भरपाई नहीं हो सकती.

सड़कों पर विरोध

सरकार ने इस कांड में मारे गए या घायल हुए लोगों के परिजनों को अब तक एक पैसा भी मुआवज़ा नहीं दिया है. बुद्धदेब भट्टचार्य ने भले गलती मान ली हो पर उऩकी पार्टी माकपा इसे मानने को तैयार नहीं है.

माकपा के कार्यकर्ताओं और समर्थकों की घर वापसी सरकार और पार्टी की प्राथमिकता सूची में सबसे ऊपर है. इन लोगों ने नंदीग्राम की घटना के बाद इलाक़ा ख़ाली कर दिया था.

कई बुद्धिजीवियों ने अपने पुरस्कार वापस लौटा दिए हैं

बुद्धदेब भट्टाचार्य ने सालों पहले एक नाटक लिखा था- 'दुसमय' यानी बुरा समय. लेकिन नंदीग्राम गोलीबारी के बाद वे ख़ुद ही अपने लिखे उस नाटक के मुख्य पात्र बन गए हैं.

दिलचस्प बात यह है कि गृह, सूचना और संस्कृति मंत्रालय भी बुद्धदेब के ही ज़िम्मे हैं.

सांस्कृतिक ख़ेमे के विरोध को ध्यान में रखते हुए मुख्यमंत्री ने राज्य सरकार के सांस्कृतिक परिसर 'नंदन' में जाना छोड़ दिया है. पहले वे नियमित तौर पर नाटक और फ़िल्में देखने शाम को वहाँ जाते थे.

नंदीग्राम गोलीबारी का अगले ही दिन सांस्कृतिक स्तर पर भारी विरोध शुरू हो गया था.

साहित्यकारों, संस्कृतिकर्मियों, अभिनेताओं और नाट्यकर्मियों की बड़ी ज़मात उनके खिलाफ़ हो गई है.

इन लोगों ने नंदीग्राम की तुलना जालियाँवालाबाग से करते हुए बुद्धदेब को जनरल डायर से ख़तरनाक बताया और उनके इस्तीफ़े की माँग उठाई है.

राज्य के बुद्धिजीवी इस घटना के विरोध में सड़कों पर उतर आए हैं. वामपंथी कवियों और साहित्यकारों ने सरकार की विभिन्न अकादमियों से इस्तीफ़े दे दिए हैं और सरकारी पुरस्कार लौटा दिए हैं.

अब इसके विरोध में कई नाटकों के मंचन का फ़ैसला किया गया है. उनसे जुटी रक़म का इस्तेमाल नंदीग्राम के प्रभावित लोगों के पुनर्वास में किया जाएगा.

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