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बुधवार, 28 मार्च, 2007 को 14:36 GMT तक के समाचार
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कण-कण में कनक ढूँढते कामगार

सोने की तलाश का काम काफ़ी मेहनत का है
गलियों की खाक छानना उनके लिए सिर्फ मुहावरा नहीं है बल्कि यह उनकी रोज़ी-रोटी जरिया है. असम तथा उत्तरी बंगाल के छोटे शहरों में सड़कों के किनारे इन्हें आसानी से देखा जा सकता है.

ये लोग लगभग तीन हज़ार किलोमीटर का सफ़र तय करके यहाँ धूल में से सोना बटोरने आते हैं.

सुनारों की दुकानों के आसपास की धूल-मिट्टी, यहां तक कि नालियों की कीचड़ भी इन्हें बेतरह आकर्षित करती है.

ये ख़ाक छानने वाले उन गलियों पर ज़्यादा ध्यान देते हैं जहाँ सुनारों की दुकानें होती हैं. मिसाल के तौर पर धुबड़ी कस्बे की रवींद्र सरणी में सुनारों की 25 दुकाने हैं और इन दिनों इन खाक छानने वालों को देखा जा सकता है.

महाराष्ट्र के पिंडकर गांव से आए धूल और कीचड़ में सने बृजलाल नेताम का कहना है कि गांव में खेतीबाड़ी भी है लेकिन इस खानदानी पेशे से दो पैसे ज्यादा कमाई हो जाती है.

जनवरी के अंतिम सप्ताह में नेरावाला कहलाने वाले ये लोग 'परदेस' के लिए निकल पड़ते हैं, अमूमन तीन से पाँच महीने ये लोग बाहर रहते हैं.

कितनी कमाई कर लेते हैं, पूछने पर बृजलाल छह से आठ हज़ार रुपए प्रति माह बताकर फिर से धूल में अपना सिर गड़ा लेते हैं. इनकी ठीक-ठीक कमाई जान पाना आसान काम नहीं है.

कमाई

रवींद्र सरणी के स्वर्णकार अरुण कर्मकार बताते हैं कि इनकी असली कमाई काफी ज्यादा है क्योंकि कहने को तो ये लोग सोने के कण खोजते हैं लेकिन कभी-कभी सोने की बड़ी डली भी इनके हाथ लग जाती है. वे दलील देते हैं, "जबर्दस्त कमाई न हो तो कोई क्यों इतनी दूर कीचड़ में लथपथ होने आएगा."

 "जबर्दस्त कमाई न हो तो कोई क्यों इतनी दूर कीचड़ में लथपथ होने आएगा
अरुण कर्मकार, सुनार

बृजलाल अपनी पत्नी के साथ आए हैं. अक्सर पति-पत्नी साथ ही आते हैं और दोनों ही खूब मेहनत करते हैं. बच्चे बहुत छोटे न हों तो उन्हें भी साथ ले आते हैं.

बृजलाल के साथी रामसखा बताते हैं कि गाँव से करीब पाँच हज़ार लोग एक ही साथ निकलते हैं. इनके तीन मुखिया उत्तरी बंगाल के कूचबिहार, सिलीगुड़ी और जलापाईगुड़ी में ठहरे हुए हैं.

गलियों में काम करने वाले लोगों को मुखिया का आदेश मानना पड़ता है. मुखिया ही इनके हाथ लगने वाले 'माल' को खरीद कर उसकी कीमत अदा करता है. माल को गलाने और उसे बाजार में बेचने का सरदर्द मुखिया का होता है.

रामसखा का कहना है कि उनके पूर्वज भी यही धंधा करते आए हैं. हालांकि गरीबी की मार के कारण उनकी बिरादरी के काफी लोग तमिलनाडु के फलों के बागीचों में मजदूर के रूप में जाकर वहीं बस गए.

मिट्टी में से सोना बटोरने ये लोग भारत के हर हिस्से में जाते हैं बशर्ते वहाँ स्वर्णकारों की काफी दुकानें हों.

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