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गुरुवार, 08 मार्च, 2007 को 14:14 GMT तक के समाचार
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शोर-शराबे से छुटकारे का अनोखा तरीक़ा
पेड़ से लटकते अपने घर के साथ गौस
प्रकृति के ज़्यादा करीब रहकर कविता लिखना चाहते हैं गौस.
बांग्लादेश में भीड़भाड़ से हट कर सुकून पाने के लिए सलीम हुसैन ग़ौस ने नायाब रास्ता ढूंढा है. उन्होंने पेड़ पर ही आशियाना बना डाला.

ग़ौस प्रतिदिन ताड़ के पेड़ पर लकड़ी से बनाए गए प्लेटफॉर्म पर अपनी खुद की बनाई हुई घिरनी के सहारे चढ़ जाते हैं.

तीस मीटर यानि करीब 100 फुट ऊँचाई पर टँगा यह प्लेटफॉर्म उन्होंने शांति हासिल करने के लिए और आराम से अपनी पसंद की किताबें पढ़ने के लिए बनाई है.

उनका यह अनोखा तरीक़ा लोगों को इतना पसंद आ रहा है कि पूरे इलाक़े में इस प्लेटफॉर्म के बारे में जानने के लिए होड़ लग गई है.

पेशे से बढ़ई और 25 वर्षीय कवि ग़ौस रोज़ाना कम से कम चार से पाँच घंटे पेड़ पर पढ़ने, लिखने और चिड़ियों की चहचहाहट सुनने में बिताते हैं.

ग़ौस कहते हैं, “ शेक्सपीयर और नोबेल पुरस्कार विजेता प्रख़्यात बंगला कवि रबींद्रनाथ टैगोर के लेखन से प्रेरणा ग्रहण करने के लिए यह एक उत्तम स्थान है.”

“ यह एकांत अत्यंत सुखद होता है. यहाँ मुझे लोगों से कोई परेशानी नहीं होती और कोई भी मेरे लेखन कार्य में ख़लल नहीं डाल सकता. ”

जैसोर ज़िले के निवासी ग़ौस कहते हैं कि पेड़ पर बनाए अपने घर में उन्हें इतना आनंद मिलता है कि वह कई दफ़ा वहाँ खाना भी खा चुके हैं और सोए भी हैं.

सुखद एकांत
 यह एकांत अत्यंत सुखद होता है. यहाँ मुझे लोगों से कोई परेशानी नहीं होती और कोई भी मेरे लेखन कार्य में ख़लल नहीं डाल सकता.
सलीम हुसैने ग़ौस

रोज़ाना के जीवन से बाहर रहने का फैसला करने पर उन्हें अपने परिवार की ओर से विरोध भी झेलना पड़ा.

लेकिन रोज़-रोज़ की आपाधापी, ट्रैफिक जाम, बच्चों के शोर-शराबे और प्रदूषण से बचने का यह दिलचस्प तरीका अब कई लोगों को भा रहा है.

शुरुआत में लोग ग़ौस को पागल समझते थे लेकिन अब यह तरीक़ा इतना लोकप्रिय हो गया है कि लोग गौस को अपने लिए भी ऐसा ही घर बना देने के लिए कहते हैं.

बांग्लादेश की आबादी 14 करोड़ चालीस लाख है और यहाँ की आबादी का घनत्त्व 834 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है.

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