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शुक्रवार, 13 अक्तूबर, 2006 को 10:15 GMT तक के समाचार
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बांग्लादेश के बैंक को नोबेल शांति पुरस्कार
युनुस
ग्रामीण बैंक ग्रामीण स्तर पर ज़रुरतमंद लोगों को सामूहिक कर्ज देता है
बांग्लादेश के ग्रामीण बैंक और इसके संस्थापक प्रोफ़ेसर मोहम्मद यूनुस को वर्ष 2006 का नोबेल शांति पुरस्कार देने की घोषणा की गई है.

यह बैंक ग़रीब लोगों को स्वरोजगार के लिए सामूहिक रूप से कर्ज़ देता है.

लघु वित्त संगठन की तरह काम कर रहे इस बैंक की योजना बुनियादी स्तर पर बेहद सफल रही है.

आम तौर पर ऐसे लोग इस बैंक के ग्राहक हैं जो बड़े बैंकों से कर्ज़ प्राप्त करने में अपने को असहाय पाते हैं.

 इससे ग़रीबों को उनके अधिकार दिलाने के हमारे अभियान को मान्यता मिली है. हमें उम्मीद है कि हमारा बनाया हुआ मॉडल पूरी दुनिया में फैलेगा
मोहम्मद यूनुस

प्रोफ़ेसर मोहम्मद यूनुस ने पुरस्कार मिलने पर कहा, "मैं बेहद खुश हूँ. यह हमारे लिए और बांग्लादेश के लिए बहुत बड़ा सम्मान है. इससे हमारे काम को पहचान मिली है. बांग्लादेशी होने के नाते मुझे गर्व है कि हमने दुनिया को कुछ दिया है."

वो कहते हैं, "इससे ग़रीबों को उनके अधिकार दिलाने के हमारे अभियान को मान्यता मिली है. हमें उम्मीद है कि हमारा बनाया हुआ मॉडल पूरी दुनिया में फैलेगा."

उन्हें और ग्रामीण बैंक को बतौर पुरस्कार 14 लाख डॉलर की राशि मिलेगी.

प्रशंसा

नॉर्वे की नोबेल पुरस्कार समिति के मुताबिक प्रोफ़ेसर मोहम्मद यूनुस अपनी सोच को धरातल पर उतारने में सफल रहे जिससे बांग्लादेश के लाखों लोगों को फायदा पहुँचा है.

ओस्लो में नोबेल समिति के अध्यक्ष ऊला डानबोल्ट म्योएस ने कहा कि मोहम्मद यूनुस और ग्रामीण बैंक को "सामाजिक और लोकतांत्रिक विकास में योगदान" के लिए सम्मानित किया गया है.

भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने नोबेल पुरस्कार मिलने पर मोहम्मद यूनुस को बधाई दी है.

उन्होंने हेलसिंकी में पत्रकारों से कहा, "प्रोफ़ेसर यूनुस हमारे मित्रों में से एक हैं और उन्होंने छोटे स्तर पर कर्ज देने का जो अभियान शुरु किया है उससे ग़रीबी से कैसे निपटा जाए इसकी सीख मिलती है."

कार्य प्रणाली

वर्ष 1974 में बांग्लादेश में आए भयानक अकाल से सबक लेते हुए अर्थशास्त्री मोहम्मद यूनुस ने एक ऐसे बैंक का ख़ाका तैयार किया जिसकी पहुँच हर ज़रूरतमंद के दरवाज़े तक हो.

वर्ष 1976 में प्रोफ़ेसर यूनुस ने चटगाँव विश्वविद्यालय के सहयोग से प्रयोग के तौर पर कुछ गाँवों में इस योजना को लागू किया.

धीरे-धीरे लोगों में जागरुकता बढ़ी और इस बैंक की मदद से स्वयं सहायता समूहों ने स्वरोजगार का रास्ता अपनाना शुरू किया.

बैंक की सफलता को देखते हुए बांग्लादेश सरकार से वर्ष 1983 में इसे क़ानूनी तौर पर बैंक के रूप में मान्यता मिल गई.

महिलाएँ

बांग्लादेश के ग्रामीण इलाक़ों में महिलाओं ने बढ़-चढ़ कर ग्रामीण बैंक की सुविधाओं का फायदा उठाया है.

मई 2006 तक के आँकड़ों के मुताबिक बैंक से लगभग 63 लाख लोगों ने क़र्ज़ लिया है जिनमें 96 फ़ीसदी महिलाएँ हैं.

पूरे बांग्लादेश में ग्रामीण बैंक की दो हज़ार 185 शाखाएँ हैं और 69 हज़ार 140 गाँवों तक इसकी पहुँच है.

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