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साहित्य का नोबेल पामुक को | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
वर्ष 2006 के लिए साहित्य का नोबेल पुरस्कार तुर्की के उरहान पामुक को देने की घोषणा की गई है. 54 वर्षीय पामुक अपने उपन्यासों में विवादित विषयों की चर्चा करने के लिए जाने जाते हैं और इसकी वजह से उनके गृह-नगर में उन पर मुक़दमा भी चल चुका है. वे साहित्य का नोबेल पुरस्कार पाने वाले सबसे कम उम्र के लेखकों में से एक हैं. वैसे उन्होंने आर्किटेक्चर की डिग्री ली हुई है. उनकी छह किताबें अंग्रेज़ी में प्रकाशित हो चुकी हैं और उनकी किताबों का दुनिया भर की 40 भाषाओं में अनुवाद हो चुका है. उनकी किताबों 'माई नेम इज़ रेड', 'स्नो' और 'द व्हाइट कासल' में पूर्वी और पश्चिमी सभ्यता के विरोधाभासों का ख़ूब ज़िक्र किया गया है. चुभने वाली बातें उनकी ताज़ा किताब ‘इस्तांबुल मैमोरीज़ ऑफ सिरीज़’ में उरहान पामुक तुर्की को पूरी तरह से प्रतिबिंबित करते हैं. थोड़ी पूर्व और थोड़ी पश्चिम की बातें और दोनो माहौल के बिना तकल़ीफ हिस्सा बनने वाले, पामुक दोनो सभ्यताओं से थोड़ा अलग हैं. इस्तांबुल में वो लिखते हैं, “इस्तांबुल की किस्मत मेरी किस्मत है. मुझे इस शहर से जु़ड़ाव है क्योंकि इस शहर ने मुझे बनाया है.” पर तुर्की में उनकी लेखनी जहां खूब बिकती है, वहीं उनकी बातें कुछ तबकों को चुभती भी हैं. तुर्की जो आधुनिक यूरोप का हिस्सा बनना चाहता है, वही तुर्की अपने इतिहास और अपने आज के सच को बेबाकी से पेश करने वालों को सहन नहीं कर पाता है. इसी तुर्की ने 1915 से 1917 के बीच यहां हज़ारों की तादाद में मारे गए आर्मेनियाई लोगों पर पामुक के बयान पर उन पर मुकदमा ठोक दिया था. उस वक्त पामुक ने कहा था, “शायद मुझे तो छोड़ दिया जाए, पर बात हमारे देश की मानसिकता की है. हमारे कई साथी पत्रकार और लेखक जेलों में समय बिता चुके हैं. हमारा देश यूरोपीय संघ का दरवाज़ा खटखटा रहा है, पर बोलने की आज़ादी वो देना नहीं चाहता.” यही बेबाकी पामुक की लेखनी में भी झलकती है. वह अपनी 54 साल की उम्र से काफ़ी कम नज़र आते हैं, लेकिन अपनी पुस्तकों में वह गूढ़ राजनीति की बात करते हैं. ‘द व्हाइट कासल्स’ 17वीं सदी के ऑटोमन मुस्लिम शासकों और उनके ईसाई दासों की बात करता है. पामुक जहां पूर्व और पश्चिमी सभ्यताओं के बारे में लिखते हैं, वहीं इसके द्वंद्व को भी दिखाते हैं. चौदह लाख डॉलर की राशि और उनकी किताबों की धड़ाधड़ बिक्री भले ही पामुक को खुश करे न करे, लेकिन नोबेल पुरस्कार का तमगा उन्हें ज़रूर गर्व महसूस कराएगा. | इससे जुड़ी ख़बरें ख़ानदानी लेखिका हैं किरण देसाई 11 अक्तूबर, 2006 | पत्रिका किरण देसाई को बुकर पुरस्कार10 अक्तूबर, 2006 | पत्रिका नाटककार हैरल्ड पिंटर को नोबेल सम्मान13 अक्तूबर, 2005 | पत्रिका समलैंगिकों की कहानी को बुकर पुरस्कार20 अक्तूबर, 2004 | पत्रिका साहित्य का नोबेल एल्फ़्रीदा येलिनीक को08 अक्तूबर, 2004 | पत्रिका | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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