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गुरुवार, 01 मार्च, 2007 को 15:38 GMT तक के समाचार
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चौखट के बाहर की दुनिया में क़दम

फ़िरोज़ा
फ़िरोज़ा ने बुर्क़ा पहनना छोड़ दिया है
भारत के गुजरात राज्य में रहने वाली 23 वर्षीय फ़िरोज़ा शेख हाल ही में साओनली नगरपालिका के लिए चुनी गई है.

वैसे ऐसा नहीं है कि भारत में महिलाएँ चुनाव नहीं लड़तीं लेकिन फ़िरोज़ा के मामले में बात थोड़ी अलग है- उन्होंने अपनी ज़िंदगी के पहले 18 साल रूढ़िवादी परिवेश में बिताए हैं.

फ़िरोज़ा कहती हैं कि उन्होंने सिर्फ़ एक नर्सिंग कोर्स किया है वो भी थोड़े समय के लिए लेकिन ये सब वर्ष 2002 में हुए गुजरात दंगों के पहले की बात है.

गुजरात में फ़रवरी 2002 में एक ट्रेन पर हुए हमले में 59 हिंदुओं की मौत के बाद, वहाँ सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे थे जिसमें करीब दो हज़ार लोग मारे गए थे. इनमें से ज़्यादातर मुसलमान थे.

उस समय गुजरात सरकार पर आरोप लगाया गया था कि मुस्लिमों पर किए गए हमलों के दौरान उसने कड़े क़दम नहीं उठाए.

महिलाएँ आगे आईं

गुजरात दंगों के बाद, मुस्लिम समुदाय में कई परिवारों में ज़्यादातर पुरुष या तो पकड़ लिए गए या फिर वे कहीं न कहीं छिपे रहे, नतीजा ये हुआ कि महिलाएँ अकेली पड़ गईं.

गुजरात दंगों के बाद कई परिवारों में घर की ज़िम्मेदारी महिलाओं पर आ गई

फ़िरोज़ा बताती हैं कि दंगों के बाद उनके पास घर की दहलीज़ से बाहर निकलने के अलावा और कोई विकल्प नहीं था.

फ़िरोज़ा ने दंगा प्रभावितों के लिए बने अस्थाई शिविर में काम करना शुरु किया और वे ज़्यादातर समय ऐसे बच्चों के साथ बिताती थीं जिनके माता-पिता मारे गए हैं.

जब शिविर बंद हो गया तो फ़िरोज़ा ने विस्थापित महिलाओं के लिए काम करना शुरू कर दिया.

अपने काम के लिए फ़िरोज़ा को कई वज़ीफ़े मिले हैं और 2006 में वे नगरपालिका के लिए चुनी गईं.

'सकारात्मक पहलू'

गुजरात दंगों के नकारात्मक पहलुओं पर तो काफ़ी चर्चा हुई है लेकिन मुस्लिम बुद्धिजीवी जेएस बंदूकवाला कहते हैं कि दंगों का मुस्लिमों पर ‘सकारात्मक’ असर भी हुआ है.

जेएस बंदूकवाला कहते हैं, "इससे पहले मैने कभी बाहरी काम-काज के लिए इतनी बड़ी संख्या में मुस्लिम महिलाओं को आगे आते नहीं देखा."

सो किन चीज़ों ने इन महिलाओं को आगे आने के लिए प्रेरित किया? ग़ैर सरकारी संस्था एक्शन एड के ज़ाकिया जौहर कहते हैं कि हालात ने इन महिलाओं को मजबूर किया.

जैसे कि गोधरा में कई पुरुष गिरफ़्तार हो चुके थे और उनके लिए क़ानूनी लड़ाई महिलाओं को खुद लड़नी पड़ी.

अहमदाबाद के वकील मुकुल सिन्हा कहते हैं, "महिलाओँ को कोर्ट आना पड़ा और वे अपने अधिकारों के प्रति जागृत होने लगीं."

अब महिलाएँ रैलियों में भी बड़ी संख्या में आती हैं और दूसरी सामाजिक गतिविधियों में भी हिस्सा लेती हैं.

'दूसरी ज़िंदगी'

लतीफ़ा यूसुफ़ ऐसी ही एक महिला हैं जिन्होंने, उनके अपने शब्दों में 'दूसरी ज़िदंगी' शुरू की है. दंगों के बाद से वे सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर काम करती हैं और गोधरा में एक स्कूल चलाती हैं.

रिज़वाना कहती हैं कि उनकी माँ के काम-काज से वे विचलित हो जाती हैं

लतीफ़ा कहती हैं कि स्कूल में धार्मिक चीज़ें न पढ़ाने का फ़ैसला किया गया है और बच्चों के माता-पिता भी इससे सहमत हैं.

स्कूल में पढ़ने वाले एक छात्र के पिता मोहम्मद इक़बाल ख़ान कहते हैं, "मैने धार्मिक शिक्षा ली थी और उससे कुछ मदद नहीं मिली."

लेकिन लतीफ़ा कहती हैं कि पैसे की कमी की वजह से वो ज़्यादा दिनों तक स्कूल नहीं चला पाएँगी.

लतीफ़ा और उनकी दोस्त शरीफ़ा रज़्ज़ाक गोधरा में जाने-माने नाम हैं.

गुजरात दंगों के कई पीड़ितों ने बीबीसी को बताया कि इन महिलाओं ने उन्हें चिकित्सीय उपचार दिलवाया और पुनर्वास में भी मदद की.

लेकिन लतीफ़ा के सामाजिक कार्य उनकी बेटी रिज़वाना को थोड़ा विचलित करते हैं. रिज़वाना कहती हैं कि उनकी माँ के सामाजिक कार्यों की वजह से वे समुदाय में अलग-थलग पड़ गए हैं.

रिज़वाना कहती हैं, "मेरे पिताजी को 2004 में प्रशासन पकड़ कर ले गया और एक साल तक हिरासत में रखा. उस समय किसी ने हमारी मदद नहीं की थी."

कमाने की ज़िम्मेदारी

उधर लतीफ़ा और उनकी दोस्त शरीफ़ा रज़्ज़ाक के लिए प्राथमिकता ऐसे लोगों के लिए धन जुटाना है जहाँ परिवार के पुरुष सदस्य पाँच सालों से हिरासत में है.

सुल्ताना ख़ान कहती हैं कि उन्हें बच्चों की देख-रेख के लिए भीख माँगनी पड़ती है

रहमतनगर कॉलोनी ऐसा ही एक इलाक़ा है जहाँ से 11 पुरुषों को पोटा के तहत पकड़ लिया गया था.

इस कॉलोनी की ख़ातून सुल्ताना ख़ान कहती हैं कि उसके तीनों बेटों को पकड़ लिया गया था और अपने पोते-पोतियों को पालने के लिए वे भीख माँगने पर मजबूर हैं.

शरीफ़ा रज़्ज़ाक कहती हैं कि ऐसे परिवारों की व्यथा ही उन्हें घर से निकल कर काम करने पर मजबूर करती है.

पुरुषों की ग़ैर मौजूदगी में काम ढूँढने या कारोबार चलाने की ज़िम्मेदारी महिलाओं पर आ गई है. कई मुस्लिम महिलाएँ ग़ैर सरकारी संस्थाओं से लघु ऋण के लिए आवेदन कर रही हैं.

एक ग़ैर सरकारी संस्था से जुड़ी एक कार्यकर्ता कहती हैं, "शुरू में इन महिलाओं को कम राशि का क़र्ज़ दिया जाता है. इस पैसे से वो कुछ और ख़रीदती है जिसमें से कुछ वो ख़ुद के लिए इस्तेमाल करती हैं और कुछ को बेच देती हैं."

लेकिन गोधरा में कई मुस्लिम महिलाएँ ऐसी भी हैं जो कहती हैं कि उनके पतियों ने उन्हें काम करने से रोका हुआ है.

शमीमा शेख कहती हैं, मेरे पति नहीं चाहते कि मैं बाहर जाऊँ, दूसरे पुरुषों से मिलूँ, बहुत खीझ होती है मुझे.

शमीमा शेख के पति ने हाल में उन्हें बाहर जाने की इजाज़त दी है और कभी-कभी समस्या भी खड़ी कर देते हैं. शमीमा शेख के पति और गली के अन्य पुरुष इस बारे में बात करने को तैयार नहीं थे.

गुजरात दंगों के बाद गोधरा में मुस्लिम महिलाओं के जीवन में कुछ सकारात्मक बदलाव आए हैं लेकिन लगता है कि पुरुष अब भी बदलाव की बयार का हिस्सा बनने से झिझक रहे हैं.

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