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मंगलवार, 27 फ़रवरी, 2007 को 15:41 GMT तक के समाचार
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अब उत्तराखंड झेलेगा राजनीतिक झंझावात

नारायण दत्त तिवारी
नारायण दत्त तिवारी तो शुरु में चुनाव प्रचार भी नहीं कर रहे थे
निर्वतमान मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी ने पराजय के कारणों पर टिप्पणी करते हुए न तो महंगाई को दोषी ठहराया और न भितरघातियों को.

बस इतना ही कहा कि उनकी कोशिशों के बावजूद राज्य के कई हिस्सों में मतदाताओं को विकास की गति संतुष्ट नहीं कर सकी होगी.

वैसे तिवारी जी जिन्हें पहाड़ के लोग आदरपूर्वक ‘त्याड़ज्यू’ कहकर पुकारते हैं, ऐसे परिणामों को लेकर पहले से आशंकित थे. पर शायद उन्हें भी यह अहसास नहीं होगा कि पार्टी को चुनाव परिणामों में 13 सीटों का नुकसान होगा और उनके प्रबल समर्थकों में इंदिरा हृदयेश और नवप्रभात और दूसरे कई कैबिनेट मंत्रियों को भी मतदाता इस तरह ठुकरा देंगे.

तिवारी जी स्वयं तो पिछले एक वर्ष से प्रस्थान बिंदु पर खड़े ही थे. आलाकमान की उनको देहरादून में बनाए रखने की अपनी विवशताएँ हो सकती है मगर जहाँ तक तिवारी जी का प्रश्न है उन्होंने शीर्ष काँग्रेस नेतृत्व से अपनी यह मनोभावना कभी नहीं छिपाई कि बढ़ती वय का दबाव उन्हें मुख्यमंत्रित्व की कड़ी जिम्मेदारी संभाले रहने से रोकता है.

वे अपनी ज़िम्मेदारियों के साथ न्याय नहीं कर पा रहे थे. पिछले कुछ महीनों से तो वे अपने परिचित मिलने-जुलने वालों से पूछने भी लगे कि आपने कोई 81 साल का मुख्यमंत्री किसी और राज्य में पहले कभी देखा है?

हो सकता है कि महंगाई जैसे मुद्दों ने भी भूमिका निभाई हो लेकिन नारायण दत्त तिवारी जी ने सत्ता और दलीय अनुशासन की जिस तरह से अनदेखी की, वह भी अपने आपमें एक बड़ा कारण रहा है.

सत्ता की जोड़तोड़

उधर भाजपा ने 69 में से 34 सीटें जीती हैं. यानी बहुमत से एक सीट कम.

इसके बाद उत्तराखंड की सत्ता एक ऐसे जोड़-तोड़ में उलझ गई है जहाँ सिर्फ़ एक और विधायक के पक्ष में आने पर भाजपा की सरकार का बहुमत बन जाता है और उस ‘किसी एक’ के नहीं मिल पाने की स्थिति में काँग्रेस पिछले दरवाज़े से ही सही, सत्ता में रहने की कोशिश कर सकती है.

यह कठिनाई इसलिए और भी ज़्यादा पेंचदार हो गई है कि 34 सीटों पर विजयी भाजपा को, बसपा (आठ सीटें), उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) और काँग्रेस से बागी विधायकों में से किसी का समर्थन चाहिए.

तकनीकी दृष्टि से उत्तराखंड के राज्यपाल चुनाव में सबसे अधिक सीटें हासिल करने वाले दल भाजपा को ही पहले सरकार बनाने के लिए निमंत्रित करेंगे और अन्य राज्यों के अनुभव यही बताते हैं कि जिस दल को सरकार बनाने का निमंत्रण मिलता है प्रायः उसे ही निर्दलियों में से कुछ का साथ मिल भी जाता है.

लेकिन उत्तराखंड के निर्दलीय दरअसल जिस दल (काँग्रेस) से बागी हुए हैं अगर वही बाँहें पसार कर उन्हें वापस बुलाता है तो शायद वे पुराना मोह त्याग सकेंगे या नहीं, कहना मुश्किल है.

यूकेडी भी वैचारिक दृष्टि से भाजपा के बजाय काँग्रेस के ही अधिक निकट रहा है और अंततः बसपा बच जाती है जो काँग्रेस का साथ केवल उसी दशा में देना चाहेगी जब उसे लगे कि अब इसके सिवा कोई चारा नहीं है और यह भी कि उनके साथ देने पर काँग्रेस की सरकार बन ही जाएगी.

इसमें ज़रा भी संशय हुआ तो बसपा, जिसके लिए उत्तराखंड की बजाय उत्तरप्रदेश कहीं अधिक महत्वपूर्ण है, अभी कोई ऐसा निर्णय नहीं लेगी जिससे उत्तरप्रदेश के मतदाताओं में यह संदेश जाए कि वहाँ भी चुनाव के बाद बसपा काँग्रेस का ही साथ निभाएगी. संभवतः करे भी वह ऐसा ही, मगर अभी से अपने पत्ते खोल देना उसे गवारा नहीं.

इसलिए यह मानकर ही चलना चाहिए कि भाजपा एक सीट का जुगाड़ शायद कर ही लेगी हालाँकि यह कोशिश भाजपा के लिए वैसी ही होगी जैसे जायकेदार पुलाव खाते वक्त कोई कंकड़ दातों तले आ जाए.

देहरादून के राजनीतिक बिचौलिए हालाँकि अब पूरी तरह सक्रिय हो गए हैं और स्थानीय भाजपाई नेताओं को आश्वस्त कर रहे हैं कि एक तो क्या चीज़ हैं वे पाँच-पाँच विधायक लाकर भाजपा की झोली में डाल देंगे बशर्ते कि राज्यपाल की तरफ से सरकार बनाने का निमंत्रण मिल जाए.

भाजपा के लिए दलीय अनुशासन बनाए रखने की कठिन परीक्षा भी सामने है. सत्ता हालाँकि बड़ा जोड़नेवाला तत्व मानी जाती रही है मगर जो मुख्यमंत्री या मंत्रिपद पाने से वंचित रह जाते हैं उनकी टीस अपने ढंग से मौक़े का इंतजार करती रहती है.

भाजपा को भी इन चुनावों में घोषित और अघोषित बागियों ने बड़ी चोट पहुँचाई है और काँग्रेस तो ख़ैर अगले चुनाव तक यह दर्द सहलाती ही रहेगी.

निष्कर्षतः यह कि मतदाताओं ने कोई दो टूक जनादेश नहीं दिया और इसके परिणामस्वरूप यह नवगठित राज्य आने वाले लंबे समय तक राजनीतिक झंझावातों से गुजरता रहेगा.

ठोस और स्थिर सरकार का सपना चुनाव 2007 पूरा नहीं कर सका. यह कसक भाजपा के मन में भी है और काँग्रेस के लिए तो ख़ैर आत्ममंथन के और भी अनेक कारण हैं.

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