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बुधवार, 21 फ़रवरी, 2007 को 12:25 GMT तक के समाचार
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कश्मीर में धमकियों को नकारा

एक कश्मीरी महिला
कश्मीर में कुछ चरमपंथी महिलाओं के लिए विशेष ड्रेस कोड लागू करने की बात करते हैं
भारत प्रशासित कश्मीर में एक चरमपंथी संगठन की धमकी को धता बताते हुए सैकड़ों युवक-युवतियाँ बुधवार को एक टेलीविज़न संगीत प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए उमड़ पड़े.

इस टेलीविज़न संगीत प्रतियोगिता का नाम इंडियन आइडल है और अल मदीना रेजीमेंट नामक एक चरमपंथी संगठन ने मंगलवार को युवक-युवतियों को इस प्रतियोगिता में भाग लेने से दूर रहने की धमकी जारी की थी.

इस संगठन ने इस टेलीविज़न प्रतियोगिता को अश्लील कार्यक्रम क़रार दिया था.

इंडियन आइडल नामक कार्यक्रम ब्रिटेन के पॉप आइडल कार्यक्रम की तर्ज़ पर शुरू किया गया है और इसने अनेक उभरते गायकों को भारत भर में एक लोकप्रिय मंच उपलब्ध कराया है.

हालाँकि यह कार्यक्रम भारत के अन्य हिस्सों में अनेक वर्षों से चल रहा है लेकिन यह पहला मौक़ा है कि सोनी टेलीविज़न ने इसका आयोजन श्रीनगर में किया है.

कश्मीर घाटी एक परंपरागत समाज है. इसके अलावा अनेक चरमपंथी संगठन, समय-समय पर वेशभूषा संबंधी इस्लामी कोड लागू करने की कोशिश करते रहे हैं.

चरमपंथी संगठनों के इसी रुख़ की वजह से इंडियन आइडल कार्यक्रम चर्चा में आ गया है. सोनी टेलीविज़न चैनल के प्रचार प्रमुख शोला राजाचंद्रन ने पत्रकारों से कहा, "हम यहाँ भरोसे और सद इच्छा के साथ आए हैं. हमारा ख़याल है कि क्यों न इस बार उभरते गायक-गायिकाएँ कश्मीर से ही आएं."

बुधवार को जब इस कार्यक्रम का ऑडीशन शुरू हुआ तो हल्की बारिश हो रही थी लेकिन वो बारिश युवक-युवतियों के उत्साह को ठंडा नहीं कर सकी. शेरे कश्मीर अंतरराष्ट्रीय कान्फ्रेंस परिसर में इस प्रतियोगिता के लिए सुबह से ही युवक-युवतियों की भीड़ जमा होनी शुरू हो गई थी और वहाँ उत्सव का माहौल था.

अच्छा मौक़ा

प्रतियोगिता में भाग लेने गई एक युवती की बहन परिसर के बाहर इंतज़ार कर रही थी. उसने बीबीसी से बातचीत में कहा, "इस तरह का कार्यक्रम श्रीनगर में आयोजित करने के लिए मैं सोनी टेलीविज़न चैनल की तारीफ़ करती हूँ. उन्होंने कश्मीर युवक-युवतियों को भी प्रतिभा दिखाने का एक मौक़ा दिया है. इसके ज़रिए कश्मीरी युवक-युवतियाँ कश्मीर का प्रतिनिधित्व कर सकेंगे. यह एक अच्छी शुरूआत है."

बीबीसी संवाददाता अल्ताफ़ हुसैन कुछ युवकों से बातचीत करते हुए
बहुत से युवक परिसर में नहीं जा सके

उस महिला का कहना था, "चरमपंथियों को ऐसे मामलों से कुछ लेना-देना नहीं है और उन्हें इनमें बाधा खड़ी नहीं करनी चाहिए. अगर किसी को कश्मीर के लिए आज़ादी चाहिए तो वह बिल्कुल अलग मामला है. हर आदमी अपनी निजी ज़िंदगी जीना चाहता है, अपनी पहचान बनाना चाहता है. और उसके लिए इस तरह के कार्यक्रम बहुत अच्छा मंच हैं."

हालाँकि उस जैसी अन्य महिलाओं को यह भी शिकायत थी कि उनके इस उत्साह के बावजूद उन्हें परिसर के बाहर इंतज़ार करना पड़ा है, शायद सोनी टेलीविज़न चैनल वाले चरमपंथियों की धमकी को देखते हुए सुरक्षा को लेकर कोई जोखिम नहीं उठाना चाहते थे.

जो युवक-युवतियाँ इस प्रतियोगिता में कामयाब नहीं हो सके, उन्होंने परिसर के बाहर भी अपने हुनर का प्रदर्शन किया. उनमें से एक सायमा थी जिन्हें कम उम्र होने की वजह से प्रतियोगिता में शामिल होने का मौक़ा नहीं मिला.

सायमा के साथ उनकी दादी आई थीं जो बुर्क़े में थीं. उन्होंने कहा कि वह अपनी पोती सायमा को इस प्रतियोगिता में हिस्सा दिलाना चाहती थीं और इसके लिए वह ख़ूब दुआएँ कर रही थीं.

कुछ दिन पहले एक कश्मीरी क़ाज़ी तौक़ीर ने सोनी टेलीविज़न की एक प्रतियोगिता - फ़ेम गुरूकुल - में जीत हासिल की थी, तब से बहुत से कश्मीरी युवक-युवतियों में ऐसी प्रतियोगिताओं में भाग लेने का उत्साह जागा है. क़ाज़ी तौक़ीर श्रीनगर से ही हैं.

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