|
दो दशकों में कैसे बदला चुनावी रंग | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पंजाब का पिछले 20 से 25 साल का चुनावी इतिहास देखा जाए तो इस चुनाव का रंग काफ़ी अलग दिखाई देता है. वर्ष 1980 में पंजाब में कांग्रेस की सरकार थी लेकिन राज्य में 1981 में चरमपंथी आंदोलन शुरू हो गया था और उसके बाद पूरा परिदृश्य ही बदल गया. वर्ष 1985 का विधानसभा चुनाव अमृतसर में स्वर्ण मंदिर में सैन्य कार्रवाई 'ऑपरेशन ब्लू स्टार' और उसके बाद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या और सिख विरोधी दंगों के बाद हुआ था. असामान्य परिस्थितियाँ उस समय प्रधानमंत्री राजीव गांधी और मुख्यधारा के अकालियों के बीच एक 'सहमति' बनी थी जिसके तहत राजीव-लोंगोवाल समझौता हुआ. उस चुनाव में कांग्रेस की ओर से कमज़ोर उम्मीदवार उतारे गए और सहमति यही बनी थी कि पंजाब में अकालियों को सरकार बनाने दी जाए. बंदूक के साए में हुए उस चुनाव में बरनाला सरकार बनी लेकिन मई 1987 में अकाली दल की सरकार को बिना किसी कारण के बर्ख़ास्त कर दिया गया और उसके बाद लंबे समय तक राज्य में केंद्र का शासन रहा. इस दौरान चरमपंथी अभियान चलता रहा. वर्ष 1991 में मतदान शुरू होने से कुछ घंटे पहले ही केंद्र सरकार की सिफ़ारिश पर चुनाव आयोग ने पूरी प्रक्रिया को निरस्त करने का फ़ैसला लिया. उस चुनाव में काफ़ी हिंसक घटनाएँ हुई थी और तब गृह राज्य मंत्री सुबोध कांत सहाय ऐसी एक घटना में बाल-बाल बचे थे. जब वर्ष 1992 में विधानसभा चुनाव हुए तो मुख्यधारा के अकालियों ने चुनाव का बहिष्कार किया. चुनाव सुरक्षा बलों और चरमपंथियों की बंदूक के साये में हुआ था. ज़्यादा मतदान भी नहीं हुआ लेकिन कांग्रेस को बहुमत मिला और बेअंत सिंह सरकार का गठन हुआ. वर्ष 1997 के चुनाव में भागीदारी के स्तर पर तो लोकतंत्र था लेकिन मुद्दे सामान्य नहीं थे.
बेअंत सिंह के शासन काल को दमन के साथ जोड़ कर देखा जाने लगा था. इस वजह से लोगों की नाराजगी की आँधी में कांग्रेस बह गई. इस पृष्ठभूमि को देखते हुए वर्ष 2002 का विधानसभा चुनाव, 1980 के बाद पहला सामान्य चुनाव था. बदल गया चुनावी रंग पंजाब देश का एक ऐसा राज्य हैं जहाँ राष्ट्रीय स्तर पर अल्पसंख्यक सिख बहुसंख्यक है, जिनकी अपनी आकांक्षाएं और महत्वाकांक्षाएं हैं. आश्चर्यजनक रूप से इस बार पिछले चुनावों जैसे इन आकांक्षाओं पर ध्यान नहीं दिया गया है. इस बार तो ऐसा प्रतीत होता है कि मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ख़ुद को अकालियों से बेहतर सिख साबित करने में जुटे हैं. शायद इसीलिए वे अमृतसर-ननकाना साहिब बस सेवा शुरु होने का श्रेय़ लेना चाहते हैं. हालांकि लोग उनके इन दावे और एजेंडे पर ध्यान नहीं दे रहे हैं और अकालियों ने तो इसे छुआ तक नहीं है. यहाँ तक कि सिमरनजीत सिंह मान और दलजीत सिंह बिट्टू जैसे कट्टरपंथियों के अकाली दल (अमृतसर) के उम्मीदवार भी इसकी बात नहीं कर रहे हैं. यह पिछले चुनावों के मुक़ाबले इस बार साफ़ तौर से दिख रहा सबसे बड़ा बदलाव है. कृषि के लिहाज़ से देश के सबसे उन्नत राज्य में गहराते कृषि संकट की बात हो रही है. यही वह राज्य है जो देश के बाज़ारों में सबसे अधिक अनाज की आपूर्ति करता है. अगर दोनों पार्टियाँ विकास की बात कर रही हैं तो वास्तव में उसकी जरूरत भी है. वर्ष 2002 में भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर अकाली दल-भाजपा गठबंधन सरकार के विरोध में लहर थी. वैसी लहर इस बार तो नहीं है लेकिन पासा पलट चुका है और भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर कांग्रसे पर आरोप लग रहे हैं. यह इस लिहाज से भी पहला चुनाव होगा कि प्रधानमंत्री की जनसभा को लेकर उनके अपने शहर अमृतसर में भी लोगों ने उदासीनता दिखाई है. | इससे जुड़ी ख़बरें अमरिंदर को चुनाव आयोग का नोटिस10 फ़रवरी, 2007 | भारत और पड़ोस प्रधानमंत्री पंजाब के चुनाव प्रचार में जुटे05 फ़रवरी, 2007 | भारत और पड़ोस राजनीति में भ्रष्टाचार पर भट्टी का व्यंग्य25 जनवरी, 2007 | भारत और पड़ोस सिद्धू अमृतसर से चुनाव लड़ने को तैयार24 जनवरी, 2007 | भारत और पड़ोस पंजाब पुलिस प्रमुख के तबादले का आदेश 20 जनवरी, 2007 | भारत और पड़ोस तीन राज्यों में फ़रवरी में होंगे चुनाव29 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||