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शनिवार, 03 फ़रवरी, 2007 को 11:59 GMT तक के समाचार
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..उड़ि जहाज को पंछि पुनि जहाज पर आवे

एनआरआई
आप्रवासी भारतीय अब मुड़ कर भारत की ओर देख रहे हैं
भारत विराट जहाज़ है,उसे छोड़कर उड़े पंछी शायद सबसे ज़्यादा बेचैन होते हैं, उनका मन कहीं सुख नहीं पाता, वे बार-बार वहीं लौट जाना चाहते हैं.

लेकिन उड़े भी तो यूँ हीं नहीं थे, वजहें थीं- बेहतर कमाई,बेहतर अवसर और बेहतर जीवनशैली की आस.

ये तीन बहुत अहम बातें हैं,लगता था अगर ये मिल गए तो सब दुख दूर हो जाएँगे लेकिन अब तो उन्हें भारत का सुख दुखी कर रहा है.

ग़लत न समझिए,रूपए की घटती क़ीमत के कारण 'बेहतर होते एक्सचेंज रेट' पर ख़ुश होने वाले मध्यवर्गीय आप्रवासी भारतीय को ज़रा रहमदिली से देखिए.

 भारत में मॉल है, कारें हैं, मल्टीप्लेक्स हैं,मॉडर्न फ्लैट्स हैं,बच्चों के बेहतरीन स्कूल हैं,आईआईटी,आईआईएम हैं...सुपरस्टोर भी खुल गए हैं...जब जेब में पैसा हो तो क्या यूरोप और क्या इंडिया...

उस बेचारे को क्या पता था कि जिस भारत को वह छोड़ रहा है उसके दिन इस तरह फिरने वाले हैं.पाउंड,डॉलर नहीं, रूपए में ही दोस्त बराबर तनख़्वाह पाने लगे.

जो दस साल पहले यूरोप की चमक देख पंतगे की तरह खिंचे चले आए थे उनके दोस्त अब 'सोचा,ज़रा घूम आते हैं' कहते हुए चले आते हैं.

भारत में मॉल है, कारें हैं, मल्टीप्लेक्स हैं,मॉडर्न फ्लैट्स हैं,बच्चों के बेहतरीन स्कूल हैं,आईआईटी,आईआईएम हैं...सुपरस्टोर भी खुल गए हैं...जब जेब में पैसा हो तो क्या यूरोप और क्या इंडिया...

आर्थिक कारणों से भारत छोड़ने वाले पढ़े-लिखे मध्यवर्गीय व्यक्ति को बदलते भारत ने अंदर तक मथ दिया है.बेवजह नहीं लौट रहे हैं हज़ारों लोग.

लोग क्या वे कंपनियाँ ही भारत जा रही हैं जिनमें काम करने के लिए लोग भारत से विदा हुए थे.टाटा,रिलायंस और विप्रो तो गोरे लोगों को भी नौकरियाँ दे रहे हैं.

सबसे बड़ी वजह ख़त्म होती दिखती है, हुनर हो तो पैसा भारत में शायद ज़्यादा ही कमाया जा सकता है.

अवसर

कुछ साल पहले तक अगर इंजीनियर हैं तो भेल,गेल,सेल में जाइए या फिर आईआईटी में पढ़िए और सरक लीजिए किसी आर्सेलर या कोरस में काम करने के लिए.

लेकिन अब तो मित्तल, जिंदल,सिंघल और टाटा-बिड़ला उन कंपनियों को ही ख़रीद रहे हैं जो कभी कैम्पस रिक्रूटमेंट में आपके हुनर की बोली लगाते थे.

पढ़े-लिखे शहरी मध्यवर्गीय लोगों के लिए अवसरों की कमी नहीं रह गई है भारत में

कॉर्पोरेट सेक्टर में तेज़ी से आगे बढ़ने के लिए विदेश बसने की ज़रूरत नहीं रही, अगर फॉरेन एक्सपोज़र चाहिए तो कौन सी बड़ी भारतीय कंपनी है जो आपको विदेश न भेजती हो.

बीजेपी वाले सहरसा,सतना और बाड़मेर जैसी जगहों पर लोगों को बता रहे थे 'इंडिया शाइनिंग' इसलिए लोग नहीं माने. बुश और ब्लेयर जब मुंबई,दिल्ली,बंगलौर में यही बात कहते हैं तो उसका बड़ा गुलाबी असर होता है.

अवसर इतने हैं कि आईआईटी,आईआईएम वाले मुश्किल में हैं कि जाएँ तो कहाँ जाएँ...विदेशी कंपनियाँ हाथों-हाथ लेने को तैयार हैं तो देसी कंपनियाँ भी उनकी टक्कर का पैकेज दे रही हैं.

जीवनशैली

यहाँ आकर बात सबसे ज़्यादा उलझती है,ठीक है कि भारत में अब पैसा है और अवसर भी, लेकिन धूल,गर्मी,मक्खी,मच्छर,गंदगी,भ्रष्टाचार,अव्यवस्था का क्या?

बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के सर्वे में भारत जाकर बसने के बारे में पूछे जाने पर 40 प्रतिशत से अधिक लोगों ने कहा कि वे 'लौटना तो चाहते हैं लेकिन वहाँ बसना बहुत कठिन है.'

 अब भारत में हो रहे बदलाव ने सभी पंछियों को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या उन्हें अपने जहाज़ पर वापस लौटना चाहिए,कुछ बेचारे तो आउटसोर्सिंग की बयार में, न चाहते हुए भी, बह जाएँगे.

हर कोई 'आ अब लौट चलें' वाले मूड में हों ऐसा ज़रूरी नहीं है.लोग कहते हैं उन्हें 'सिस्टैमैटिक' तरीक़े से रहने की आदत पड़ गई है और भारत में सब कुछ हो सकता है लेकिन व्यवस्था नहीं है.

लोग कहते हैं पैसा और अवसर सब कुछ नहीं,शांति-सुकून भी कोई चीज़ है...वे तो रह लेंगे लेकिन बच्चे? दोनों आज भी अलग-अलग दुनिया हैं...

'नहीं रहे इंडियन'(एनआरआई)बिरादरी के लिए दस साल पहले तक निर्णय लेना बहुत आसान था, ग्रीन कार्ड-रेज़िडेंसी और उसके बाद 'जीना यहाँ मरना यहाँ'.

लेकिन अब भारत में हो रहे बदलाव ने सभी पंछियों को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या उन्हें अपने जहाज़ पर वापस लौटना चाहिए,कुछ बेचारे तो आउटसोर्सिंग की बयार में, न चाहते हुए भी, बह जाएँगे.

एनआरआई बिरादरी के बहुत सारे लोगों को दूसरी बार बड़ा फ़ैसला करना है, भारत से उड़ जाने का फ़ैसला बहुत आसान था मगर लौट जाने का फ़ैसला उतना आसान नहीं.

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