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गुरुवार, 11 जनवरी, 2007 को 11:26 GMT तक के समाचार
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ज़्यादा बच्चे पैदा करने पर मिला पुरस्कार

एमिलिया का परिवार
एमिलिया और उसके पति सब्जियाँ और मछली बेचकर अपना गुजारा करते हैं
भारत में जहाँ एक ओर बढ़ती जनसंख्या पर नियंत्रण के प्रयास होते रहे हैं वहीं एक राज्य ऐसा भी है जहाँ ज़्यादा बच्चे पैदा किए जाने पर पुरस्कार दिया जा रहा है. यह राज्य है मेघालय.

मेघालय की एमिलिया सोहटन के 17 बच्चे हैं और हाल ही में उन्हें इतने बच्चों को जन्म देने के लिए 16 हज़ार रुपए का पुरस्कार दिया गया है.

इसी तरह डोरोथिया खरबानी और फिलोमेना सोहलंगपियाओ को भी 15-15 बच्चे पैदा करने के लिए पुरस्कृत किया गया है. ये तीनों ही महिलाएँ मेघालय की खासी जनजाति से आतीं हैं.

कारण यह है कि मेघालय के खासी हिल्स ऑटोनोमस डिस्ट्रिक्ट काउंसिल ने अपने घोषित अभियान के तहत 15 से अधिक बच्चे पैदा करने वाली खासी महिलाओं को पुरस्कृत करना शुरू किया है.

काउंसिल का मानना है कि इससे बाहरी लोगों के मुक़ाबले खासी लोगों की संख्या में आती कमी से बचा जा सकता है.

काउंसिल के चैयरमैन एचएस शैला कहते हैं, "हमारे पास काफ़ी ज़मीन है. अगर खासी लोग अपनी आबादी नहीं बढ़ाते तो बांग्लादेश या भारत के दूसरे हिस्से से आए लोग हमारी ज़मीन पर क़ब्ज़ा कर लेंगे."

कुछ माताएँ तो पैसे दिए जाने के प्रति आभार प्रकट करती हैं लेकिन महिला अधिकार के लिए काम करने वाले लोग इससे ख़ुश नहीं हैं.

खासी काउंसिल खासी जनजातियों की एक चुनी हुई और स्वायत्त संस्था है.

 भारत की राष्ट्रीय जनसंख्या नीति जो 'हम दो हमारे दो' की बात करती है उससे खासी लोगों को अलग रखा जाना चाहिए. हमारी परिस्थितियाँ अलग है और हमें अपने अनुकूल उपाय अपनाने का पूरा अधिकार है.
एचएस शैला, चैयरमैन, केएचएडीसी

राज्य सरकार आम तौर पर इसकी परंपराओं और स्थानीय रीति-रिवाज़ों में हस्तक्षेप करने से बचती रही है.

शैला ने बीबीसी को बताया, "हम लोगों को अधिक से अधिक बच्चे पैदा करने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं. खासी लोगों की आबादी अभी दस लाख के क़रीब है लेकिन हम अगले दस सालों में इसे दोगुना करना चाहते हैं."

माताओं को प्रोत्साहित करने के अपने अभियान के तहत काउंसिल ने नवंबर में एक कार्यक्रम आयोजित किया.

इस कार्यक्रम में 46 वर्षीय खासी महिला एमेलिया सोहटन को 16 हज़ार रुपए पुरस्कार में दिए गए. एमिलिया शिलांग के पास के रिंगी गाँव की हैं.

एमिलिया कहती हैं, "यह नकद पुरस्कार मेरे लिए क्रिसमस उपहार की तरह था. हम ग़रीब लोग हैं और 17 बच्चों की परवरिश करना बहुत मुश्किल काम है."

एमिलिया चाय की एक छोटी दूकान चलाती हैं और अपनी आजीविका के लिए वह और उनके पति सब्ज़ियाँ और मछली भी बेचते हैं.

डोरोथिया कहती हैं कि उन्होंने 25 बच्चों को जन्म दिया जिसमें अभी 15 जीवित हैं. फ़िलोमिना के 18 में से 16 बच्चे जीवित हैं.

काउंसिल के ही उप-सभापति नेस्टिंगखर नोंगखर ने बीबीसी को बताया, "दोनों महिलाओं को आदर्श के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है और सबको पता है कि उन्हें किस बात के लिए पुरस्कार दिया गया है."

अलग परिस्थितियाँ

चैयरमैन शैला कहते हैं कि भारत की राष्ट्रीय जनसंख्या नीति जो 'हम दो हमारे दो' की बात करती है उससे खासी लोगों को अलग रखा जाना चाहिए.

डोरोथिया अपने बच्चों के साथ
डोरोथिया और उसके 11 बच्चे

वे कहते हैं, "हमारी परिस्थितियाँ अलग है और हमें अपने अनुकूल उपाय अपनाने का पूरा अधिकार है."

मेघालय की क़रीब 20 लाख आबादी में 85 फ़ीसदी जनसंख्या वहाँ के जनजातियों की है. पिछले कुछ सालों से खासी कट्टरपंथियों के हमलों के बाद ज्यादातर बंगाली और नेपाली मेघालय छोड़ कर भाग चुके हैं.

पड़ोसी राज्य त्रिपुरा में बंगाली प्रवासियों की संख्या वहाँ की आबादी की 70 प्रतिशत के क़रीब पहुँच चुकी है और वहाँ की स्थानीय जनजातियाँ अल्पसंख्यक हो गई हैं.

असम की आबादी में भी बंगाली मूल के लोगों की संख्या 40 प्रतिशत से अधिक हो चुकी है. महिला अधिकार कार्यकर्त्ताओं ने ज़्यादा बच्चे पैदा किए जाने के अभियान पर एतराज़ जताया है.

मेघालय की अग्रणी स्तंभकार पेट्रिशिया मुखिम कहती हैं, "यह महिलाओं के जननात्मक अधिकारों का हनन किए जाने का एक प्रयास है. यह प्रजनन का एक बहुत ही पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण है और यह हमें स्वीकार्य नहीं है."

उन्होंने कहा कि एक बार कुछ हज़ार रुपयों का पुरस्कार तो वे दे देंगे लेकिन माता-पिता इतने सारे बच्चों की परवरिश कैसे करेंगे. यह बहुत आसान नहीं है.

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