BBCHindi.com
अँग्रेज़ी- दक्षिण एशिया
उर्दू
बंगाली
नेपाली
तमिल
गुरुवार, 21 दिसंबर, 2006 को 09:52 GMT तक के समाचार
मित्र को भेजेंकहानी छापें
बेंगालुरु के बाद अब जबालीपुरम

भोपाल में दूषित जल पीने को बाध्य लोग
क्या नाम बदल देने से ही बदल जाएगी शहरों की असली तस्वीर
मद्रास, कलकत्ता, और बम्बई की तर्ज पर मध्यप्रदेश में भी कुछ शहरों के नाम बदले जाएंगे.

इसके तहत आने वाले दिनों में नर्मदा नदी के किनारे बसे शहर होशंगाबाद का नाम होगा नर्मदापुरम, इंदौर हो जाएगा 'इंदूर' और भोपाल कहलाएगा भोजपाल.

राज्य में शहरों को नया नाम देने या कुछ लोगों की मानें तो प्राचीन और असली नामों को पुनर्जीवित करने की कवायद जबलपुर शहर से शुरु हो गई है, जहाँ स्थानीय नगर निगम ने इसका नाम जबालीपुरम रखे जाने के लिए एक प्रस्ताव हाल ही में सर्वसम्मति से पारित किया है.

मेयर सुशीला सिंह का कहना है कि जबलपुर को जबाली ऋषि की तपोभूमि के तौर पर जाना जाता है, इसीलिए इसका नाम जबालीपुरम रखे जाने की माँग बार-बार उठती रही थी.

अब दोनों मुख्य राजनीतिक पार्टियाँ कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी इस नामकरण प्रस्ताव को अपना-अपना बता रहे हैं.

और तो और इस मामले में भाजपा से संबंध रखने वाली मेयर सुशीला सिंह का समर्थन करने की बज़ाए विश्व हिंदू परिषद के चंद नेता कांग्रेस के पक्ष में बोल रहे हैं.

राजनीति

कहा जा रहा है कि राजनीतिक दलों में यह होड़ पुराने जबलपुर में रहने वाले एक प्रभावशाली वर्ग को खुश करने के लिए है जो जबलपुर को सदा से जबालीपुरम ही कहता रहा है.

 ये सभी राजनीतिक दल नाम बदलने की बज़ाए शहरों में मूलभूत सुविधाओं को बेहतर बनाने की ओर क्यों नहीं ध्यान देते ? क्या सिर्फ़ इसलिए कि यह मुश्किल है?
अखिलेश मेबिन, शिक्षाविद्

जबलपुर निवासी और बुद्धिजीवी राकेश दीक्षित इस पूरी प्रक्रिया को ही बेवकूफाना मानते हैं.

वे कहते हैं कि जब जबाली ऋषि के इस इलाक़े में आने पर ही प्रश्नचिन्ह है तो फिर शहर को उनके नाम से क्यों जोड़ा जाए?

दूसरे जबलपुर नाम इसलिए भी ठीक है क्योंकि अरबी शब्द जबल यानि पत्थर इस पथरीले इलाके के लिए सटीक है.

सुशीला सिंह कहती हैं कि ऐसे सवाल तब क्यों नहीं उठाए जाते जब द्रविड़ मूल की पार्टियाँ मद्रास का नाम चेन्नई और यहाँ तक की वामपंथी कलकत्ता को बदलकर कोलकाता कर देते हैं.

पिछले दिनों भारत में शहरों के नाम बदलने में कांग्रेस से लेकर भाजपा और वामपंथी कोई भी पीछे नहीं रहे. चेन्नई, कोलकाता, मुम्बई, और बेंगालूरू इसी का नतीज़ा है.

शिक्षाविद अखिलेश मेबिन पूछते हैं कि ये सभी राजनीतिक दल नाम बदलने की बजाए शहरों में मूलभूत सुविधाओं को बेहतर बनाने की ओर क्यों नहीं ध्यान देते? क्या सिर्फ़ इसलिए कि यह मुश्किल है?

इससे जुड़ी ख़बरें
मध्यप्रदेश में गो हत्या पर प्रतिबंध
12 दिसंबर, 2003 | भारत और पड़ोस
जबलपुर में चर्च पर हमला
14 जून, 2005 | भारत और पड़ोस
बंगलौर का एक और चेहरा
21 मार्च, 2006 | भारत और पड़ोस
सुर्ख़ियो में
मित्र को भेजेंकहानी छापें
मौसम|हम कौन हैं|हमारा पता|गोपनीयता|मदद चाहिए
BBC Copyright Logo^^ वापस ऊपर चलें
पहला पन्ना|भारत और पड़ोस|खेल की दुनिया|मनोरंजन एक्सप्रेस|आपकी राय|कुछ और जानिए
BBC News >> | BBC Sport >> | BBC Weather >> | BBC World Service >> | BBC Languages >>