BBCHindi.com
अँग्रेज़ी- दक्षिण एशिया
उर्दू
बंगाली
नेपाली
तमिल
मित्र को भेजेंकहानी छापें
बंगलौर का एक और चेहरा

विक्टोरिया की प्रतिमा
बंगलौर में अब भी विक्टोरिया की प्रतिमा नज़र आती है
इस साल नवंबर में कर्नाटक राज्य के गठन के 50 साल पूरे हो जाएंगे और नवंबर में ही राजधानी बंगलौर नाम एक बार फिर बदल जाएगा.

अंग्रेज़ी हुकूमत के समय शहर का नाम बदल दिया गया था. और बंगलौर अब बेंगालुरू के नाम से जाना जाएगा. हालांकि यह नाम स्थानीय लोगों में प्रचलित है.

लेकिन ऐसा नहीं हैं कि राज्य सरकार या किसी स्थानीय संगठन ने शहर के इतिहास को बदलने का पहला प्रयास किया हैं.

दिलचस्प बात यह हैं कि कन्नड़ भाषाई लोग और कन्नड़ संस्कृति संगठन अंग्रेज़ों के शासनकाल में लगाई मूर्तियाँ और उनके द्वारा शहर के सड़कों को दिए नाम बदलने के हक़ में नहीं हैं.

अगर किसी सड़क का नाम बदला भी गया तब भी आम लोग स्कूटर और टैक्सी चालक उन्हें पुराने नामों से ही जानते हैं.

इनफैन्ट्री रोड का नाम महावीर मार्ग किया गया, रिचमंड रोड को किम्मया रोड बनाया गया.

इसी प्रकार कई रिहाइशी इलाक़ों के भी नाम बदले गए थे, लेकिन मजाल हैं कोई उनके पुराने और लोकप्रिय नाम भूल जाए.

अगर एक सड़क का नया नाम सबके ज़हन में बस गया हैं तो वो हैं महात्मा गाँधी रोड या एमजी रोड जिसे साउथ परेड कहा जाता था.

महात्मा गाँधी रोड के एक छोड़ पर चिन्नास्वामी क्रिकेट स्टेडियम के निकट महात्मा गाँधी की मूर्ति हैं. मगर सड़क पार करते ही महारानी विकटोरिया की मूर्ति खड़ी हैं.

इस मूर्ति ने अपने स्थापना के सौ वर्ष पिछले महीने पूरे किए. यही नहीं क्वीन्ज़ रोड को आज भी इसी नाम से जाना जाता हैं.

कोई आंदोलन नहीं

उत्तर भारत के कई बड़े शहरों में जिस प्रकार से आज़ादी के बाद अंग्रेज़ी शासकों की प्रतिमाएं ढहाई गईं या राम मनोहर लोहिया के नेतृत्व में सोशलिस्ट पार्टी ने उन मूर्तियों पर कोलतार डालकर सरकार को उन्हें हटाने के लिए मजबूर किया था, वैसा कुछ यहाँ नहीं हुआ.

 हमें विक्टोरिया की प्रतिमा से कोई परहेज़ नहीं हैं. वो आज़ादी के पहले का इतिहास हैं. हमें वर्तमान से शिकायत हैं
कृष्णास्वामी, भाषाई आंदोलनकारी

इतिहासकार रामचंद्र गुहा का मानना हैं कि बंगलौर का नागरिक समझदार हैं. गुहा का कहना है,'' उसे पता है कि यह उसका अतीत हैं और वो इतिहास में हुए बदलाव को समझता हैं.''

गौर करने की बात यह हैं कि जो शख्स कन्नड़ संस्कृति और भाषा के लिए प्रदर्शन और तोड़-फोड़ तक करता हैं उसे महारानी विक्टोरिया की प्रतिमा से कोई परहेज़ नहीं.

वेदिके के महासचिव कृष्णास्वामी, अंग्रेज़ी संस्कृति और अंग्रेज़ी भाषा का इतना विरोध करते हैं कि वो अंग्रेज़ी में पूछे गए सवालों तक का जवाब नहीं देते.

हिंदी में सवाल करने पर उन्होंने कन्नड़ में कहा कि ‘हमें विक्टोरिया की प्रतिमा से कोई परहेज़ नहीं हैं. वो आज़ादी के पहले का इतिहास हैं. हमें वर्तमान से शिकायत हैं.’

इससे जुड़ी ख़बरें
बंगलौर नहीं, अब हो सकता है बेंगालुरू
12 दिसंबर, 2005 | भारत और पड़ोस
आईटी कंपनियों का चहेता है बंगलौर
15 जनवरी, 2006 | भारत और पड़ोस
बंगलौर पुलिस ने 'चरमपंथी' पकड़ा
03 जनवरी, 2006 | भारत और पड़ोस
भारी बारिश से बेहाल बंगलौर
27 अक्तूबर, 2005 | भारत और पड़ोस
सुर्ख़ियो में
मित्र को भेजेंकहानी छापें
मौसम|हम कौन हैं|हमारा पता|गोपनीयता|मदद चाहिए
BBC Copyright Logo^^ वापस ऊपर चलें
पहला पन्ना|भारत और पड़ोस|खेल की दुनिया|मनोरंजन एक्सप्रेस|आपकी राय|कुछ और जानिए
BBC News >> | BBC Sport >> | BBC Weather >> | BBC World Service >> | BBC Languages >>