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देवघर के पंडों के पास है सदियों पुरानी व्यवस्था | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बिहार में देवघर का बाबा वैद्यनाथ मंदिर. भारत में हिंदुओं के आराध्य भगवान शंकर के 12 ज्योतिर्लिंग धामों में से एक प्रमुख धाम. मंदिर काफ़ी पुराना है और उतनी ही पुरानी है यहाँ की व्यवस्था. पूजा की व्यवस्था, पंडों और यजमानों के बीच के संबंध की व्यवस्था. मंदिर पहुँचते ही आपको हर जगह पंडे ही पंडे मिल जाएँगे, आप अगर नए हैं तो आप सोच में पड़ जाएँगे कि किसके पास जाएँ. मगर आपकी मुश्किल एक पल में आसान हो जाएगी. आपको पल में वह पंडा मिल जाएगा जो आपका पंडा है. आपका पंडा मतलब उस पंडे का वंशज जिसके पास आपके पिता-दादा-परदादा-लकड़दादा या उसके पहले की पीढ़ी के लोग आते थे, वही ख़ास पंडा पूजा कराएगा आपकी. चाहे आप भारत के किसी भी कोने से आते हों, अगर आपको अपने पुश्तैनी पंडे का नाम पता है तो वो बताएँ, नाम याद नहीं तो अपने प्रदेश-शहर-गाँव का नाम बताएँ, पलक झपकते आपको अपने पंडे के पास पहुँचा दिया जाएगा और आपकी पूजा के लिए पंडा ढूंढने की मुश्किल हल हो जाएगी. लाभ देवघर कॉलेज के रिटायर्ड प्रिंसिपल प्रोफ़ेसर ताराकांत खवाड़े बताते हैं कि पंडों के पास पीढ़ियों-दर-पीढ़ियों के रिकॉर्ड होते हैं जिससे यजमानों को दो तरह के फ़ायदे होते हैं.
वो बताते हैं, "हिंदू संस्कृति में अपने पूर्वजों से जुड़े पुरोहित से पूजा करवाना एक अलग महत्व की बात है. इसके अलावा अगर आप जानना चाहें अपने गाँव या क्षेत्र से कौन-कौन व्यक्ति, कब-कब यहाँ आए थे तो यह जानकारी भी हासिल की जा सकती है." अतीत और वर्तमान के बीच कड़ी की तलाश का एक ऐसा ही दिलचस्प वाक़या है भारत की दिवंगत प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का जो 1979 में मंदिर आई थीं. अपने खाते में इंदिरा गांधी के हस्ताक्षर को दिखाते हुए नेहरू परिवार के पंडा सुनील तनपुरिए कहते हैं "इंदिरा जी आईं तो इलाहाबाद के पंडे अपने खातों को देखने लगे लेकिन वो तो कश्मीरी पंडित थीं और जब हमने दिखाया अपना रिकॉर्ड तो उन्होंने हमारी ही मदद से पूजा की." ऐसे ही मंदिर में कई और नामी-गिरामी हस्तियों के पंडे मौजूद हैं जिनमें भारत के पहले राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद और देश के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के पंडे मिल जाएँगे. व्यवस्था दिलचस्प बात यह है कि देश के कोने-कोने से आनेवाले श्रद्धालुओं के लिए पिछले पाँच-साढ़े पाँच सौ वर्षों से बिना किसी बाधा-व्यवधान के जारी इस मैनेजमेंट की शुरूआत की थी बिहार के मिथिलांचल क्षेत्र के 13 कुलों के ब्राह्मणों ने. प्रोफ़ेसर ताराकांत खवाड़े बताते हैं, "मिथिला से 13 कुल के ब्राह्मण लगभग 600 वर्ष पहले देवघर आए और पूजा करानी शुरू की. बाद में जब लोग अधिक आने लगे तो व्यवस्था बनाने के लिए पंडों ने इलाक़े बाँट लिए और तबसे यह व्यवस्था चल रही है." अब चिंता का विषय बनता जा रहा है इन कागज़ातों का रखरखाव क्योंकि युग बदल गया, साधन बदल गए लेकिन लाखों-करोड़ों रिकॉर्डों को संभालने की व्यवस्था नहीं बदली. सुनील तनपुरिए पंडा कहते हैं, "अभी तक तो पंडे लोग व्यक्तिगत तौर पर ही खातों को सहेजकर रखते हैं, कोई विशेष या सामूहिक व्यवस्था नहीं है. दरअसल ये खाते तो पंडों की व्यक्तिगत संपत्ति जैसे हैं जिन्हें वो किसी और को नहीं दे सकते हैं." भगवान भरोसे पुराने पंडों से भविष्य की योजना पूछने पर वे पूर्वजों की व्यवस्था और ईश्वर पर आस्था का नाम लेते हैं.
राजेंद्र पंडा कहते हैं, "बाबा वैद्यनाथ का दरबार सच्चा दरबार है, बाबा ने हमें आश्वासन दिया है कि वो हमारा प्रतिपालन करते रहेंगे." लेकिन आस्था चाहे जितनी ही मज़बूत हो, सच्चाई तो यह है कि खातों के काग़ज़ कमज़ोर पड़ते जा रहे हैं. पन्नों का रंग पीला पड़ता जा रहा है, लिखावट मिटती जा रही है. आस्था के दरबार में हर आम आदमी ख़ास बनने की मनोकामना लिए आता है. ऐसे में किसी भी पल हर आम आदमी का पिछला अतीत ख़ास बन सकता है. अपनी आँखों से देखे खातों के आधार पर इतना मैं अवश्य कह सकता हूँ कि बैद्यनाथधाम के खातों में जो लिखावटें मिटती जा रही हैं उनमें आम हो या ख़ास, एक बराबर लगती हैं. | इससे जुड़ी ख़बरें क्यों प्यासा है देवों का घर10 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस अमरनाथ यात्रा से प्रदूषण पर चिंता28 जून, 2006 | भारत और पड़ोस चारों धामों के लिए हवाई सेवा की शुरुआत02 मई, 2006 | भारत और पड़ोस परंपराएँ संरक्षित हैं मेहरानगढ़ क़िले में07 अप्रैल, 2006 | भारत और पड़ोस आधुनिक युग के 'श्रवण कुमार'23 अगस्त, 2004 | भारत और पड़ोस निर्वस्त्र होकर पूजा पर रोक | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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