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बात से बात चले... | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
दो दिन तक हैदराबाद हाउस में प्रतिनिधियों से घिरे भारत के विदेश सचिव शिव शंकर मेनन और पाकिस्तान के विदेश सचिव रियाज़ मोहम्मद ख़ान ने भारत-पाकिस्तान रिश्तों को सामान्य बनाने के लिए अनेक मुद्दों पर बात की. बैठक की ख़ासियत यह थी कि दोनों देश बात करने को तैयार तो हुए. जुलाई में मुंबई की जीवन धारा वहाँ की लोकल ट्रेनों में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों के शोर ने समग्र बातचीत प्रक्रिया को पटरी से उतार दिया था. फिर हवाना में गुट-निरपेक्ष देशों के सम्मेलन की गर्मजोशी में घोषणा हुई कि आतंकवाद से भारत और पाकिस्तान दोनों देश त्रस्त हैं और दोनों इस पर एक साझा तंत्र स्थापित करेंगे. इस घोषणा ने खुफिया तंत्र को नाखुश किया. सवाल उठाया गया कि भला आईएसआई और रॉ एक साथ कैसे काम कर सकते हैं? लेकिन शायद भारत की ओर से ऐसे प्रस्ताव के पीछे सोच ये रही हो कि पाकिस्तान के आतंकवाद से निपटने की मंशा की परीक्षा ली जाए. रूपरेखा तैयार है विदेश सचिवों ने अब इस तंत्र की रूपरेखा तैयार कर दी है. अतिरिक्त सचिव स्तर के अधिकारी इस बड़े की प्रगति पर नजर रखेंगे. भारत ने कुछ सबूत पाकिस्तान को सौंपे भी हैं. लेकिन मुंबई धमाकों के बारे में कोई सबूत वे नहीं दे पाए हैं. कहीं ये एक बड़ी कूटनीतिक विफलता तो नहीं?
आप छत पर चढ़कर जोर-जोर से चिल्लाते हैं- “पाकिस्तान भारत में आतंकवाद फैला रहा है. दुनिया भर में यह बात उठाई जाती है कि पाकिस्तान की बातों में मत आएँ, भारत का सच सुनिए”. लेकिन मौका आने पर ऐसे सबूत ही नहीं जो दिया जा सके. एक भारतीय होने के नाते आप कह सकते हैं कि जब अमरीका बिना सबूत के किसी देश पर आरोप लगाता है और उसे सबूत नहीं देने पड़ते तो फिर भारत को क्यों? यदि इस सोच पर न चलें तो फिर इस ओर बढ़ें कि अब पाकिस्तान को दिखाना है कि उसकी कथनी और करनी में अंतर नहीं. फिर दाऊद इब्राहिम जैसे नामों पर भी भारत कार्रवाई की आशा कर सकता है. खैर, पाकिस्तान भी भारत को ये बताने से नहीं चूका कि बलोचिस्तान में जो कुछ हो रहा है उसमें भारत की भूमिका के उसके पास पक्के सबूत हैं. परस्पर विश्वास की कमी यानी दोनों देशों के बीच बातचीत भले ही शुरु हो गई हो लेकिन विश्वास की कमी आज भी साफ झलकती है. हालाँकि पाकिस्तान में उच्चायुक्त रह चुके शिवशंकर मेनन और रियाज मोहम्मद खान को जानने के नाते दोनों की बॉडी लैंग्वेज की बात की जाए तो कहा जा सकता है कि संकेत दोनों के बीच संवाद कायम रखने के आसार बहुत अच्छे हैं. भारत पर अंतर्राष्ट्रीय दबाव भी है कि वह अपने अच्छे पड़ोसी से रिश्ते सुधारे क्योंकि दक्षिण एशिया की स्थिति को सुधारने में यह मददगार होगा. वैसे शिवशंकर मेनन तो यह कह ही चुके हैं कि पड़ोसी होना भूगोल का खेल है लेकिन अच्छे पड़ोसी और दोस्त बनने का सफ़र अभी बहुत लंबा है. | इससे जुड़ी ख़बरें पहले दिन 'आतंकवाद' पर विस्तृत चर्चा14 नवंबर, 2006 | भारत और पड़ोस भारत-पाक विदेश सचिवों की बातचीत शुरु14 नवंबर, 2006 | भारत और पड़ोस आतंकवाद के मुक़ाबले के लिए सहमति15 नवंबर, 2006 | भारत और पड़ोस भारत-पाक संयुक्त बयान-नवंबर 200615 नवंबर, 2006 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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