|
'गैर-कानूनी दिल्ली' की व्यथा कथा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
क्या करें लोग जब सरकार तेजी से बढ़ रही आबादी के हिसाब से रहने और व्यवसाय करने के लिए जरूरी ज़मीन मुहैया कराने में नाकाम रहती है? भारत की राजधानी दिल्ली में आम तौर पर लोग अधिकारियों को घूस देकर सरकारी और निजी जमीन का अतिक्रमण करते हैं, उस पर घर बनाते हैं, चुनावों में वोट के बदले उन कालोनियों को नियमित किए जाने का इंतजार करते हैं. दिल्ली की आबादी जो 1954 में मात्र बीस लाख थी आज वह बढ़कर एक करोड़ से भी अधिक हो चुकी है. इस अवधि में प्रशासन दस लाख से कुछ अधिक घर ही बना पाई. ठीक तरह से विकसित ज़मीनों की कीमत नागरिकों की पहुँच से बाहर ही रहे और इससे कई तरह की अनियोजित बस्तियों के बसने को बढ़ावा मिला. ऐसी बस्तियाँ झुग्गी बस्तियों से लेकर पुनर्वास कालोनियों, ग्रामीण गाँवों और शहरी गाँवों तक के रुप में जहाँ-तहाँ फैले है जिसे दिल्ली शहर के रुप में जाना जाता है.
इस तरह से शहर की एक-तिहाई आबादी करीब तीन हज़ार कॉलोनियों में रच-बस गई जिनमें से आधे तो गैर-कानूनी हैं और इनमें से ज्यादातर कालोनियों को न तो वैध रुप से बिजली ही मिलती है न पानी की आपूर्ति ही. वोट बैंक राजनेता और नगर निगम के अधिकारी हालात में सुधार के प्रति ज्यादा उत्साहित नहीं दिखाई देते क्योंकि इन कॉलोनियों को नियमित किए जाने के नाम पर वे चुनावों में पैसा और वोट झटकते रह सकते हैं. वकील चेतन दत्त जिनकी याचिका के बाद दिल्ली हाईकोर्ट ने हाल में अठारह हजार से अधिक अवैध निर्माणों को ढहाने का आदेश दिया, वे कहते हैं कि अवैध कॉलोनियों का निर्माण पहले-पहल 1960 के दशक में ही होना शुरु हुआ. 1972 में उस समय की काँग्रेस सरकार ने ऐसे 800 कालोनियों को नियमित कर दिया. पाँच साल बाद इसने फिर से 567 दूसरी कालोनियों को नियमित कर दिया.
1989 और 2002 के बीच अलग-अलग सरकारों ने कम से कम पाँच दफा ऐसी अवैध कालोनियों को नियमित किया. 2,200 अवैध कालोनियों को नियमित किए जाने का एक नया प्रस्ताव 1999 से ही दिल्ली उच्च न्यायालय में लटका पड़ा है. दत्त कहते हैं- “यह तो लोकप्रिय भीड़ की मांग और राजनेताओं का दबाव है जिसने ऐसी कालोनियों के नियमित किए जाने को बढ़ावा दिया. इसने निवेशकों और बिल्डरों का भी मन बढ़ाया कि वे अतिक्रमण और अवैध निर्माण जारी रखें क्योंकि एक न एक दिन तो इन्हें वैध कर ही दिया जाएगा”. राजनेता और बिल्डर गरीब और मध्य वर्ग से पैसे लेते हैं और फिर सार्वजनिक जमीन का अतिक्रमण कर बिना प्लास्टर की लाल ईंटों वाले घर बना डालते हैं. शहर का ज्यादातर हिस्सा ऐसे मकानों से पटा पड़ा है. अमीर लोग फार्महाउस बनाने के लिए खेती वाली ज़मीन खरीद लेते हैं जिन्हें वे शादियों और पार्टियों के लिए किराये पर भी दे देते हैं. या फिर 161 एकड़ में फैले सैनिक फार्म जैसी पूरी तरह से अवैध कालोनियाँ ही बसा डालते हैं. इस कालोनी में शहर के कुछ सार्वाधिक प्रभावशाली लोग रहते हैं जिनमें सेनाधिकारी और वरिष्ठ पत्रकार तक शामिल हैं. शहर के कुछ सार्वाधिक चर्चित फैशन डिजाइनर ऐसे अवैध मकानों में जगमगाते बुटीक खोलते हैं और फिर बाद में कहते हैं कि उन्हें कुछ मालूम ही नहीं था.
कुछ दूसरे लोग पुलिस और निगम के अधिकारियों को रिश्वत देकर अपने रिहायशी मकानों को या तो व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में बदल डालते हैं या फिर ऐसे प्रतिष्ठानों के हाथों बेच डालते हैं. व्यवसाय फलता-फूलता जाता है और फिर बढ़ती जाती है रिहायशी इलाकों की सड़कों पर ट्रैफिक भीड़. मकान और दुकान के मालिक पैदल चलने के रास्तों का अतिक्रमण कर उसे अपनी कार पार्किंग की जगह बना डालते हैं या फिर अपना सामान ही फैलाए रखते हैं. सड़क से हटकर रहें या यहाँ पार्किंग किए जाने पर जुर्माना लगाया जाएगा जैसी चेतावनियों का उन पर कोई असर नहीं होता. गंभीरता दुनिया की सबसे बड़े नगर निगमों में से एक दिल्ली नगर निगम जो भ्रष्टाचार के क्षेत्र में काफी ख्याति अर्जित कर चुका है, वह खुद इतनी असहाय जान पड़ता है कि इसे अनाधिकृत निर्माणों की समस्या से निपटने के लिए न्यायालय के आदेश का सहारा लेना पड़ा. एमसीडी ने हाल ही में दिल्ली उच्च न्यायालय से कहा कि अवैध निर्माणों की समस्या बहुत बड़े पैमाने पर है- और केवल वर्त्तमान कानूनों या दिल्ली मास्टर प्लान के प्रावधानों की मदद से इस पर नियंत्रण नहीं पाया जा सकता. निगम ने कोर्ट से यह भी कहा कि दिल्ली में अवैध निर्माणों का कारण परिवारों की बढ़ती जरूरतें, मकानों का विस्तार, संयुक्त परिवार की व्यवस्था का खत्म होता जाना, और बच्चों के लिए अतिरिक्त जगह की आवश्यकता इत्यादि रहा है. एमसीडी किस तरह से कार्य कर रही है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि भुक्तभोगी नागरिकों के 16 हजार से अधिक मामले तो केवल हाईकोर्ट में लंबित पड़े हैं. योजनाकार मानते हैं कि आखिरकार केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति, एक स्वच्छ प्रशासन और एक सूझ-बूझ भरा मास्टर प्लान ही इस शहर को बर्बाद होने से बचा सकता है.
कहा जाए तो दिल्ली आईना दिखाती है कि किस तरह ज्यादातर शहरी भारत गाँवों में रोज़गार के सिमटते अवसर के चलते तेजी से शहरीकृत होते इस देश की जरूरतों को पूरा करने में विफल रहा है. देश में करीब सवा दो करोड़ घरों का अभाव है जिनमें से 70 फीसदी मध्यम और निम्न आय वर्ग के लोगों के बीच है. यह एक ऐसी विफलता है जिसके बारे में विश्लेषक मानते हैं कि यह भविष्य में आवास, पानी और बिजली के लिए होने वाले गृह-युद्ध में तब्दील हो सकता है. | इससे जुड़ी ख़बरें दिल्ली के दुकानदारों को राहत नहीं मिली18 अक्तूबर, 2006 | भारत और पड़ोस सीलिंग पर पुनर्विचार याचिका का फ़ैसला28 अक्तूबर, 2006 | भारत और पड़ोस दिल्ली बंद, सड़कों पर उतरे व्यापारी29 अक्तूबर, 2006 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||